अजब-गजब मांग: अधिकारियों ने जांच से पल्ला झाड़ा, तो अब ‘चपरासियों’ से जांच कराने की उठी मांग; शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप

दिलीप गुप्ता : सरायपाली : सरायपाली के ग्राम लिमगांव स्कूल जांच प्रकरण में आज एक नया मोड़ आ गया है । डीईओ द्वारा चार अधिकारियों को जांच किए जाने के आदेश को धता तथा विभिन्न हास्यास्पद कारण बताते हुवे जांच किए जाने से इनकार करने की लिखित सूचना गठित जांच अधिकारियों द्वाराअपने उच्च अधिकारी को लिखित में दी गई । अपुष्ट जानकारी के अनुसार संभवतः इसी तरह का पुनः एक पत्र डीईओ को दिए जाने की जानकारी मिली है । इस प्रक्रिया से क्षुब्ध शिकायतकर्ता द्वारा 30 जनवरी को डीईओ को पुनः एक पत्र देकर विभाग के 4 वरिष्ठ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों ( चपरासी) का एक जांच दल गठित कर जांच किए जाने की एक अजीबो गरीब मांग की गई है ।जो शिक्षा विभाग के साथ ही जांच दल के कार्य प्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े करती है । इसके साथ ही एक उच्च अधिकारी द्वारा गठित जांच दल द्वारा अनेक हास्यास्पद कारणों का उल्लेख कर जांच किए जाने की राज्य में संभवतः पहली घटना होगी तो वहीं यह भी संभवतः पहली घटना होगी कि एक जिला स्तरीय अधिकारी से जांच किए जाने की मांग किसी चतुर्थ वर्ग श्रेणी के कर्मचारियों से कराए जाने की गई होगी । जांच दल का यह कृत्य अनुशासनहीनता के दायरे में आता है । डीईओ व शिक्षा विभाग को इसे संज्ञान में लेते हुवे कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए । ताकि दोबारा इस तरह का कोई अधिकारी जांच किए जाने से बहाना न बना सके ।
इस संबंध में इस प्रकरण के शिकायत कर्ता विनोद दास द्वारा 30 जनवरी की डीईओ को एक पत्र देते हुवे कहा है कि शासकीय मिडिल स्कूल लिमगांव में धनीराम चौधरी की जगह पर जितेन्द्र साहू के द्वारा मानदेय 6500 लेकर पढाई कराया गया है। जिसकी 03 नवम्बर को जांच हेतु बद्रीविशाल जोल्हे (प्रभारी बीईओ बसना), लोकेश्वर सिंह कंवर (एबीइओ वसना), अनिल सिंह साव (प्रभारी बीआरसीसी बसना), क्षीरोद्र पुरोहित (प्राचार्य आत्मानंद स्कूल वसना) को जांच अधिकारी नियुक्त कर अभिमत सहित प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का आदेश डीईओ महासमुन्द ने दिया था ।
जांचकर्ता अधिकारियो ने स्पष्ट लिखित में जिला शिक्षा अधिकारी महासमुन्द को 22 जनवरी को अवगत कराया है कि ‘इस जांच प्रकरण में राजनीतिक व्यक्तियो के द्वारा फोन पर दबाब बनाया जा रहा है। वही मिडिया में एक आइएएस अधिकारी का नाम उछाला जा रहा है। जिस कारण हमारी टीम जांच करने में असमर्थ है।
जांच कर्ताओं का यह आचरण छ०ग० सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 के नियम 3 के अन्तर्गत प्रत्येक शासकीय सेवक का यह कर्तव्य है कि वह पूर्ण सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा तथा निष्पक्षता के साथ अपने दायित्वो का निर्वहन करें। राजनीतिक अथवा बाहरी दबाबो के उल्लेख के आधार पर जांच से पीछे हटना, नियम 3 की भावना के प्रतिकूल प्रतीत होता है, और इसे कर्तव्य के परित्याग की श्रेणी में रखा जा सकता है ।
जांच से हटने का अनुरोध न केवल जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है, बल्कि यह एक खतरनाक प्रशासनिक उदाहरण भी स्थापित करता है। भविष्य में कोई भी जांच अधिकारी दबाब का हवाला देकर अपने वैधानिक कर्तव्यो से बचने का प्रयास कर सकता है।
पत्र में जांच कर्ताओं के इस आचरण से क्षुब्ध होकर अनुरोध किया गया है कि शिक्षा विभाग के किसी 4 वरिष्ठ चपरासियो का एक जांच दल गठित करके जांच कराये, जो राजनीतिक दबाब में आकर जांच से पीछे नहीं हटे। जो प्रस्तुत साक्ष्य एवं दस्तावेजो के आधार पर जांच प्रतिवदेन अभिमत सहित प्रस्तुत कर सकें।

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