World Homeopathy Day
आज विश्व भर में होम्योपैथी दिवस मनाया जा रहा है. होम्योपैथी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी चिकित्सा प्रणाली है. यह दिन होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के संस्थापक डॉ. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सैमुअल हैनिमैन (Dr. Samuel Hahnemann) की जयंती का प्रतीक है.
इस दिन दुनिया भर में होम्योपैथी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए सेमिनार, कार्यशालाएं और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं. भारत सहित कई देशों में होम्योपैथी को एक प्रभावी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में अपनाया गया है.

डॉ. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सैमुअल हैनिमैन
आज डॉ. हैनिमैन की जयंती पर हम होम्योपैथी के योगदान को सलाम करते हैं और इसके वैज्ञानिक विकास की कामना करते हैं. ये एक जर्मन चिकित्सक थे और इन्हें होम्योपैथी का संस्थापक भी कहा जाता है. जर्मन चिकित्सक और केमिस्ट सैमुअल हैनीमैन (1755-1843) द्वारा व्यापक रूप से सफलता पाने के बाद 19वीं शताब्दी में होम्योपैथी को पहली बार प्रमुखता मिली, लेकिन इसकी उत्पत्ति 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व की है. हैनीमैन उन चिकित्सा तरीकों और दवाओं के खिलाफ थे जो शरीर पर साइड इफेक्ट डाल रहे थे. उनके इसी सोच ने चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ ऐसा खोजा, जिससे उन्हें होम्योपैथी के संस्थापक के रूप में पहचान मिली.
वर्ल्ड होम्योपैथी डे 2025 की थीम ‘अध्ययन, अध्यापन, अनुसंधान’ (Adhyayan, Adhyaapan, Anusandhaan) तय की गई है. यह थीम होम्योपैथी की ग्रोथ के तीन फंडामेंटल पिलर्स पर प्रकाश डालती है.
होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह रोग को जड़ से खत्म करने की दिशा में काम करती है। यह न केवल लक्षणों को दबाती है, बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाती है। इसके अतिरिक्त, यह दवाएं बिना किसी साइड इफेक्ट के दी जा सकती हैं और किसी भी उम्र के लोगों के लिए उपयुक्त होती हैं। विशेष रूप से त्वचा रोग, एलर्जी, पाचन समस्याओं, माइग्रेन, मानसिक तनाव और सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियों में होम्योपैथी बहुत प्रभावी मानी जाती है।