घोषणाएं फेल: दो साल से टूटा हाराडुला महानदी पुल, जान जोखिम में डालने को मजबूर स्कूली बच्चे

चारामा। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच कांकेर जिले के चारामा ब्लॉक से जमीनी हकीकत की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। नेशनल हाईवे से ग्राम रतेसरा होकर ग्राम हारादुला से नहरपुर को जोड़ने वाला महानदी पुल पिछले लगभग दो वर्ष से क्षतिग्रस्त पड़ा है। साल 2024 की भारी बारिश के दौरान इस पुल का एक हिस्सा टूट गया था, जिसके बाद से ही इस क्षेत्र का संपर्क मुख्य मार्ग से पूरी तरह कट चुका है। हैरान करने वाली बात यह है कि आने वाले अगस्त महीने में इस तबाही और ग्रामीणों की परेशानी को पूरे दो साल मुकम्मल हो जाएंगे, लेकिन शासन-प्रशासन इस गंभीर समस्या पर गहरी चुप्पी साधे बैठा है। अधिकारियों की इस अनदेखी से क्षेत्र के सैकड़ों ग्रामीणों का आक्रोश अब सातवें आसमान पर है।

डिप्टी सीएम अरुण साव की घोषणा के बाद भी ठंडे बस्ते में फाइल

ग्रामीणों ने ‘जनधारा न्यूज़’ को बताया कि अगस्त 2024 में जब यह पुल क्षतिग्रस्त हुआ था, तभी से वे लगातार इसके निर्माण और मरम्मत की मांग कर रहे हैं। इस संबंध में ग्राम के सरपंच, मुखिया और पटेलों ने निजी रूप से प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं जिले के प्रभारी मंत्री अरुण साव से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन सौंपा था। मुलाकात के दौरान खुद उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने जल्द से जल्द पुल निर्माण कराने की बड़ी घोषणा भी की थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि सूबे के उपमुख्यमंत्री और प्रभारी मंत्री की घोषणा के बावजूद काम पूरी तरह ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जब इतने बड़े पद पर बैठे नेता की घोषणा का कोई असर नहीं हो रहा, तो फिर आम जनता किसके भरोसे रहे?

चारामा और नहरपुर मुख्यालय को जोड़ने वाली एकमात्र ‘लाइफलाइन’ ठप

यह पुल केवल कंक्रीट का एक ढांचा नहीं है, बल्कि महानदी के उस पार बसे दर्जनों गांवों की लाइफलाइन (जीवन रेखा) है। यह मार्ग ग्रामीणों को चारामा ब्लॉक मुख्यालय और सैकड़ों गांवों को नहरपुर मुख्यालय से जोड़ता है। पुल के टूटने के कारण आज इन गांवों का संपर्क पूरी तरह प्रभावित हो चुका है, जिससे व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी तरह पटरी से उतर गई हैं।

मिट्टी परीक्षण के बाद आगे नहीं बढ़ी बात

ग्रामीणों के अनुसार, लगभग एक वर्ष पहले पुल के निर्माण के लिए एक तकनीकी टीम मिट्टी परीक्षण (Soil Testing) करने आई थी। उस वक्त ग्रामीणों में उम्मीद जागी थी कि डिप्टी सीएम की घोषणा का असर दिख रहा है और जल्द ही काम शुरू होगा, लेकिन उस बात को भी आज पूरा एक साल बीत चुका है। मिट्टी परीक्षण के बाद फाइल ऐसी दबी कि आज तक निर्माण की दिशा में एक ईंट भी नहीं रखी गई है।

स्कूली बच्चों और राहगीरों की जान दांव पर, हादसे का इंतजार कर रहा प्रशासन?

वर्तमान में फिर से बारिश का मौसम शुरू हो चुका है, जिससे ग्रामीणों और स्कूली बच्चों की मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं। रतेसरा और सरादुनावा गांव के छात्र-छात्राएं, जो हाराडुला हाई स्कूल पढ़ने जाते हैं, उन्हें रोज खतरों से खेलना पड़ रहा है।

बाकी दिनों में ग्रामीण नदी पर बने एनिकट (स्टॉप डैम) के ऊपर से जैसे-तैसे पार हो जाते हैं, लेकिन बारिश के दिनों में एनिकट के ऊपर से पानी बहने के कारण वहां से गुजरना मौत को दावत देने जैसा है। इसके बावजूद, कई पैदल यात्री और मासूम बच्चे आज भी उसी टूटे और क्षतिग्रस्त पुल के ऊपर से जान जोखिम में डालकर आवागमन कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर प्रशासन की नीयत साफ होती, तो अस्थाई रूप से मरम्मत करवाकर हल्के वाहनों और पैदल यात्रियों के लिए रास्ता सुचारू किया जा सकता था, लेकिन इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया।

3 किलोमीटर का सफर, अब 10 किलोमीटर का चक्कर!

अगर हाराडुला के ग्रामीणों को जिला मुख्यालय कांकेर जाना हो, तो पुल के रास्ते इसकी दूरी महज 3 किलोमीटर बैठती है। लेकिन पुल टूटने के कारण अब उन्हें मजबूरी में चारामा होकर लंबा चक्कर काटकर जाना पड़ता, जिससे यह दूरी बढ़कर 8 से 10 किलोमीटर हो जाती है। पेट्रोल के बढ़ते दाम और समय की इस बर्बादी से आम जनता त्रस्त हो चुकी है।

क्या कहती हैं ग्राम सरपंच?

“हमारी पंचायत की तरफ से हमने प्रभारी मंत्री अरुण साव जी और कई अन्य मंत्रियों को लिखित में बार-बार आवेदन देकर जल्द से जल्द पुल निर्माण की मांग की है। स्वयं प्रभारी मंत्री जी ने भी इसके लिए घोषणा की थी। हमारे ग्रामीणों को चारामा, कांकेर या अन्य मुख्यालयों में जाने के लिए घूमकर जाना पड़ रहा है। शासन-प्रशासन को इस उदासीन रवैये को छोड़कर जल्द से जल्द हमारी समस्या का समाधान करना चाहिए।”

– सुशीला मरकाम (सरपंच, ग्राम पंचायत हाराडुला)

उग्र आंदोलन के मूड में जनता

इस लगातार हो रही उपेक्षा के कारण सिर्फ स्थानीय ग्रामीण ही नहीं, बल्कि इस मार्ग से गुजरने वाले हर राहगीर का गुस्सा फूट पड़ा है। लोगों का साफ कहना है कि यदि शासन-प्रशासन ने इस बारिश में भी पुल के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया तुरंत शुरू नहीं की, तो पूरा क्षेत्र मिलकर उग्र आंदोलन और चक्काजाम करने के लिए बाध्य होगा। अब देखना होगा कि कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन इस कड़कती आवाज को सुनता है या किसी बड़े हादसे का इंतजार करता है।

– ब्यूरो रिपोर्ट, जनधारा न्यूज़ (चारामा)

अनूप वर्मा,

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