नई तकनीक का खतरनाक सच: जापान जितनी बिजली और भारत जितना पानी गटक रहे हैं कंप्यूटर सर्वर, अमेरिका में भारी विरोध शुरू

डिजिटल दुनिया का यह कैसा विस्तार है जो हमारी धरती के प्राकृतिक संसाधनों को तेजी से खत्म कर रहा है। इंटरनेट और कंप्यूटर के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट सामने आई है, जिसने सबको चौंका दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी कंपनियों के भारी-भरकम कंप्यूटर सर्वर हमारी बिजली, पानी और जमीन पर बहुत बड़ा दबाव बना रहे हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अमेरिका के कई शहरों में आम लोग अब इन बड़ी इंटरनेट कंपनियों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

एक देश के बराबर बिजली की भारी खपत

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, आने वाले कुछ सालों में इन कंप्यूटर डेटा सेंटर्स की बिजली खपत बढ़कर 945 टेरावॉट-आवर तक पहुंच सकती है। इस आंकड़े को आसान भाषा में समझें तो यह खपत जापान जैसे एक पूरे विकसित देश की सालाना बिजली खपत के बराबर है। जब हम इंटरनेट पर कोई जानकारी खोजते हैं या कोई डिजिटल काम करते हैं, तो पीछे चल रहे सर्वर कुछ ही सेकंड में उतनी बिजली खींच लेते हैं, जिससे एक आम भारतीय परिवार का घर महीनों तक रोशन हो सकता है। यह पूरी दुनिया की कुल बिजली का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा है।

मशीनों को ठंडा रखने में खर्च हो रहा है अरबों लोगों का पानी

बिजली से भी बड़ा संकट पानी का है। अर्थ डॉट ओआरजी की रिपोर्ट बताती है कि इन इंटरनेट सर्वरों को चौबीसों घंटे चालू रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। असल में, जब ये कंप्यूटर सिस्टम लगातार काम करते हैं, तो इनके अंदर लगी चिप बहुत ज्यादा गर्म हो जाती हैं। उन्हें ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है। अनुमान है कि आने वाले समय में ये सर्वर करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी पी जाएंगे। यह पानी इतना ज्यादा है कि इससे भारत जैसे विशाल देश की पूरी आबादी की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। एक तरफ दुनिया के कई शहरों में पीने के पानी की किल्लत है, वहीं दूसरी तरफ यह साफ पानी मशीनों का तापमान घटाने में उड़ाया जा रहा है।

जनता का फूटा गुस्सा और अटके बड़े प्रोजेक्ट्स

संसाधनों की इस बर्बादी को देखकर अब जनता का सब्र टूट रहा है। अमेरिका के कई राज्यों में स्थानीय नागरिकों ने कंपनियों के नए प्रोजेक्ट्स का काम रुकवा दिया है। लोगों को डर है कि इन सेंटर्स की वजह से उनके हिस्से का पानी और बिजली खत्म हो जाएगी। जनता के इस कड़े विरोध के कारण पिछले साल करीब 200 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स या तो रद्द करने पड़े या उनका काम रोक दिया गया है।

अधिकारी और पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि इन कंपनियों ने पर्यावरण के अनुकूल सोलर या विंड एनर्जी और वॉटर रीसाइक्लिंग का सही विकल्प तुरंत नहीं ढूंढा, तो आने वाले समय में यह डिजिटल क्रांति मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा संकट बन जाएगी।

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