बिलासपुर। पति-पत्नी के संबंधों में मानसिक प्रताड़ना को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक उत्पीड़न, उपेक्षा, असहयोग और ऐसा व्यवहार, जिससे जीवनसाथी के स्वास्थ्य, करियर और मानसिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, वह भी वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जीवनसाथी की प्रतिष्ठा और करियर को नुकसान पहुंचाना मानसिक क्रूरता माना जाएगा। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने पत्नी को पति से तलाक का हकदार ठहराया और दुर्ग फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब विवाह केवल विवाद, तनाव और मुकदमेबाजी का कारण बन जाए, तो उसे बनाए रखना दोनों पक्षों के हित में नहीं होता।
ससुराल वालों पर प्रताड़ना का आरोप
मामले के अनुसार, दुर्ग जिले के निवासी पति-पत्नी का विवाह 30 मार्च 2019 को भिलाई के पंचशील नगर में हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के बाद पति और ससुराल पक्ष दहेज की मांग को लेकर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगे।
आरोप है कि पति ने मायके पक्ष से एक लाख रुपये की मांग की, जिसे पत्नी ने अपनी नौकरी से किस्तों में चुकाया। इसके बावजूद पति का दुर्व्यवहार जारी रहा और उसे लगातार मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ी।
मायके में रहने लगी पत्नी
पत्नी ने कोर्ट को बताया कि लगातार प्रताड़ना से परेशान होकर वह मई 2020 में पति का घर छोड़कर मायके में रहने लगी। इसके बाद सितंबर 2020 में उसने पति को कानूनी नोटिस भेजकर स्त्रीधन लौटाने और अलग रहकर जीवन बिताने की इच्छा जताई, लेकिन पति ने न तो नोटिस का जवाब दिया और न ही उसे वापस लाने का कोई प्रयास किया।
इसके बाद पत्नी ने दुर्ग फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2022 में पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने अब निरस्त कर दिया है।