दावोस। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की वार्षिक बैठक में केंद्रीय रेल, संचार एवं इलेक्ट्रॉनिक्स तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को दृढ़ता से कहा कि अगले कुछ वर्षों में भारत निश्चित रूप से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा कि यह उपलब्धि 2028 तक या इससे भी पहले हासिल हो सकती है।
दावोस में आयोजित एक सत्र में बोलते हुए वैष्णव ने विकसित देशों में संचित भारी कर्ज को एकमात्र प्रमुख जोखिम बताया। उन्होंने जापान में बॉन्ड्स पर संभावित रन का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि बड़े पैमाने पर ऐसा होता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है, अन्यथा भारत का विकास मार्ग निर्बाध रहेगा।
गीता गोपीनाथ ने कहा कि भारत के लिए तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना अब चुनौती नहीं रहा; असली चुनौती प्रति व्यक्ति आय को विकसित देशों के स्तर तक पहुंचाना है। उन्होंने भारत के भौतिक तथा डिजिटल बुनियादी ढांचे की मजबूती, जीएसटी जैसे कर सुधारों तथा अन्य नीतिगत कदमों की सराहना की। साथ ही भूमि अधिग्रहण, न्यायिक सुधार, श्रम बाजार में लचीलापन तथा स्किल डेवलपमेंट को भविष्य के सुधारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
वैष्णव ने पिछले एक दशक में आए परिवर्तनकारी बदलावों का उल्लेख करते हुए विकास के चार प्रमुख स्तंभों पर प्रकाश डाला— भौतिक, डिजिटल तथा सामाजिक बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश; समावेशी विकास; विनिर्माण तथा नवाचार को बढ़ावा; तथा नियमों का सरलीकरण। उन्होंने कहा कि इन सभी को प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है। अगले पांच वर्षों में भारत 6-8 प्रतिशत वास्तविक जीडीपी वृद्धि, 2-4 प्रतिशत मध्यम मुद्रास्फीति तथा 10-13 प्रतिशत नाममात्र विकास दर्ज करेगा।
उन्होंने जोर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता गरीबों की सुरक्षा रही है, जिसके परिणामस्वरूप 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंच रहा है।
गीता गोपीनाथ ने कहा कि वर्तमान अनुमानों के आधार पर भारत 2028 तक जर्मनी तथा जापान को पीछे छोड़ सकता है तथा जीडीपी में संशोधन से यह लक्ष्य इससे पहले भी प्राप्त हो सकता है। उन्होंने जोर दिया कि निरंतर सुधारों के माध्यम से 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, जिसमें राज्यों द्वारा श्रम सुधार कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है।