अपनों के ही निशाने पर भाजपा
प्रदेश में मंत्रिमंडल में फेरबदल का हल्ला अभी थमा नहीं है, बल्कि कुछ समय के लिए आगे बढ़ गया है। जिन्हे बाहर जाने का डर सता रहा है वो बने रहने की कवायद में लगे हैं और जिन्हें अंदर आना है वो अपने नंबर बढ़ाने का कोई मौका नहीं चूक रहे। अभी विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है, जिसमें कांग्रेस से ज्यादा आक्रामक भाजपा के वरिष्ठ विधायक रहे। पूरे सत्र में इन वरिष्ठ विधायकों ने ऐसा सीन क्रिएट किया कि भाजपा ने इन लोगों को मंत्री ना बनाकर कोई गुनाह कर दिया। सत्र भर ये वरिष्ठ विधायक अपनी गुणवत्ता साबित करने में लगे रहे। भाजपा के वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर, धरम लाल कौशिक और राजेश मूणत पूरा समय अपनी ही सरकार को घेरने में लगे रहे। इन नेताओं के निशाने पर रहे स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, लोक निर्माण मंत्री अरुण साव, वित्त मंत्री ओ पी चौधरी और राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा। भाजपा विधायक अजय चंद्राकर और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के बीच तो गरमा गरम बहस भी हुई। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने वित्त मंत्री को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। पूरे सत्र के दौरान ऐसा लग रहा था कि भाजपा के वरिष्ठ और मंत्री रहे ये विधायक भाजपा आलाकमान को यह बता रहे हों कि आपने जिन लोगों को मंत्री बनाया है उन्हें कुछ आता जाता नहीं है। इसलिए जितनी जल्दी हो सके यह गलती सुधार ली जाए। वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर और धरम लाल कौशिक ने अपने सवालों से श्याम बिहारी जायसवाल को बार बार असहज किया।
यह कोई पहली बार नहीं है हर सत्र में भारतीय जनता पार्टी के ये गिने चुने वरिष्ठ विधायक सदन में विपक्ष की कमी को पूरा कर देते हैं। सच तो यही है कि भाजपा के इन विधायकों के पास खोने को कुछ बचा नहीं है शायद इन आक्रामक तेवरों के चलते ही कुछ हासिल हो जाये।
कमीशन की परतें और जवाबदेही का सवाल
कवर्धा के कथित 60 करोड़ रुपये के धान घोटाले की जांच अब केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि जवाबदेही के दायरे पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। समिति प्रबंधकों, कंप्यूटर ऑपरेटरों और अन्य कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी परिवारों ने आरोप लगाया है कि कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रखी जा रही है, जबकि यदि कथित तौर पर कमीशन का कोई तंत्र था तो उसके लाभार्थियों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। परिजनों का दावा है कि धान खरीदी के दौरान विभिन्न स्तरों पर प्रतिशत के आधार पर कथित कमीशन बांटे जाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। उन्होंने अलग-अलग अधिकारियों और विभागों के लिए कथित हिस्सेदारी का भी उल्लेख किया है। हालांकि इन दावों की अब तक किसी सरकारी एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है और न ही जांच में ऐसी किसी व्यवस्था का आधिकारिक खुलासा हुआ है। यही कारण है कि इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अब निष्पक्ष और व्यापक जांच बन गया है।
करोड़ों रुपये के कथित घोटाले में यदि निर्णय, सत्यापन और भुगतान की प्रक्रिया कई स्तरों से होकर गुजरती है, तो जांच का दायरा भी उसी अनुपात में व्यापक होना चाहिए। केवल कर्मचारियों पर कार्रवाई और उच्च स्तर की भूमिका की अनदेखी न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है। आरोपों की सत्यता का फैसला जांच और अदालत करेंगी, लेकिन यह मामला एक बार फिर यह संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप में जवाबदेही नीचे से ऊपर तक समान रूप से तय होनी चाहिए। तभी जांच पर जनता का भरोसा कायम रह सकेगा।
कुर्सी का विवाद या कानून की कसौटी?
छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के अध्यक्ष पद को लेकर छिड़ा विवाद अब केवल दो व्यक्तियों के बीच का मतभेद नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून, प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया की व्याख्या का विषय बन गया है। राज्य सरकार ने आदेश जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि डॉ. किरणमयी नायक का तीन वर्षीय कार्यकाल 12 जुलाई 2026 को समाप्त हो गया और 13 जुलाई से वह पद पर नहीं हैं। दूसरी ओर, डॉ. नायक का दावा है कि मामला हाईकोर्ट में लंबित है और प्रभावी स्थगन आदेश के कारण वे स्वयं को अब भी वैध अध्यक्ष मानती हैं। इस बीच नवनियुक्त अध्यक्ष ममता साहू ने शासन के आदेश के आधार पर पदभार संभाल लिया है और उनका कहना है कि यदि किसी को नियुक्ति पर आपत्ति है तो उसका समाधान न्यायालय में होना चाहिए। दोनों पक्ष अपने-अपने कानूनी तर्कों के साथ सामने हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि जब कोई मामला अदालत में विचाराधीन हो, तब प्रशासनिक फैसलों और न्यायिक आदेशों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। ऐसे संवेदनशील मामलों में बयानबाजी से अधिक महत्व विधिक स्पष्टता का होता है। महिला आयोग जैसी संस्था, जिसका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है, वह स्वयं यदि नेतृत्व विवाद में उलझ जाए तो उसकी साख और कार्यक्षमता दोनों प्रभावित होती हैं। अब इस विवाद का अंतिम समाधान अदालत के फैसले से ही निकलेगा। तब तक यह आवश्यक है कि सभी पक्ष न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करें और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखें। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था और विधि के शासन की वास्तविक कसौटी भी है।
राहत की कीमत या अधिकारों की शर्त
छत्तीसगढ़ सरकार ने पंचायत सचिवों की वर्ष 2025 की 31 दिन की हड़ताल अवधि को अर्जित एवं विशेष अवकाश में समायोजित कर लंबे समय से लंबित एक मांग का समाधान कर दिया है। पहली नजर में यह फैसला राहत देने वाला प्रतीत होता है, लेकिन इसके साथ जो शर्त जोड़ी गई है, उसी ने पूरे आदेश को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह राहत भविष्य में कभी हड़ताल पर न जाने की शर्त के अधीन होगी। यहीं से बहस शुरू होती है। एक ओर सरकार का तर्क हो सकता है कि ग्रामीण विकास जैसी आवश्यक सेवाएं लगातार बाधित नहीं होनी चाहिए और प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। दूसरी ओर कर्मचारी संगठनों का मानना है कि हड़ताल लोकतांत्रिक विरोध का अंतिम माध्यम होती है। यदि इस अधिकार पर स्थायी शर्त लगा दी जाए, तो भविष्य में अपनी मांगों को प्रभावी ढंग से रखने का विकल्प सीमित हो सकता है। सवाल यह भी है कि क्या किसी प्रशासनिक राहत की कीमत कर्मचारियों के भविष्य के आंदोलन के अधिकार से चुकाई जानी चाहिए? इसका उत्तर केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि कानून और सेवा नियमों की कसौटी पर तय होगा। यदि यह शर्त भविष्य में विवाद का कारण बनती है तो इसकी न्यायिक समीक्षा भी संभव है। फिलहाल सचिवों को आर्थिक राहत जरूर मिली है, लेकिन उसके साथ एक नई जिम्मेदारी और अनिश्चितता भी जुड़ गई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह आदेश स्थायी समाधान साबित होता है या फिर कर्मचारी अधिकारों और सरकारी अनुशासन के बीच एक नए विवाद की शुरुआत बनता है।
खनिज का धन, विकास का वहम
जिला खनिज न्यास निधि (डीएमएफ) का मूल उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को बेहतर जीवन, बुनियादी सुविधाएं और विकास उपलब्ध कराना था लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की हालिया रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि उद्देश्य और परिणाम के बीच बड़ी खाई मौजूद है। रिपोर्ट के अनुसार, हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद बहुत सारे खनन प्रभावित गांव अपेक्षित लाभ से वंचित रह गए। रिपोर्ट में योजना निर्माण, बजट, कार्य स्वीकृति, खरीद प्रक्रिया और निगरानी से जुड़ी गंभीर खामियों का उल्लेख किया गया है। कई स्थानों पर वार्षिक कार्ययोजना के बिना खर्च किया गया, प्रभावित क्षेत्रों की पहचान से पहले ही परियोजनाएं स्वीकृत हो गईं और कई परिसंपत्तियां उपयोग में आए बिना ही निष्प्रभावी साबित हुईं। इससे यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि योजना का केंद्र बिंदु खनन प्रभावित समुदाय थे, तो विकास का लाभ उन तक क्यों नहीं पहुंचा? सीएजी ने यह भी इंगित किया है कि कुछ खर्च ऐसे कार्यों पर हुए जो योजना की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाते थे। वहीं, खरीद प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी तथा रिक्त पदों ने भी प्रभावी क्रियान्वयन को प्रभावित किया। यदि ये निष्कर्ष सही है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं के कमजोर क्रियान्वयन का भी विषय है। अब आवश्यकता दोषारोपण से अधिक सुधार की है। डीएमएफ जैसी योजनाओं की सफलता केवल धन खर्च करने से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव से मापी जानी चाहिए। खनिज संपदा का वास्तविक लाभ तभी माना जाएगा, जब खनन प्रभावित गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और बुनियादी सुविधाओं में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दे। इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है।