श्याम यादव
भारत को युवा देश कहा जाता है। यह वाक्य अब किसी खोज की तरह नहीं, बल्कि सरकारी विज्ञापन की पंक्ति की तरह दोहराया जाता है। विश्व युवा दिवस पर यह दावा और ऊँची आवाज़ में बोला जाता है—मानो सिर्फ संख्या गिनवा देने से भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन जश्न के शोर में जो सवाल दब जाते हैं, वही सवाल असल में इस दिवस का मतलब तय करते हैं। क्योंकि युवा होना अपने आप में ताकत नहीं है, अगर व्यवस्था कमजोर हो।
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। इसकी वजह भी है। देश की लगभग 68 प्रतिशत आबादी 15 से 64 वर्ष की कामकाजी आयु वर्ग में आती है। वहीं 10 से 24 वर्ष के बीच की आबादी करीब 26 प्रतिशत है। औसत आयु 28.4 वर्ष—यानी कई विकसित देशों से लगभग एक दशक कम। कागज़ पर यह तस्वीर शानदार दिखती है। नीति आयोग से लेकर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें तक इसे भारत का सबसे बड़ा ‘डेमोग्राफिक एडवांटेज’ बताती हैं।
लेकिन सवाल यह नहीं कि युवा कितने हैं। सवाल यह है कि उनके लिए जमीन पर क्या है।
2030 तक भारत में 1.04 अरब लोग कामकाजी उम्र में होंगे। इसी अवधि में देश का निर्भरता अनुपात घटकर 31.2 प्रतिशत तक आने का अनुमान है—यानी कम आश्रित, ज्यादा कामकाजी लोग। अनुमान यह भी है कि आने वाले दशक में वैश्विक कार्यबल का लगभग 24.3 प्रतिशत हिस्सा भारत से आएगा। ये आंकड़े किसी सपने जैसे लगते हैं, लेकिन इन्हीं आंकड़ों के नीचे भारत का युवा आज सबसे ज्यादा असुरक्षित भी है।
रोजगार के मोर्चे पर तस्वीर लगातार बिगड़ी है। पढ़ा-लिखा युवा नौकरी की कतार में सबसे आगे है। प्रतियोगी परीक्षाएं वर्षों तक नहीं होतीं, निजी क्षेत्र में स्थायित्व लगभग खत्म हो चुका है और सरकारी नौकरियाँ अब अपवाद बनती जा रही हैं। काम मिल भी जाए तो वह अस्थायी, ठेके पर और कम वेतन वाला होता है। युवा मेहनत कर रहा है, लेकिन भविष्य नहीं बना पा रहा।
शिक्षा व्यवस्था इस संकट को और गहरा करती है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से हर साल लाखों डिग्रियाँ निकलती हैं, लेकिन रोजगार देने लायक कौशल नहीं। उद्योग कहता है—योग्य उम्मीदवार नहीं मिलते, युवा कहता है—काम नहीं है। दोनों के बीच खड़ी है एक ऐसी प्रणाली, जो सिर्फ प्रवेश और परीक्षा तक जिम्मेदारी मानती है, परिणाम तक नहीं। स्किल डेवलपमेंट योजनाएँ कागज़ों में बड़ी हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका असर सीमित है।
ग्रामीण भारत का युवा इस पूरी कहानी में सबसे ज्यादा अदृश्य है। खेती अब पर्याप्त आय नहीं दे पा रही, लेकिन गांवों में उद्योग और सेवाओं के विकल्प भी नहीं हैं। नतीजा—पलायन। गांव से शहर आने वाला युवा सस्ता श्रमिक बन जाता है। शहर उसकी मेहनत लेता है, लेकिन उसे नागरिक नहीं मानता। झुग्गी, अस्थायी काम और सामाजिक असुरक्षा—यही उसका नया पता बन जाता है।
डिजिटल इंडिया ने युवाओं को मोबाइल और इंटरनेट तो दिया, लेकिन स्थिरता नहीं। सोशल मीडिया पर युवा सबसे ज्यादा मुखर है, लेकिन उतना ही असंतुलित भी। गुस्सा है, हताशा है, तुरंत प्रतिक्रिया है। ट्रेंड बदलते हैं, मुद्दे नहीं टिकते। गंभीर सवालों पर धैर्य नहीं बचा, क्योंकि व्यवस्था ने युवा को सोचने का समय ही नहीं दिया। हर चीज़ अब “तुरंत” चाहिए—नौकरी भी, पहचान भी, भविष्य भी।
मानसिक स्वास्थ्य का संकट इस पूरी स्थिति का सबसे खामोश संकेत है। प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, पारिवारिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ युवाओं को भीतर से थका रही हैं। तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसे मुद्दे अब अपवाद नहीं रहे, लेकिन इन पर बात करने की जगह अब भी मोटिवेशनल भाषण दिए जाते हैं—जैसे समस्या व्यवस्था की नहीं, इच्छाशक्ति की हो।
विश्व युवा दिवस पर सेमिनार होते हैं, बैनर लगते हैं, भाषण दिए जाते हैं। युवा फिर अगले दिन उसी अनिश्चितता में लौट जाता है। अगर 1.04 अरब कामकाजी उम्र के लोग देश में होंगे और उनके लिए सम्मानजनक शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य की व्यवस्था नहीं होगी, तो यह जनसांख्यिकीय लाभ नहीं, राष्ट्रीय जोखिम बनेगा।
देश का भविष्य युवाओं के कंधों पर बताया जाता है, लेकिन फैसले उनके बिना लिए जाते हैं। युवा नीति का विषय है, भागीदार नहीं। विश्व युवा दिवस का मतलब यही सवाल उठाना होना चाहिए—कि क्या हम युवाओं को सिर्फ संख्या की तरह देख रहे हैं, या नागरिक की तरह भी।
भीड़ अपने आप में ताकत नहीं होती। ताकत तब बनती है, जब उस भीड़ के पास दिशा हो, अवसर हो और भरोसा हो। भारत का युवा आज यही पूछ रहा है—हम बहुत हैं, लेकिन हमारे लिए है क्या?
सर 12 जनवरी युवा दिवस के लिए बना रहा हूँ l
आंकड़े : गूगल से है l इन्हें भी यूज किया है आप देख लीजिएगा
मुख्य आँकड़े:
भारत की लगभग 68% आबादी 15-64 आयु वर्ग में आती है।
भारत की लगभग 26% आबादी 10-24 वर्ष की आयु वर्ग की है, जो इसे विश्व स्तर पर सबसे युवा देशों में से एक बनाती है।
भारत की औसत आयु 28.4 वर्ष है , जो कई विकसित देशों की तुलना में कम है।
2030 तक, भारत में 1.04 अरब कामकाजी उम्र के व्यक्ति होंगे , और इसके साथ ही इसका निर्भरता अनुपात इतिहास में सबसे कम 31.2% होगा।
अनुमान है कि आने वाले दशक में भारत वैश्विक कार्यबल में 24.3% का योगदान देगा।