दूसरी तरफ 15 स्थानीय शिक्षकों को सस्पेंड कर घर बैठाया; शासन की अजीब नीति समझ से परे!
चारामा। छत्तीसगढ़ शासन भले ही शिक्षा के स्तर को सुधारने और ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन कांकेर जिले के चारामा विकासखंड से जो जमीनी हकीकत सामने आई है, वह सरकारी दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है।
एक तरफ जहां चारामा ब्लॉक के लगभग 30 प्राथमिक स्कूल “एकल शिक्षक” (सिर्फ एक टीचर) के भरोसे दम तोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इसी विकासखंड के 15 अनुभवी शिक्षक-शिक्षिकाओं को सस्पेंड (निलंबित) कर पिछले 6 महीनों से घर बैठा दिया गया है। जब खुद चारामा ब्लॉक में शिक्षकों का भारी टोटा है, तो यहाँ के शिक्षकों को जबरन दूसरे ब्लॉक में भेजने और न जाने पर नौकरी से निकालने का फरमान जारी करना शासन-प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
नियम कहता है कम से कम 2 शिक्षक, धरातल पर 30 स्कूल ‘एकल’
शिक्षा के अधिकार (RTE) और शासन के खुद के नियमानुसार, प्रत्येक प्राथमिक शाला में बच्चों के भविष्य को गढ़ने के लिए कम से कम एक प्रधान पाठक (HM) और एक सहायक शिक्षक का होना अनिवार्य है। लेकिन चारामा में नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।
सेवानिवृत्ति और अतिरिक्त प्रभार से गहराया संकट
इस बदहाली के पीछे मुख्य कारण यह है कि बीते एक वर्ष में चारामा ब्लॉक से लगभग 19 से 20 नियमित शिक्षक सेवानिवृत्त (रिटायर) हो चुके हैं, जिनकी जगह आज तक नई भर्ती या पदस्थापना नहीं की गई। इसके अलावा कई स्कूलों के शिक्षक या तो संकुल समन्वयक (CAC) का काम देख रहे हैं, या उन पर आश्रमों का अतिरिक्त प्रभार है। नतीजा यह है कि विकासखंड के लगभग 25 से 30 स्कूल पूरी तरह एकल शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
पढ़ाए या कागजी पेट भरे? योजनाओं के बोझ तले दबा अकेला शिक्षक
आज की तारीख में शासन की इतनी सारी योजनाएं, नित नए कार्यक्रम और ऑनलाइन डेटा एंट्री की इतनी ‘लिखा-पढ़ी’ है कि अकेले शिक्षक का पूरा समय मोबाइल पर कागजी खानापूर्ति करने में ही निकल जाता है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यह उठता है कि वह अकेला शिक्षक दफ्तर के बाबू का काम संभाले, संकुल की बैठक में जाए या क्लास रूम में जाकर बच्चों का भविष्य गढ़े?
युक्तीकरण का अजीब खेल: 15 शिक्षक निलंबित, बिना वेतन घर बैठने को मजबूर
इस संकट के बीच पिछले वर्ष शासन द्वारा ‘अतिशेष और युक्तीकरण’ (Rationalization) के तहत चारामा विकासखंड से कई शिक्षकों का स्थानांतरण सुदूर क्षेत्रों में किया गया था। प्रशासनिक दबाव के चलते कई शिक्षकों ने बाद में भी जैसे-तैसे जॉइनिंग ले ली, लेकिन लगभग 15 शिक्षक-शिक्षिकाएं ऐसी हैं जिन्होंने ट्रांसफर वाली जगहों पर जॉइन ही नहीं किया।
नतीजा यह हुआ कि शासन ने इन सभी 15 शिक्षकों को निलंबित कर दिया है। पिछले 6 महीनों से ये सभी शिक्षक बिना किसी वेतन के घर बैठे हैं और किसी रहमदिल आदेश का इंतजार कर रहे हैं। इन 15 निलंबित शिक्षकों में 10 महिला शिक्षिकाएं भी शामिल हैं, जो इस कड़े रवैये की मार झेल रही हैं।
आखिर क्यों जॉइन नहीं कर पा रहे शिक्षक? सामने आई यह बड़ी मजबूरियां
शिक्षकों के जॉइन न करने के पीछे कोई लापरवाही नहीं, बल्कि बेहद जायज, संवेदनशील और गंभीर कारण हैं, जिन्हें प्रशासन जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है:
- नदी के उस पार स्कूल, पुल का नामोनिशान नहीं: शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी भौगोलिक मुसीबत यह है कि कई आवंटित स्कूल नदी के उस पार स्थित हैं, जहां आज तक पुल का निर्माण ही नहीं हो पाया है। वर्तमान में बारिश का मौसम शुरू हो चुका है और ऐसे में उफनती नदी को पार करके रोजाना स्कूल पहुंच पाना व्यावहारिक रूप से पूरी तरह असंभव है। जान जोखिम में डालकर नौकरी करने की इस मजबूरी के आगे शिक्षक बेबस हैं।
