मध्य प्रदेश के भोजशाला में बसंत पंचमी पर पूजा शुरू, भारी सुरक्षा के बीच दोनों समुदायों के लिए समय निर्धारित

धार। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित 11वीं शताब्दी के विवादित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर में शुक्रवार को बसंत पंचमी के अवसर पर पूजा भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शुरू हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिए फैसले के अनुसार हिंदू समुदाय को सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा करने की अनुमति दी है जबकि मुस्लिम समुदाय दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज अदा कर सकता है।

प्रशासन ने शांति बनाए रखने के लिए पुलिस, आरएएफ और सीआरपीएफ सहित लगभग 8 हजार जवानों को तैनात किया है। पूरे परिसर की निगरानी 200 से अधिक सीसीटीवी कैमरों और 10 ड्रोनों से की जा रही है। नमाजियों की सूची पहले ही प्रशासन को सौंपी जा चुकी है। कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने बताया कि दोनों समुदायों के लिए अलग-अलग प्रवेश और निकास द्वार बनाए गए हैं तथा दोनों पक्ष इस व्यवस्था से सहमत हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मार्च 2024 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को परिसर की वैज्ञानिक जांच का निर्देश दिया था। एएसआई ने जुलाई 2024 में रिपोर्ट सौंपी जिसमें संस्कृत शिलालेख और खंडित हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां मिलने का उल्लेख है। इन निष्कर्षों से हिंदू पक्ष के दावों को बल मिला है लेकिन मालिकाना हक या धार्मिक स्थिति पर अभी कोई अंतिम न्यायिक फैसला नहीं हुआ है।

पिछले 23 वर्षों से प्रशासनिक व्यवस्था लागू है जिसमें हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति है। यह व्यवस्था सामान्य दिनों में विवादों को रोकती रही है लेकिन जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ती है तो चुनौतियां सामने आती हैं। वर्ष 2016 में भी ऐसी ही स्थिति बनी थी जिसके कारण विरोध प्रदर्शन और झड़पें हुई थीं।

भोजशाला एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है जो परमार राजा भोज के काल से जुड़ा माना जाता है। हिंदू इसे देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर मानते हैं और संस्कृत शिलालेखों, मूर्तियों तथा वास्तुकला का हवाला देते हैं। मुस्लिम समुदाय इसे सूफी संत कमालुद्दीन के नाम पर कमल मौला मस्जिद मानता है और सदियों से निरंतर नमाज पढ़े जाने का दावा करता है। यह विवाद धार्मिक के साथ ऐतिहासिक और पुरातात्विक भी है जिसमें विरासत और पूजा की निरंतरता की अलग-अलग व्याख्याएं शामिल हैं।

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