आधार और ऋण पुस्तिका की अनिवार्यता का असर अब बाजार पर भी
राजकुमार मल
भाटापारा- किराना में उपभोक्ता मांग 50 फ़ीसदी रह गई है। 60 से 75 फ़ीसदी की टूट के बाद कपड़ा और बर्तन कारोबारियों ने भंडारण जैसे काम से हाथ खींच लिया हैं। लगभग शून्य की स्थिति में आ चुकी है सराफा और कीटनाशक बेचने वाली दुकानें।
प्रांगण में धान बेचने के पूर्व आधार कार्ड और ऋण पुस्तिका की अनिवार्यता का असर अब शहर के साथ ग्रामीण बाजारों में दिखाई देने लगा है। 50 से 80% की कमी उपभोक्ता मांग में आता देखकर अब न केवल अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है बल्कि अगाऊ सौदे पर भी ब्रेक लगाने लगीं हैं व्यापारिक संस्थानें क्योंकि नगद प्रवाह बेहद कमजोर हो चुका है।
सकते में किराना
पूर्व की भांति समय पर ही खुल रहीं हैं किराना दुकानें लेकिन आधा दिन गुजरने के बाद भी अपेक्षित खरीदी नहीं है क्योंकि सुबह-सुबह आने वाले उपभोक्ताओं में ज्यादातर किसान ही होते थे। यह अब नहीं आ रहे हैं। दोपहर बाद निकलने वाली शहरी मांग भी बेहद कमजोर हो चली है। चिंता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि अगले माह की खरीदी के लिए पर्याप्त पूंजी की कमी आ चुकी है।
सिर्फ इंतजार
खरीफ सत्र जीवन देने वाला माना जाता है कपड़ा और बर्तन बाजार के लिए लेकिन इस बार का खरीफ सत्र 60 से 75 फ़ीसदी टूट की खबर लेकर आया। ग्रामीण खरीदी के दम पर चलने वाले यह दोनों प्रतीक्षा कर रहे हैं उपभोक्ता मांग की जो फिलहाल तो चालू होने वाली नहीं है क्योंकि किसानों के पास भी पूंजी की समस्याएं अपने स्तर पर मजबूती से कायम हैं।
‘बोहनी’ नहीं
खरीफ फसल के दिनों में गुलजार रहने वाली सराफा दुकान सन्नाटे में डूबी हुईं हैं तो कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली दुकानें बोहनी की प्रतीक्षा में हैं। यह स्थिति बीते एक पखवाड़े से बनी हुई है। पूंजी की कमी का सामना यह दोनों इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मजबूत माना जाने वाला उपभोक्ता किसान समिति में टोकन और मंडी में ऋण पुस्तिका की अनिवार्यता जैसी समस्या से घिरा हुआ है।