– सुभाष मिश्र
भारत और अमेरिका के बीच जिस ट्रेड डील को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही थी, उसकी घोषणा आखिरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कर दी। ट्रम्प के एलान के मुताबिक भारत पर लगाया गया कुल 50% टैरिफ घटाकर 18% कर दिया गया है। पहली नजर में यह भारत के लिए बड़ी राहत और कूटनीतिक सफलता जैसा लगता है, लेकिन इस राहत के पीछे की शर्तें, भाषा और अंदाज़ कई नए सवाल खड़े करते हैं।
अप्रैल में ट्रम्प ने भारत पर 25% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया था “जैसे को तैसा” की नीति के तहत। इसके बाद अगस्त में रूस से तेल खरीदने को लेकर 25% की अतिरिक्त पेनल्टी थोप दी गई। इस तरह भारत पर कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया। अब व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि रूस से तेल खरीदने को लेकर लगाया गया अतिरिक्त टैरिफ हटा लिया जाएगा और भारत पर सिर्फ 18% टैरिफ लागू रहेगा। सवाल यह नहीं है कि टैरिफ घटा या नहीं, सवाल यह है कि किस शर्त पर और किस लहजे में घटा।
ट्रम्प ने यह घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत के बाद की। रात करीब 10:30 बजे ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए ट्रम्प ने दावा किया कि मोदी रूस से तेल खरीद बंद करने और अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदने पर सहमत हो गए हैं। यहीं से मामला सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का बन जाता है।
ट्रम्प का यह दावा नया नहीं है। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने कई बार यह जताने की कोशिश की है कि वे भारत के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं चाहे वह भारत-पाकिस्तान तनाव को “खत्म कराने” का दावा हो या रूस से तेल खरीदने पर सार्वजनिक धमकियां। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में जहां बातचीत अक्सर बंद कमरों में होती है, वहां ट्रम्प मंच से शर्तें और श्रेय दोनों खुद लेते हैं।
टैरिफ घटने के बाद प्रधानमंत्री का X पर धन्यवाद संदेश भी इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। कूटनीति में शिष्टाचार जरूरी होता है, लेकिन जब सामने वाला नेता खुले तौर पर दबाव की भाषा इस्तेमाल करता हो, तब धन्यवाद के साथ-साथ सावधानी भी उतनी ही जरूरी हो जाती है।
ट्रम्प के मुताबिक भारत ‘बाय अमेरिकन’ नीति के तहत अमेरिका से 500 अरब डॉलर यानी करीब 46 लाख करोड़ रुपये से अधिक का सामान खरीदेगा। यह आंकड़ा जितना बड़ा है, उतना ही असहज करने वाला भी। क्या भारत की घरेलू उद्योग नीति, एमएसएमई सेक्टर और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा इस दबाव में टिक पाएगी? या फिर यह सौदा सिर्फ टैरिफ राहत के बदले बाजार खोलने का समझौता बनकर रह जाएगा?
तेल का सवाल इससे भी ज्यादा संवेदनशील है। रूस से भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा जुड़ा है। रूस से सस्ता तेल खरीदना कोई राजनीतिक जिद नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी और रणनीतिक गणित का हिस्सा है। अगर अमेरिका यह तय करेगा कि भारत किस देश से तेल खरीदे और किससे नहीं, तो यह केवल व्यापारिक दबाव नहीं, बल्कि विदेश नीति में हस्तक्षेप माना जाएगा। ट्रम्प का यह कहना कि “जरूरत पड़ी तो भारत वेनेजुएला से तेल लेगा” भी इसी मानसिकता को दिखाता है जैसे भारत अपने फैसलों में स्वतंत्र नहीं, बल्कि निर्देशों का पालन करने वाला देश हो।
यह भी याद रखना जरूरी है कि ट्रम्प के फैसले स्थायी नहीं होते। आज टैरिफ घटा है, कल फिर बढ़ सकता है। आज दोस्ती का दावा है, कल नई धमकी। ट्रम्प की राजनीति में निरंतरता से ज्यादा महत्व सुर्खियों और दबाव की रणनीति का रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत इस डील को लंबी अवधि की स्थिर नीति मानकर चल सकता है?
इस सौदे का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। चीन, रूस, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के साथ भारत के रिश्ते भी इससे प्रभावित होंगे। क्या भारत एक ध्रुवीय दबाव में अपनी बहुध्रुवीय विदेश नीति को संतुलित रख पाएगा? या फिर व्यापारिक राहत के बदले रणनीतिक स्पेस धीरे-धीरे सिमटता जाएगा?
टैरिफ कम होना निस्संदेह राहत की खबर है, लेकिन ट्रम्प का तेवर अब भी वही है दबाव, दावा और शर्तों का। असली चुनौती यह नहीं कि भारत को कितना टैरिफ देना है, बल्कि यह है कि भारत अपने फैसले खुद कितनी मजबूती से ले पाएगा। व्यापार जरूरी है, दोस्ती भी जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है नीति में आत्मसम्मान और स्थिरता।
ट्रम्प का इतिहास बताता है कि वे कब क्या फैसला लेंगे, कोई नहीं जानता। इसलिए सवाल यही है क्या यह डील भारत के लिए अवसर है, या एक ऐसी शुरुआत, जिसमें हर राहत के साथ नई शर्त जुड़ी होगी?