मनरेगा के तहत जनकपुर में कराया गया था मजदूरी कार्य
भानुप्रतापपुर। विकास के दावों के बीच जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की तानाशाही और लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है। विकासखंड के जनकपुर जलाशय में नहर नाली निर्माण कार्य कराए 6 महीने बीत चुके हैं, लेकिन आज भी दर्जनों ग्रामीण अपनी मेहनत की कमाई के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि जब ग्रामीण अपनी फरियाद लेकर कार्यालय पहुँचते हैं, तो साहब मुख्यालय से नदारद मिलते हैं। ग्रामीणों ने विभाग के एसडीओ पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि जनकपुर जलाशय में नाली खुदाई का कार्य नियमानुसार मनरेगा के तहत मजदूरों से कराया जाना था। लेकिन नियमों को ताक पर रखकर अधिकारियों ने मशीनीकरण को बढ़ावा दिया और जेसीबी मशीन से खुदाई का कार्य संपन्न कराया। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि मशीन से कार्य कराकर उनके हक के रोजगार को छीना गया और अब भुगतान के नाम पर उन्हें दौड़ाया जा रहा है।अब देखना यह होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद जिला प्रशासन और विभाग की नींद खुलती है या इन ग्रामीणों का इंतजार और लंबा होता है।
लाखों का बकाया, मजदूरों के घरों में पसरा सन्नाटा
जनकपुर के पीड़ित ग्रामीणों पुरुषोत्तम, नमेंद्र, अनिल, सावंत, जागेश्वर, नारायण, माखन, सुखेन्द्र, संतोष, तामेश्वरी, ममता, सावित्री, बिमला, अनिता, नरसो, कुमारी, साधना और सुरेंद्र ने संयुक्त रूप से अपना दुखड़ा सुनाते हुए बताया कि विभाग पर उनकी कुल 34,452 रुपये की मजदूरी बकाया है। सिर्फ मजदूरी ही नहीं, बल्कि ट्रैक्टर मुरुम कार्य का भुगतान अटका है। डोजर और ट्रैक्टर फिलिंग का पैसा नहीं मिला है। जल्द मजदूरी का आश्वासन देकर कार्य कराया गया था किंतु महीनों बाद भी भुगतान नहीं किया गया है। अधिकारी ने पहले कहा की कार्य बंद हो गया है जैसे चालू होगा तो भुगतान किया जाएगा। अब तो ना कार्यालय में मिलते है ना ही फ़ोन उठाते है।
जेसीबी कार्य का भुगतान लंबित
अधिकारी मुख्यालय से गायब रहते है यहाँ किसान और मजदूर परेशान है। ग्रामीणों का आरोप है कि जल संसाधन विभाग के अधिकारी अक्सर मुख्यालय से नदारद रहते हैं। सिंचाई का सीजन हो या निर्माण कार्यों की देखरेख, अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण क्षेत्र के किसानों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मजदूरों का कहना है कि वे पिछले 6 महीनों से जल संसाधन कार्यालय की देहरी घिस रहे हैं, लेकिन खाली कुर्सी के अलावा उन्हें कुछ हासिल नहीं होता। हम गरीब लोग मजदूरी के भरोसे अपना घर चलाते हैं। 6 महीने से विभाग हमें गुमराह कर रहा है। जब भी ऑफिस जाते हैं, साहब मिलते ही नहीं। हमारी सुनने वाला कोई नहीं है। एक तरफ़ सरकार मनरेगा में 150 दिन का कार्य देने की बात करती है लेकिन उसका भुगतान पाने में लोगो के पशीने छूट जाते है।
विभाग पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल, जवाबदार मौन
जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे है। आखिर मनरेगा के नियमों के विरुद्ध जाकर जेसीबी से खुदाई क्यों कराई गई? बजट होने के बावजूद 6 महीने तक मजदूरों का पैसा क्यों रोका गया? मुख्यालय में अधिकारियों की अनुपस्थिति पर उच्चाधिकारी की मौन स्वीकृति है। एक ओर सिंचाई की अनुमति के लिए किसान भटक रहे है। दूसरी ओर मजदूरी भुगतान महीनों से लंबित है। पूरे मामले को जानते हुए भी उच्च अधिकारी अब तक इसका निराकरण क्यों नहीं कर पा रहे है यह सबसे बड़ा सवाल है? आख़िर मनरेगा के तहत कौन से कार्य स्वीकृत हुए थे जिनके मजदूरी भुगतान में समस्या आ रही है?
