प्रभावितों को देना होगा आजीविका का विकल्प
राजकुमार मल
भाटापारा- कोपरा जलाशय। छत्तीसगढ़ का पहला ‘रामसर साईट’। अंतर्राष्ट्रीय महत्व कीे यह आर्द्र भूमि प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता तथा सामाजिक परिवेश के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन वैश्विक संरक्षण का दायित्व कैसे पूरा किया जा सकेगा क्योंकि जल प्रदूषण, तलछट जमाव के साथ स्थानीय समुदायों की आजीविका का अभाव स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है।
12 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ का पहला ‘रामसर साईट’ घोषित किया गया कोपरा जलाशय कई ऐसी चुनौतियों को सामने ला रहा है, जिनका समाधान समय रहते नहीं किया गया तो प्रकृति संरक्षण और टिकाऊ विकास के बीच का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए सतत संरक्षण और स्थानीय भूमि आधार आजीविका के बीच सही संतुलन को अनिवार्य माना जा रहा है।

जल गुणवत्ता और प्रदूषण नियंत्रण
कोपरा जलाशय के आसपास व्यापक कृषि भूमि है, जहां उच्च मात्रा में रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक का उपयोग होता है। यह उपयोग जल में पोषक तत्वों की मात्रा घटा सकता है। यह लता पूर्ण वनस्पति वृद्धि को प्रोत्साहित करेगा। जिससे ऑक्सीजन स्तर कम होगा। यह स्थिति मछलियों और अन्य जीवों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। ग्रामीण क्षेत्र से आने वाला बहाव गैर विघटनशील प्रदूषण की मात्रा बढ़ाएगा।
तलछट जमाव
नजर रखनी होगी जमीनी कटाव और तलछट जमाव की स्थिति पर। उपाय नहीं किए गए तो जलाशय की जल धारण क्षमता कम हो सकती है। यह प्रक्रिया जलाशय की उम्र कम कर सकती है। उथला पानी की स्थिति जैविक विविधता को बाधित कर सकती है। छोटे बरसाती नालों से भरने वाले जलाशय में कटाव नियंत्रण के उपाय में यह कमजोरी निश्चित ही तलछठ के विस्तार को बढ़ाएगी।

कम करना होगा मानवीय गतिविधियां
कोपरा जलाशय कई प्रवासी पक्षियों का मौसम आधारित प्रवास स्थल है। इसमें संकटग्रस्त प्रजातियां भी शामिल हैं। रामसर साईट घोषित होने के बाद पर्यटन विकास संभव है। साथ ही नौकायन जैसी पर्यटन गतिविधियां भी बढ़ेंगी। यह बदलाव पक्षियों के प्राकृतिक व्यवहार में बदलाव ला सकता है। स्थानीय समुदायों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव इसलिए पड़ेगा क्योंकि मछली पालन और मत्स्याखेट पर तत्काल प्रभाव से बंदिश लगा दी गई है। यह बंदिश अवैध मत्स्याखेट जैसी गतिविधियां बढ़ा सकती हैं।
सहभागिता के बिना संरक्षण संभव नहीं
कोपरा जलाशय का रामसर साइट घोषित होना छत्तीसगढ़ के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन यह तभी सार्थक सिद्ध होगा जब संरक्षण को स्थानीय जरूरतों और आजीविका से जोड़ा जाए। जल गुणवत्ता सुधार, कैचमेंट क्षेत्र में मृदा-जल संरक्षण उपाय तथा तलछट जमाव को नियंत्रित करना प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही पर्यटन गतिविधियों को वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित कर पक्षियों और जलीय जैव विविधता के प्राकृतिक व्यवहार की रक्षा जरूरी है। स्थानीय मछुआरों और ग्रामीणों की सहभागिता के बिना संरक्षण संभव नहीं है, इसलिए सहभागितापूर्ण प्रबंधन मॉडल अपनाकर कोपरा जलाशय को सतत विकास का उदाहरण बनाया जाना चाहिए।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर