ऑस्ट्रेलिया : क्षमता-आधारित शिक्षा बनाम डिग्री-केंद्रित भारत

ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र

ऑस्ट्रेलिया में बच्चों की परवरिश और शिक्षा को नज़दीक से देखने पर एक बुनियादी फर्क तुरंत समझ में आता है। यहाँ शिक्षा का उद्देश्य अंकों और रैंकिंग की दौड़ नहीं, बल्कि बच्चे की क्षमता, रुचि और व्यवहारिक समझ का विकास है। इसके ठीक उलट भारत में शिक्षा आज भी मुख्यतः डिग्री, परीक्षा परिणाम और सामाजिक प्रतिष्ठा के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। यही अंतर दोनों देशों की शिक्षा नीति और सामाजिक संरचना को अलग दिशा में ले जाता है।

भारत में निजी स्कूलों की बाढ़ आ चुकी है। अंग्रेज़ी माध्यम, स्मार्ट क्लास, ब्रांडेड यूनिफ़ॉर्म और तथाकथित गुणवत्ता के नाम पर मध्य वर्ग पर भारी फीस का दबाव है।शिक्षा नीति का कोई स्पष्ट खाका नहीं है । निजी स्कूलों की ताकत रुपए और राजनीतिक पहुंच के बल पर इतनी बढ़ गई है कि वे शिक्षा नीति में बदलाव की क्षमता प्रकट करने लगे हैं । शिक्षा धीरे-धीरे शासकीय दायित्व से खिसककर एक महँगा बाज़ार बन गई है। अच्छे स्कूलों में दाख़िला अपने-आप में एक प्रतियोगिता है, जिसमें माता-पिता की आर्थिक क्षमता निर्णायक बन जाती है। इसके विपरीत ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार की ज़िम्मेदारी माने जाते हैं। स्कूल लगभग निशुल्क हैं और गुणवत्ता किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहती। शिक्षा यहाँ उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार है।

ऑस्ट्रेलिया में पाँच साल से पहले चाइल्ड-केयर की व्यवस्था है, जहाँ कामकाजी माता-पिता अपने बच्चों को निश्चिंत होकर छोड़ सकते हैं। इसके लिए तय शुल्क है, जो स्कूल शुरू होते ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद की शिक्षा निशुल्क है ।इसे अभिभावक आर्थिक राहत की तरह देखते हैं, न कि बोझ की तरह। भारत में छोटे बच्चों की देखभाल और शुरुआती शिक्षा भी अब निजी संस्थानों पर निर्भर हो चुकी है, जहाँ शुल्क लगातार बढ़ता जा रहा है।

शिक्षा नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऑस्ट्रेलिया में बच्चे को एक ही साँचे में ढालने की कोशिश नहीं होती। ब्रेन-मैपिंग, स्किल असेसमेंट और काउंसलिंग के माध्यम से यह समझा जाता है कि बच्चा अकादमिक पढ़ाई के लिए उपयुक्त है या तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए। दसवीं कक्षा से ही हुनर आधारित शिक्षा शुरू हो जाती है। प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, बढ़ई, मैकेनिक जैसे पेशों को समाज में पूरा सम्मान और स्थायी रोज़गार मिलता है। यहाँ श्रम को शिक्षा से कमतर नहीं माना जाता, बल्कि दोनों को एक-दूसरे का पूरक समझा जाता है।

भारत में स्थिति इसके उलट है। औसत बच्चा अक्सर सिस्टम के हाशिये पर चला जाता है। निजी स्कूल अपनी रैंकिंग और परिणामों की चिंता में टॉप छात्रों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि बाकी बच्चों को या तो पीछे छोड़ दिया जाता है या कमज़ोर विकल्पों की ओर धकेल दिया जाता है। नई शिक्षा नीति में कौशल विकास की बातें ज़रूर हैं, लेकिन ज़मीनी संसाधनों और सामाजिक स्वीकार्यता की कमी अब भी बड़ी बाधा है। नतीजा यह होता है कि इंजीनियरिंग या ग्रेजुएशन के बाद भी युवा ऐसे काम करते हैं, जिन्हें वे कहीं पहले कम फीस के साथ सीख सकते थे।

ऑस्ट्रेलिया में काम को छोटा या बड़ा नहीं माना जाता। पढ़ाई के साथ पार्ट-टाइम काम करना सामान्य बात है। रेस्टोरेंट, सुपरमार्केट, पेट्रोल पंप जैसे काम सम्मानजनक हैं और आत्मनिर्भरता का हिस्सा माने जाते हैं। सिस्टम पारदर्शी है, इसलिए रिश्वत, सिफ़ारिश या जुगाड़ की ज़रूरत नहीं पड़ती। यही कारण है कि यहाँ आने वाले बहुत से भारतीय, तमाम देशप्रेम के बावजूद, वापस लौटने का मन नहीं बना पाते। विशेषकर महिलाओं के लिए सुरक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान का अनुभव इस निर्णय को और मज़बूत करता है।

यह समझ केवल आंकड़ों या नीतिगत दस्तावेज़ों से नहीं बनी है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रवासी भारतीय परिवारों से की गई लंबी बातचीत से यह तस्वीर और साफ होती है। कोई पच्चीस साल से यहाँ है, कोई दस–बारह साल से, किसी के बच्चे चाइल्ड-केयर में हैं तो कोई हाई-स्कूल में। लगभग सभी का अनुभव एक-सा है। बसने और काम करने के लिए ऑस्ट्रेलिया बेहतर इसलिए है क्योंकि यहाँ अवसर हैं, व्यवस्था है और भविष्य को लेकर भरोसा है।

इन बातचीतों में यह भी सामने आता है कि मूल ऑस्ट्रेलियाई समाज सामाजिक मेलजोल में सीमित है। समय और पैसा दोनों को बहुत क़ीमती माना जाता है। भारतीय समाज जैसी अनौपचारिक घुलनशीलता यहाँ कम है, लेकिन इसके बदले नागरिक और पेशेवर जीवन अधिक सुव्यवस्थित है। भारत लौटने की इच्छा पर जब सीधे सवाल किए जाते हैं, तो जवाब भावनात्मक लगाव के बावजूद व्यावहारिक होता है। रिश्ते और घर भारत में हैं, लेकिन भारत में सिस्टम की असमानता , असहजता , हर काम में रिश्वत , आम आदमी के लिए नियम कायदे और सम्पन्न तथा राजनीतिक व्यक्ति के लिए सारे नियम कायदे ताक पर रख दिए जाते हैं और रोज़मर्रा का मानसिक तनाव उन्हें वापस भारत खींच नहीं पाता।

यह भी एक सच है कि यहाँ पले-बढ़े बच्चे खुद को पहले ऑस्ट्रेलियाई नागरिक मानते हैं। भारत के प्रति उनके मन में विरोध नहीं, लेकिन लौटने की चाह भी नहीं। घरेलू सहूलियतें यहाँ नहीं हैं, फिर भी आत्मनिर्भर जीवन उन्हें ज़्यादा सहज लगता है। यह अनुभव बताता है कि मामला केवल शिक्षा या रोज़गार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम और जीवन की गुणवत्ता का है।
यही बुनियादी फर्क है। भारत में शिक्षा अभी भी डिग्री के पीछे भाग रही है, और ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा जीवन के लिए नागरिक तैयार कर रही है।

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