- सुविधाओं का घोर अभाव: इन शिक्षकों का तबादला कोयलीबेड़ा, पखांजूर और अंतागढ़ जैसे सुदूर अंचलों में किया गया है। जानकारी के अनुसार, जब ये शिक्षक आवंटित जगहों पर पहुंचे, तो वहां न तो रहने की कोई सुरक्षित व्यवस्था थी, न पक्की सड़कें और न ही अन्य बुनियादी सुविधाएं।
- पारिवारिक मजबूरियां: निलंबित महिला शिक्षकों में कई ऐसी हैं जिनके छोटे-छोटे मासूम बच्चे हैं। इतनी सुदूर, साधनहीन और नदी पार के क्षेत्रों में छोटे बच्चों को लेकर जाना या उन्हें घर पर अकेला छोड़ना किसी भी मां के लिए मुमकिन नहीं है।
- प्रशासनिक तालमेल की कमी (लौटने को हुए मजबूर): सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि कुछ स्कूलों की व्यवस्था ऐसी थी जहां पहले से ही दो शिक्षक मौजूद थे। ऐसे में वहां तीसरे शिक्षक को जॉइन कराने से साफ मना कर दिया गया। विभागीय तालमेल न होने के कारण शिक्षकों को वहां से बैरंग वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ा, लेकिन गाज फिर भी शिक्षकों पर ही गिरी।
दो दिन पहले भरवाया गया ‘शपथ पत्र’: नौकरी छोड़ो या दूर भागो!
हैरानी की बात यह है कि अभी दो दिन पूर्व ही इन सस्पेंड बैठे अतिशेष शिक्षकों से प्रशासन द्वारा एक कड़ा ‘शपथ पत्र’ (Affidavit) भरवाया गया है। इस शपथ पत्र में साफ लिखावाया गया है कि यदि वे नई जगह पर सर्विस ज्वाइन नहीं करते हैं, तो उन्हें स्वेच्छा से नौकरी छोड़नी पड़ेगी। शिक्षकों का आरोप है कि शासन-प्रशासन उनके साथ किसी ‘दुश्मनी’ की तरह व्यवहार कर रहा है और उन्हें लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।
बड़ा सवाल: जब खुद के घर में कमी, तो पड़ोस में क्यों भेज रहे?
आम जनता और बुद्धिजीवियों का सवाल है कि जब खुद चारामा विकासखंड के 30 से अधिक स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है, तो यहाँ के स्थानीय शिक्षकों को राहत देकर यहीं रिक्त पदों पर पुनः नियुक्त क्यों नहीं किया जा रहा? अपने ही ब्लॉक में पद खाली होने के बावजूद शिक्षकों को जबरन दूसरे विकासखंड में धकेलना शासन की किस नीति का हिस्सा है, यह समझ से परे है।
प्रशासनिक पक्ष: नियमों का हवाला और एडजस्टमेंट का दावा
इस पूरे गंभीर मामले पर जब जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) श्री रमेश निषाद से सीधी बात की गई, तो उन्होंने साफ कहा:
“यह पूरी प्रक्रिया शासन के सीधे आदेश और नीति के तहत हो रही है। इसमें जिला स्तर पर हमारे द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता। शासन जैसा निर्देश देती है, हम उन नियमों का कड़ाई से पालन करा रहे हैं। चूंकि वे शासकीय सेवा में हैं, इसलिए उन्हें शासन के आदेश का पालन करना ही होगा। यदि वे आदेश की अवहेलना करते हैं और जॉइन नहीं करते, तो नियमानुसार बर्खास्तगी (सेवा से पृथक) की कार्रवाई की जावेगी।”
शिक्षकों की कमी पर DEO श्री रमेश निषाद का आगे कहना है:
“जिन स्कूलों में वर्तमान में शिक्षकों का टोटा है, वहां जिन स्कूलों में शिक्षक अधिक (अतिशेष) हैं, वहां से शिक्षकों को अटैच या एडजस्ट किया जावेगा ताकि किसी भी सूरत में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।”
‘जनधारा’ का तीखा सवाल
जिला शिक्षा अधिकारी का यह तर्क भी गले नहीं उतरता। जब पूरे विकासखंड में शिक्षकों की संख्या ही कम पड़ रही है, तो ‘एक जेब से निकालकर दूसरी जेब में डालना’ यानी एडजस्टमेंट करना कब तक चलेगा? क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े छात्र आंदोलन या इन महिला शिक्षकों के सब्र का बांध टूटने का इंतजार कर रहा है? देखना होगा कि कुंभकर्णी नींद में सोया शिक्षा विभाग इस कड़कती आवाज को सुनकर कब जागता है।
अनूप वर्मा, संवाददाता