19 मार्च से चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो रहा है, जो 27 मार्च तक चलेगा। आमतौर पर इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ सौम्य और शक्तिशालि स्वरूपों की अराधना करते हैं, लेकिन तंत्र साधना और विशेष फल की प्राप्ति के लिए ‘मां धूमावती’ की पूजा का अपना एक अलग और गहरा महत्व है।
कौन हैं माता धूमावती? पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां धूमावती साक्षात माता पार्वती का ही एक स्वरूप हैं। मान्यता है कि एक बार तीव्र भूख से व्याकुल होकर मां पार्वती ने भगवान शिव को ही निगल लिया था। इसके पश्चात उनके शरीर से धुआं निकलने लगा और उनका स्वरूप एक विधवा जैसा हो गया। तभी से उन्हें ‘धूमावती’ के नाम से जाना जाने लगा। वे दस महाविद्याओं में सातवीं शक्ति मानी जाती हैं।
भयभीत करने वाला स्वरूप, लेकिन फलदायी है भक्ति तंत्र शास्त्र में मां धूमावती का वर्णन काफी विशिष्ट है। वे सफेद (मलिन) वस्त्र धारण करती हैं, उनके बाल खुले और रूखे होते हैं। वे एक ऐसे रथ पर सवार हैं जिस पर कौए का चिह्न है और उनके हाथ में ‘सूप’ (अनाज साफ करने वाला पात्र) होता है। उन्हें ‘कलहप्रिया’ और ‘चंचला’ भी कहा जाता है। देखने में उनका यह रूप शत्रुओं के मन में भय पैदा करता है, लेकिन सच्चे साधकों के लिए वे परम कृपालु हैं।
क्यों की जाती है इनकी विशेष पूजा? धार्मिक विद्वानों का मानना है कि धूमावती माता संसार के अभावों और कष्टों की अधिष्ठात्री देवी हैं। नवरात्रि में इनकी साधना करने से:
- जीवन की दरिद्रता और दुखों का नाश होता है।
- शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
- मोक्ष के द्वार खुलते हैं और साधक के जीवन से अज्ञानता का अंधेरा मिटता है।
माता का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में दुख और अभाव भी ईश्वरीय शक्ति का ही एक हिस्सा हैं, जिन्हें भक्ति के जरिए सुख में बदला जा सकता है।