बिलासपुर /रायपुर
छत्तीसगढ़ प्रदेश के लिपिक संवर्ग के लिए आत्मसम्मान और हक की लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर आ गई है। पिछले 44 वर्षों से लंबित वेतनमान संशोधन की मांग, जो शासन-प्रशासन की फाइलों में दबी हुई थी, अब माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर की शरण में है।
लगातार उपेक्षा से त्रस्त लिपिकों ने अंततः न्यायालय के माध्यम से अपने अधिकारों को पाने के लिए याचिका दायर कर दी है।
प्रमुख बिंदु: आखिर क्यों भड़का आक्रोश?
ऐतिहासिक उपेक्षा: कर्मचारियों का आरोप है कि बीते चार दशकों में कई सरकारें आईं और गईं, अनगिनत ज्ञापन और आवेदन सौंपे गए, लेकिन नतीजा सिफर रहा।
वेतन विसंगति की मार: अन्य समकक्ष संवर्गों की तुलना में लिपिकों के वेतनमान में भारी असमानता है। जहाँ अन्य विभागों के पदों का उन्नयन हुआ, वहीं लिपिक संवर्ग आज भी पुराने ढांचे में फंसा हुआ है।
सम्मान की लड़ाई: लिपिकों का कहना है कि यह केवल आर्थिक लाभ का मामला नहीं है, बल्कि यह उनके अस्तित्व और सम्मान का प्रश्न है।
”हमने शासन-प्रशासन के हर द्वार पर दस्तक दी, लेकिन हमें केवल आश्वासन मिला। अब हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है कि वह 44 साल के इस वनवास को समाप्त करेगी।”
— संवर्ग प्रतिनिधि