श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता निस्वार्थ प्रेम-पंडित तोरण शर्मा

भानुप्रतापपुर। आध्यात्मिक चेतना,भक्ति और आस्था के अद्भुत संगम के बीच श्रीमद् भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ कथा सत्संग के सातवें दिवस बुधवार को व्यास पीठ पर विराजमान पंडित तोरण शर्मा कुरना कांकेर वाले ने जरासंघ वध एवं श्रीकृष्ण-सुदामा प्रसंग की कथा बताई। कथा सुनने के लिए कथा पंडाल पर भक्तो के भीड़ जुटी रही। कल गुरुवार को तुलसीवर्षा, भगवान की शोभायात्रा एवं चढ़ोत्तरी किया जाना है।

तहसीलपारा वार्ड क्रमांक 04 में 22 जनवरी से 30 जनवरी तक श्रीमद्भागवत कथा की अमृतधारा प्रवाहित हो रही है
जिनमे सैकड़ो भक्तजन डुबकी लगाते हुए अपने जीवन को सार्थक कर रहे है।

पंडित जी ने कथा के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण की आठ पटरानी एवं एक हजार एक सौ रानी की कथा बताई । भगवान के एक पट रानी सत्यभामा धरती माता है इसलिए सुबह उठते ही धरती माता को प्रणाम करना चाहिए। भौमा असुर की वध के कथा विस्तार से बताई।

मानव जीवन का कोई भरोसा नही है इसलिए अधिक से अधिक समय तक मानव को कीर्तन भजन करते हुए अच्छे जीवन जीना चाहिए। उन्होंने कहा कि जगत में जितने भी चराचर जीव है सभी मे ईश्वर का वास है। अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा सजग रहे क्योंकि स्वास्थ्य ही मनुष्य की असली धन है।

श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता निस्वार्थ प्रेम, समानता और अटूट विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक है। दरिद्र ब्राह्मण सुदामा, अपनी पत्नी के आग्रह पर द्वारकाधीश कृष्ण से मिलने उनके महल पहुंचे। कृष्ण ने अपने मित्र का भव्य स्वागत किया, सुदामा की पोटली से चावल खाए और बिना मांगे ही उनकी गरीबी दूर कर दी।
कृष्ण-सुदामा प्रसंग के मुख्य बिंदु सच्ची मित्रता सुदामा एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण थे, जबकि कृष्ण द्वारका के राजा थे, लेकिन दोनों की मित्रता में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था।
बाल सखा दोनों ने सांदीपनी ऋषि के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी।
सुदामा की भेंट सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर, कृष्ण के लिए उपहार स्वरूप तीन मुट्ठी पोहा (चावल के चिवड़े) पोटली में बांधकर ले गए थे।
कृष्ण का स्वागत: जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो कृष्ण ने नंगे पैर दौड़कर उनका स्वागत किया और अपने आंसुओं से सुदामा के चरण धोए।
बिना मांगे सब कुछ सुदामा शर्म के कारण कृष्ण से अपनी गरीबी का जिक्र नहीं कर पाए और बिना कुछ मांगे वापस आ गए।
अकल्पनीय कृपा: जब सुदामा घर लौटे, तो उनकी झोपड़ी की जगह महल बन चुका था। कृष्ण ने बिना बताए ही सुदामा के सारे दुख दूर कर दिए थे।
यह प्रसंग सिखाता है कि मित्रता में भौतिक वस्तुएं नहीं, बल्कि केवल प्रेम और समर्पण मायने रखता है।

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