चैत्र अमावस्या 2026: कालसर्प दोष से मुक्ति का महासंयोग, सुख-समृद्धि के लिए इस दिन जरूर करें ये अचूक उपाय

हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास की अमावस्या, जिसे ‘भूतड़ी अमावस्या’ के नाम से भी जाना जाता है, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। साल 2026 में यह तिथि उन लोगों के लिए वरदान साबित हो सकती है, जिनकी कुंडली में ‘कालसर्प दोष’ है। मान्यता है कि इस विशेष दिन किए गए सरल उपाय जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाओं को दूर कर सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

क्या है कालसर्प दोष और इसका प्रभाव?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब कुंडली के सभी सात मुख्य ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) छाया ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाते हैं, तब कालसर्प योग बनता है। जिस जातक की कुंडली में यह दोष होता है, उसे अक्सर मानसिक तनाव, संतान प्राप्ति में बाधा, आर्थिक अस्थिरता और कड़ी मेहनत के बावजूद सफलता न मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। चैत्र अमावस्या का दिन इस नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

दोष निवारण के लिए खास उपाय

  • चांदी के नाग-नागिन का पूजन: अमावस्या के दिन चांदी से बने नाग-नागिन के जोड़े का विधिवत पूजन करें। पूजा संपन्न होने के बाद इन्हें किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर दें। यह उपाय राहु-केतु के अशुभ प्रभाव को शांत करने में सहायक माना जाता है।
  • महादेव का रुद्राभिषेक: भगवान शिव कालसर्प दोष के अधिपति माने जाते हैं। इस दिन शिव मंदिर जाकर दूध, दही और गंगाजल से महादेव का रुद्राभिषेक करें। ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का जाप करना और शिवलिंग पर चांदी के नाग चढ़ाना विशेष फलदायी होता है।
  • पीपल की सेवा: अमावस्या की शाम पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और सात बार परिक्रमा करें। पीपल में पितरों का वास माना जाता है, इसलिए यह उपाय पितृ दोष और कालसर्प दोष दोनों में राहत देता है।
  • दान-पुण्य का महत्व: इस दिन काले तिल, कंबल या सामर्थ्य अनुसार अनाज का दान करें। जरूरतमंदों की मदद करने से ग्रहों की स्थिति अनुकूल होती है।

इन मंत्रों का करें जाप

मंत्रों की शक्ति नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है। अमावस्या पर इन मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें:

  1. राहु मंत्र: ॐ रां राहवे नमः
  2. केतु मंत्र: ॐ कें केतवे नमः
  3. सर्प गायत्री मंत्र: ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदंताय धीमहि तन्नः सर्पः प्रचोदयात्

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