रमेश गुप्ता
रायपुर। सेंटल जेल रायपुर में दुष्कर्म की सजा काट रहे एक बंदी ने ऐसा काम किया जिसकी चर्चा पूरे प्रदेश में हो रही है। बंदी नंबर 1158/38 वासुदेव चौहान ने सेंट्रल जेल में शुरू हुई गीता की क्लास में दिलचस्पी दिखाई और आज वह गीता व्रति की उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है। गीता व्रती की उपाधि पाने वाला वासुदेव 6 राज्यों के 600 बंदियों में अकेला है। गीता व्रती की उपाधि के साथ अब वासुदेव में सकारात्मक बदलाव भी आया है।
मिली जानकारी के अनुसार 25 वर्षीय वासुदेव चौहान कम उम्र में ही गलत संगत में पड़ गए और इसका नतीजा यह हुआ के वह एक रेप में फंस गया। महासमुंद में ट्रायल चला और कोर्ट ने 20 साल की सजा सुना दी। दो साल पहले ही वे रायपुर की सेंट्रल जेल में शिफ्ट हुए। यहां बंदिया का व्यवहार उसके प्रति बुरा था और यह सब देख घुटन भी होती थी। वासुदेव ने बताया कि एक समय ऐसा लगा कि वह अपना जीवन समाप्त कर ले। वासुदेव को इस बात का ज्यादा दुख था कि सजा होने के बाद परिवार व दोस्तों ने मुंह मोड़ लिया। इस बीच एक दिन जेल प्रशासन बताया कि गीता की क्लास शुरू कर रहे हैं। जो कैदी चाहे, क्लास ले सकता है।

क्लास ज्वाइन करने के बाद आया बदलाव
गीता क्लास की शुरुआत को वासुदेव ने गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि अकेलापन व बंदियों के रूखे व्यहार के बीच अपने आप को व्यस्त रखने के लिए गीता क्लास ज्वाइन कर ली। मन को संयमित रखने के लिए क्लास ज्वाइन की और धीरे धीरे बदलाव भी आने लगा। वासुदेव ने बताया कि क्लास के बाद वह रोज तीन बार गीता पढ़ने लगा। जेल में जब भी समय मिलता वह गीता का ज्ञान लेता। इससे उसे शांति भी मिली और जीवन के मायने भी समझने लगा। वासुदेव क साथ 42 अन्य बंदी भी गीता क्लास में हैं लेकिन वासुदेव ने असाधारण कर दिया। 18 अध्यायों के 700 श्लोक कंठस्थ कर वासुदेव ने कठिन परीक्षा दी और उसे गीता व्रति की उपाधि मिली।
गीता परिवार सिखा रहा गीता का पाठ
जेल में गीता की क्लास यहां की संस्था गीता परिवार द्वारा लिया जा रहा है। संस्था की सदस्या ने सीमा अरूण मिश्रा ने बताया कि वासुदेव से जब वो पहली बार मिली, उनकी नजरें झुकी हुई थी। सिर तक नहीं उठा पाता था। प्रायमरी तक पढ़ाई करने वाले वासुदेव के लिए गीता के सारे श्लोक याद करना आसान नहीं था क्योंकि यह संस्कृत में है। इसके बाद भी उसने अपनी लगन से इसे कर दिया। सीमा ने बताया संस्था चार चरण की परीक्षा पास करने के बाद ही किसी को गीता-व्रती की उपाधि देती है। जो गीता के तीन अध्याय कंठस्थ कर लेते हैं उन्हें गीता-जिज्ञासु की उपाधि मिलती है। 6 अध्याय के श्लोक याद करने पर गीता पाठक, 12 याद करने पर गीता पथिक और पूरे 18 अध्याय याद करने पर गीता-व्रती की उपाधि मिलती है। देश में वासुदेव पहले ऐसे कैदी हैं जिन्हें ये उपाधि संस्था ने दी है।
परिवार की चिंता नहीं, अन्य बंदियों का व्यवहार भी बदला
वासुदेव को गीता व्रति की उपाधि मिलने के बाद जेल में अन्य बंदियों का व्यवहार भी सुधर गया है। पहले जो उससे मन मुटाव रखते थे वे अब उसे सम्मान देते हैं। वासुदेव को अब अपने परिवार की चिंता नहीं है क्योंकि वे उससे मिलने भी नहीं आते। दोस्त भी उससे किनारा कर चुके हैं। वासुदेव ने 6 साल की सजा पूरी कर ली है और 14 साल की सजा और बाकि है। वासुदेव ने कहा कि गीता के सहारे वह अपनी बाकी बची सजा भी पूरी कर लेगा। गीता-व्रती की उपाधि के बारे में उन्होंने अब अपने परिवार के किसी दोस्त को भी नहीं बताया है।