कांकेर। गरीब, मजदूर और किसान के नाम पर सत्ता में आई भाजपा सरकार पर मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस नेता सरजू शोरी ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि मनरेगा का नाम बदलकर नए ढांचे में ढालने की कोशिश सुधार नहीं, बल्कि ग्रामीण रोजगार की कानूनी गारंटी को समाप्त करने की साजिश है।
सरजू शोरी ने कहा कि मनरेगा के तहत रोजगार पहले एक कानूनी अधिकार था, जिसमें काम मांगने पर काम देने की गारंटी थी। इस योजना में अब तक केंद्र सरकार की 90 प्रतिशत और राज्य सरकार की 10 प्रतिशत भागीदारी थी, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर राज्य भी ग्रामीण मजदूरों को रोजगार उपलब्ध करा पाते थे। लेकिन नए प्रावधानों में केंद्र सरकार ने अपना योगदान घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया है और राज्यों पर 40 प्रतिशत का अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल दिया गया है।
उन्होंने कहा कि यह बदलाव उन राज्यों के लिए बेहद घातक है, जो पहले से ही कर्ज में डूबे हैं। छत्तीसगढ़ पर वर्तमान में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है और सरकार को अपनी मौजूदा योजनाएं चलाने के लिए भी लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में मनरेगा के लिए अतिरिक्त 40 प्रतिशत राशि जुटा पाना राज्य सरकारों के लिए बड़ी चुनौती होगी। नियमों के अनुसार, जब तक राज्य अपनी हिस्सेदारी जमा नहीं करेगा, तब तक केंद्र अपना हिस्सा जारी नहीं करेगा। इसका सीधा असर यह होगा कि राज्य असमर्थ होने पर ग्रामीण मजदूरों को काम ही नहीं मिल पाएगा।
सरजू शोरी ने सवाल उठाया कि जब काम नहीं मिलेगा, तो बेरोजगारी भत्ते का बोझ कौन उठाएगा। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था गरीब से उसके रोजगार का अधिकार छीनने और उसकी थाली से रोटी हटाने के समान है। उन्होंने 100 से 125 दिन रोजगार देने की घोषणाओं को भी जमीनी हकीकत से दूर बताया।
उन्होंने दावा किया कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद लगभग 70 प्रतिशत गांवों में मनरेगा का काम अघोषित रूप से बंद पड़ा है। राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। पिछले 11 वर्षों में केंद्र में भाजपा सरकार रहने के बावजूद मनरेगा के तहत प्रति परिवार औसतन केवल 38 दिन का ही रोजगार मिल पाया है, जबकि कानूनी रूप से 100 दिन का प्रावधान है।
सरजू शोरी ने कहा कि यह बदलाव महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, काम की गरिमा और विकेंद्रीकृत विकास की अवधारणा के खिलाफ है। जिस योजना ने महामारी जैसे संकट में करोड़ों परिवारों को सहारा दिया, उसे अब शर्तों और नियंत्रणों में जकड़ा जा रहा है। नए प्रावधानों में फंड खत्म होने पर काम बंद करने, समय-सीमा तय करने और मौसम के नाम पर मजदूरों को काम से वंचित करने की छूट देकर रोजगार की गारंटी को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है।
उन्होंने इसे गरीब, मजदूर और किसान विरोधी कदम बताते हुए कहा कि नाम बदलने से इतिहास नहीं बदलता, लेकिन नीतियों से भविष्य जरूर बदलता है। यदि यही रास्ता अपनाया गया, तो यह बदलाव ग्रामीण भारत के लिए विकास नहीं, बल्कि आर्थिक बदहाली का नया अध्याय साबित होगा।