भिलाई। छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने राज्य के मुख्य सचिव को एक महत्वपूर्ण पत्र लिखकर नगर पालिक निगम भिलाई द्वारा उद्योगों को जारी किए गए सीमाकर/निर्यात कर (टर्मिनल टैक्स) के नोटिसों पर तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। श्री पाण्डेय ने इस मुद्दे को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि देशभर में जीएसटी लागू होने के बाद भी निगम द्वारा उद्योगों पर इस तरह का कर लगाना समझ से परे है और इससे प्रदेश की औद्योगिक साख खराब हो रही है। उन्होंने इस मामले की जानकारी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उपमुख्यमंत्री अरूण साव और वित्तमंत्री ओपी चौधरी को भी भेजी है।
नियमों का हवाला देकर करोड़ों की मांग
श्री पाण्डेय ने अपने पत्र में खुलासा किया कि नगर निगम भिलाई ने क्षेत्र के लगभग 50 से 60 लघु एवं मध्यम उद्योगों को नोटिस थमाया है। इन नोटिसों के जरिए वर्ष 2017-18 से लेकर 2024-25 तक की लंबी अवधि के लिए भारी-भरकम राशि की मांग की जा रही है। निगम ने इस वसूली के लिए छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 173 और पुराने टर्मिनल टैक्स नियम 1996 का हवाला दिया है।
जीएसटी लागू होने के बाद टैक्स वसूली को बताया असंवैधानिक
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ने विधिक तर्क देते हुए स्पष्ट किया कि 1 जुलाई 2017 से जब पूरे देश में ‘एक देश-एक टैक्स’ (GST) लागू हो चुका है, तब इस तरह के पुराने टैक्सों की कोई कानूनी वैधता नहीं रह जाती। उन्होंने संविधान के 101वें संशोधन अधिनियम, 2016 का जिक्र करते हुए कहा कि अनुच्छेद 246 और 269 के तहत वस्तुओं के उत्पादन, विक्रय और परिवहन पर कर लगाने का अधिकार केवल केंद्र व राज्य सरकारों के पास है। ऐसे में नगर निगम द्वारा टर्मिनल टैक्स वसूलना पूरी तरह से अप्रभावी (inoperative) और संविधान के अनुच्छेद 265 का उल्लंघन है।
उद्योगों के उत्पीड़न और छवि खराब होने की जताई चिंता
श्री पाण्डेय ने पत्र में उल्लेख किया कि जीएसटी लागू होने के बाद नगर निकायों को उनके हिस्से की क्षतिपूर्ति राशि सरकार द्वारा दी जाती है। इसके बावजूद उद्योगों पर अतिरिक्त टैक्स का बोझ डालना उनका उत्पीड़न है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इसे नहीं रोका गया तो राज्य में निवेश और रोजगार पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।
मुख्य सचिव से की ये बड़ी मांगें
प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने मुख्य सचिव से मांग की है कि:
- नगर निगम द्वारा जारी किए गए सभी नोटिसों की तत्काल जांच और कानूनी समीक्षा कराई जाए।
- नगरीय प्रशासन विभाग से एक स्पष्ट आदेश जारी करवाया जाए ताकि भविष्य में कोई भी नगर निगम इस तरह के कर न लगाए।
- जब तक इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक वसूली की प्रक्रिया पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
- उद्योगों और फैक्ट्रियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई या सीलिंग जैसी किसी भी प्रक्रिया को तुरंत रोका जाए।