ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र
ऑस्ट्रेलिया के सार्वजनिक जीवन में हाल के दिनों में एक ऐसा दृश्य उभरा है जो केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति की झलक नहीं देता बल्कि प्रवासी समाजों की मानसिकता और लोकतांत्रिक व्यवहार को भी उजागर करता है। इजरायल के राष्ट्रपति के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान एक ओर जहां वे अपने देश में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने विभिन्न स्थलों पर पहुंचे वहीं दूसरी ओर फिलिस्तीन के पक्ष में छोटे बड़े विरोध प्रदर्शन लगातार दिखाई दिए। इन प्रदर्शनों की खास बात यह रही कि कई बार प्रदर्शनकारियों की संख्या बहुत सीमित थी लेकिन फिर भी उनका विरोध सार्वजनिक रूप से दर्ज हुआ और मीडिया तथा प्रशासन ने उसे अनदेखा नहीं किया।

यह ऑस्ट्रेलियाई लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि यहां विरोध की वैधता संख्या पर नहीं बल्कि नागरिक अधिकार पर आधारित है। कोई भी व्यक्ति या छोटा समूह यदि किसी नीति या अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर असहमति रखता है तो उसे खुलकर व्यक्त कर सकता है। यही कारण है कि मेलबर्न जैसे शहरों में दो चार लोगों का प्रदर्शन भी शहर के सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन जाता है। यह दृश्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उस प्रभाव को भी दिखाता है जो सीमाओं से परे जाकर स्थानीय समाजों में बहस और असहमति को जन्म देता है।
इजरायल और फिलिस्तीन का संघर्ष अब केवल मध्य पूर्व का मुद्दा नहीं रह गया है। यह वैश्विक नैतिक राजनीति का प्रतीक बन चुका है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जहां बहुसांस्कृतिक समाज है वहां यह संघर्ष विभिन्न समुदायों की पहचान राजनीति और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ जाता है। विश्वविद्यालयों मानवाधिकार समूहों और सामाजिक संगठनों में इस विषय पर खुली बहस और प्रदर्शन उसी चेतना का परिणाम हैं।

लेकिन इसी खुले लोकतांत्रिक वातावरण में एक गहरी चुप्पी भी मौजूद है जो खास तौर पर भारतीय मूल के लोगों से जुड़ी है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय की संख्या लगातार बढ़ी है। वे शिक्षा स्वास्थ्य सूचना प्रौद्योगिकी परिवहन कृषि और खनन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आर्थिक रूप से यह समुदाय मजबूत है। उनकी खरीद क्षमता अधिक है। वे नौकरियों के साथ साथ व्यापार में भी सक्रिय हैं। इसके बावजूद जब अपने अधिकारों के हनन या अपमान के खिलाफ आवाज उठाने की बात आती है तो यही समुदाय सबसे पीछे दिखाई देता है।

हाल ही में एक भारतीय मूल के ट्रक चालक के साथ हुई अभद्रता इसका उदाहरण है। स्थानीय प्रशासन से जुड़े लोगों द्वारा किए गए व्यवहार के बावजूद न तो उस चालक ने और न ही उसके साथियों ने किसी प्रकार का विरोध दर्ज किया। न कोई सामूहिक प्रतिक्रिया सामने आई और न ही कोई सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ। यह घटना अकेली नहीं है बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें भारतीय मूल के लोग अन्याय सहकर भी चुप रहना बेहतर समझते हैं।
इस चुप्पी के पीछे कई स्तरों पर काम करने वाले कारण हैं। पहला कारण असुरक्षा का भाव है। अधिकांश भारतीय प्रवासी यहां अपने वीजा स्थायी निवास और नागरिकता की प्रक्रिया को लेकर सतर्क रहते हैं। वे किसी भी तरह के टकराव से बचना चाहते हैं ताकि उनका भविष्य प्रभावित न हो। दूसरा कारण वह मानसिकता है जो वे अपने मूल देश से साथ लेकर आते हैं जहां विरोध प्रदर्शन अक्सर राजनीतिक दलों या हिंसक भीड़ से जुड़ा रहा है। शांतिपूर्ण कानूनी और नागरिक विरोध की संस्कृति भारत में कमजोर रही है और वही संकोच यहां भी दिखाई देता है। तीसरा कारण समुदाय के भीतर एकजुटता का अभाव है। भाषा क्षेत्र धर्म और वर्ग के आधार पर बंटा भारतीय समाज साझा मुद्दों पर संगठित होकर खड़ा नहीं हो पाता।

दूसरी ओर ऑस्ट्रेलियाई समाज के एक हिस्से में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती उपस्थिति और आर्थिक सफलता को लेकर ईर्ष्या और असहजता भी पनप रही है। टैक्सी ट्रक छोटे व्यापार कृषि और सेवा क्षेत्र में भारतीयों की बड़ी भागीदारी कुछ स्थानीय लोगों को यह महसूस कराती है कि संसाधनों और अवसरों पर बाहरी लोग हावी हो रहे हैं। यह भावना खुली हिंसा में भले ही कम बदले लेकिन प्रशासनिक सख्ती सामाजिक दूरी और व्यवहारिक भेदभाव के रूप में सामने आती है। खास तौर पर परिवहन और खनन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले एशियाई मूल के श्रमिक इस संरचनात्मक उत्पीड़न का सामना करते हैं।
ऑस्ट्रेलिया की राजनीति भी कभी कभी इस असंतोष को हवा देती है। आप्रवासन रोजगार और राष्ट्रीय पहचान जैसे मुद्दों पर होने वाली बहसें प्रवासी समुदायों के खिलाफ माहौल बना देती हैं। ऐसे में भारतीय मूल के लोग एक कठिन आत्म संघर्ष से गुजरते हैं। वे आर्थिक रूप से सफल होने के बावजूद सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।

फिलिस्तीन के पक्ष में दो चार लोगों द्वारा किया गया विरोध इस संदर्भ में एक प्रतीक बनकर उभरता है। यह दिखाता है कि लोकतंत्र में आवाज उठाने के लिए बहुमत नहीं बल्कि साहस और चेतना की आवश्यकता होती है। ऑस्ट्रेलियाई समाज इस साहस को स्वीकार करता है और यही उसकी लोकतांत्रिक ताकत है।
यदि भारतीय मूल के लोग इस समाज में केवल आर्थिक भागीदार बनकर रह जाएंगे और नागरिक अधिकारों के प्रयोग से दूर रहेंगे तो उनकी समस्याएं अदृश्य बनी रहेंगी। शांतिपूर्ण विरोध कानूनी शिकायत और सामूहिक मंच लोकतंत्र के मूल उपकरण हैं न कि टकराव के साधन। इनका प्रयोग किए बिना समानता और सम्मान की अपेक्षा अधूरी रहेगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय मूल का समुदाय अपनी आर्थिक शक्ति के साथ साथ नागरिक आत्मविश्वास भी विकसित करे। अन्यथा यह विडंबना बनी रहेगी कि दुनिया के हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया की सड़कों पर आवाज गूंजेगी लेकिन भारतीय मूल के लोगों की अपनी पीड़ा अपने ही भीतर दबी रह जाएगी और लोकतंत्र का यह अवसर उनके लिए केवल एक दर्शनीय दृश्य बनकर रह जाएगा।