नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के सातवें दिन लोकसभा में भारी हंगामे के बीच राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया। वर्ष 2004 के बाद यह पहला अवसर है जब यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री के भाषण के बिना ही पास हुआ है। इससे पहले जून 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्ष के हंगामे के कारण बोलने का अवसर नहीं मिल सका था।
गुरुवार को सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी शुरू कर दी, जिसके चलते स्पीकर को कई बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने स्पष्ट किया कि जब तक राहुल गांधी को सदन में अपनी बात रखने की अनुमति नहीं दी जाती, तब तक विपक्ष प्रधानमंत्री को बोलने नहीं देगा। वहीं, सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री आज शाम राज्यसभा में अपना संबोधन दे सकते हैं।
इससे पूर्व बुधवार को भी सदन में अप्रत्याशित दृश्य देखने को मिले थे। शाम 5 बजे जब प्रधानमंत्री को धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देना था, तब विपक्षी महिला सांसदों ने सत्तापक्ष की कुर्सियों और प्रधानमंत्री की सीट को घेर लिया था। सांसदों के हाथों में सरकार विरोधी बैनर और पोस्टर थे, जिसके कारण प्रधानमंत्री का संबोधन टल गया और सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने शुक्रवार तक सदन स्थगित करने से पहले कहा कि सदन के इतिहास में ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई। उन्होंने बताया कि विपक्षी सांसदों के आचरण को देखते हुए किसी अप्रत्याशित घटना की आशंका थी, इसलिए उन्होंने स्वयं प्रधानमंत्री से सदन में न आने का आग्रह किया था। स्पीकर ने सांसदों के व्यवहार को लोकतंत्र की गरिमा के प्रतिकूल बताया।
इधर राज्यसभा में भी राहुल गांधी को लोकसभा में बोलने से रोकने के मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू के बीच तीखी नोकझोंक हुई। सत्तापक्ष ने तर्क दिया कि राज्यसभा में लोकसभा के विषयों को नहीं उठाया जा सकता। हंगामे के विरोध में विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा से वॉकआउट कर दिया।