गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के कुलपति ने आमंत्रित साहित्यकार से दुर्व्यवहार किया। अपने भाषण में कथित सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल किया, सोशल मीडिया में वीडियो वायरल होने के बाद कुलपति से माफी मांगने के लिए कहा जा रहा है और पद से पृथक करने की मांग भी उठ रही है।
बिलासपुर। बुधवार को बिलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के साहित्य अकादमी रायपुर के सहयोग से आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल के बोल बिगड़ गए । कार्यक्रम में उपस्थित लोगों के कथन अनुसार आलोक चक्रवाल अपने लंबे और उबाऊ भाषण में निरर्थक बातें कह रहे थे और विषय से भटक कर लतीफे बाजी कर रहे थे । अपने निरर्थक भाषण पर आसपास से पूछ भी रहे थे कि आप लोग बोर तो नहीं हो रहे हैं ? तब आमंत्रित कहानीकार मनोज रुपड़ा ने कहा कि आप विषय से भटक कर बोल रहे हैं । इस बात पर चक्रवाल को गुस्सा आ गया । चक्रवाल ने कहा कि आप में कुलपति से बात करने का विवेक नहीं है । फिर घमंड से भरकर मनोज रूपड़ा को कार्यक्रम से बाहर जाने के लिए बोले । वहां उपस्थित श्रोताओं का कहना है कि दूसरे को विवेक सिखाने वाला कुलपति खुद मवाली छाप अभद्र भाषा का उपयोग कर रहा था ।
यह घटना ऐसे समय हुई जब हाल ही में रायपुर में साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल के बीमार होने पर प्रधानमंत्री ने फोन करके हाल-चाल पूछा था । मुख्यमंत्री उनसे मिलने अस्पताल गए थे । उनके निधन पर राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई । साहित्य और संस्कृति के प्रति ऐसी संवेदनशील छत्तीसगढ़ सरकार के गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के कुलपति का घमंड उपस्थित श्रोताओं में किसी को रास नहीं आया । कुलपति ने तो उस समय यहां तक कहा कि जिसको भी जाना हो चले जाए । उन्हें लगता है कि कुलपति मुख्यमंत्री से भी बड़ा पद है । हर किसी को उनके पैरों में झुक कर बात करनी चाहिए ।
कुलपति चक्रवाल को मालूम होना चाहिए कि मीडिया का अधिकांश हिस्सा और पूरा सोशल मीडिया उनकी भर्त्सना से भरा हुआ है और हर कोई उनको धिक्कार भेज रहा है । आयोजन में से अधिकांश लेखक उठकर चले गए लेकिन महेश कटारे , जया जादवानी ,जयनंदन , मीना गुप्त और मोहनलाल छीपा जैसे लेखकों का बैठे रहना अचरज और दुख का विषय रहा । साहित्य जगत में इन लेखकों की चुप्पी और प्रतिरोध से मुंह मोड़ लेने की हरकत की भी आलोचना हो रही है । साहित्य और संस्कृति की दुनिया में यह बात जोर पकड़ रही है कि कुलपति को अपनी अभद्र भाषा के लिए माफी मांगनी चाहिए । यह सिर्फ एक साहित्यकार का नहीं पूरे साहित्यकार समाज का अपमान है ।गुरु घासीदास विश्वविद्यालय जैसी महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध संस्था में ऐसे कथित अशालीन और अभद्र व्यक्ति को कुलपति की कुर्सी कैसे मिल गई इसकी भी जांच होनी चाहिए !और यह लेखक समाज का अपमान उस समय हुआ है जब छत्तीसगढ़ सरकार रायपुर में इसी माह साहित्यिक महोत्सव करने जा रही है ।