सुबह के नाश्ते में पोहा खाना किसे पसंद नहीं है। जब भी पोहे का नाम आता है, तो सबसे पहले मध्य प्रदेश के इंदौर का नाम जुबान पर आ जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस पोहे को आप इंदौरी डिश मानते हैं, असल में वह वहां का है ही नहीं। इस बात को जानकर आपको थोड़ा झटका जरूर लग सकता है, लेकिन यह बिल्कुल सच है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पोहे का जिक्र प्राचीन समय से मिलता है। संस्कृत साहित्य में इसे चिपिटा या चिवड़ा कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सुदामा भगवान कृष्ण से मिलने गए थे, तब वे अपने साथ उपहार के रूप में यही पोहा लेकर गए थे। इसके प्रमाण धार्मिक ग्रंथों में भी मिलते हैं।
अगर आज के समय की बात करें, तो पोहा असल में महाराष्ट्र का एक पारंपरिक व्यंजन है। इसकी शुरुआत सबसे पहले महाराष्ट्र के नागपुर क्षेत्र से हुई थी। वहां के किसान खेतों में काम करने के दौरान इसे आसानी से बना लेते थे। इसके बाद जब मराठा शासक मध्य प्रदेश पहुंचे, तो वे अपने साथ इस स्वादिष्ट व्यंजन को भी लेते आए। इंदौर में आकर पोहे के साथ जलेबी का मेल हुआ और यह वहां की पहचान बन गया।
महाराष्ट्र में आज भी पोहे की कई अलग-अलग किस्में बनाई जाती हैं। प्याज वाले पोहे को कांदे पोहे, आलू वाले को बटाटा पोहे और दही से बनने वाले को दडपे पोहे कहा जाता है। इसके अलावा नागपुर में इसकी तर्री पोहे वाली वैरायटी भी बहुत मशहूर है। भले ही पोहे की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई हो, लेकिन आज इसे मध्य प्रदेश में सबसे चाव से खाया जाता है।