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Tibal Day- प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से – आदिवासी महानायकों को नमन

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Tibal Day- प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से – आदिवासी महानायकों को नमन

Tibal Day- प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से – आदिवासी महानायकों को नमन

– सुभाष मिश्र

वैसे तो हमारा इतिहास आदिवासी नेतृत्व के प्रति उतना उदार नहीं रहा है, जितना इस समाज का योगदान है उसे उस तरह इतिहासकारों ने रेखांकित नहीं किया। अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने इतिहास में हाशिए पर रखे कुछ महानायकों को समाज के सामने लाने की कोशिश की थी, इस कोशिश की बदौलत ही शहीद वीर नारायण सिंह के बलिदान के बारे में और बेहतर तरीके से पता लग सका। उन्होंने ऐसे ही कई नायकों को सामने लाने की कोशिश की। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जिस तरह उम्मीद थी कि यहां के स्थानीय जननायकों को सम्मान मिलेगा। उनके बारे में आम लोग जान पाएंगे लेकिन इस दिशा में कोई खास पहल राज्य बनने के बाद बनी सरकारों ने नहीं किया। अब इस बीड़ा को उठाया है वर्तमान भूपेश बघेल की सरकार ने। छत्तीसगढ़ में 200 से ज्यादा आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पहचान की गई है।

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छत्तीसगढ़ में आज करीब 1 करोड़ के आसपास आदिवासी आबादी निवास करते हैं। यहां निवास करने वाली प्रमुख जनजातियों में गोंड, माडिय़ा, मुरिया, दोरला उरांव, कंवर, बिंझवार, बैगा, हल्बा शामिल हैं। आदिवासी समाज जहां अपनी परंपरा और संस्कृति के बहुत करीब है वहीं प्रदेश के विकास में भी बहुत अहम भूमिका निभा रही है। प्रदेश की 90 विधानसभाओं में से 34 और 11 लोकसभा में से 4 अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित है, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस प्रदेश की दशा-दिशा तय करने में इस समाज का कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है।
विश्व आदिवासी दिवस के बहाने हम उन महानायकों को नमन करते हैं जिन्होंने अपनी अगुवाई में बेहद कम संसाधन में ही बड़ी से बड़ी विपदा से टकरा गए, फिर वो जल-जंगल-जमीन की बात हो या फिर आदिवासी अस्मिता की। हमारे देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुए 75 साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर हम उन महापुरुषों को जरूर याद करते हैं जिनका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है साथ ही कोशिश करते हैं कुछ उन शख्सियत के बारे में भी जानने की जिन्हें इतिहास के पन्नों में उस तरह जगह नहीं मिल पाई जिसके वे हक़दार थे।
छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बाहुल्य राज्य है। आजादी की लड़ाई के साथ ही किसी भी अत्याचार के खिलाफ कई आदिवासी जननायकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इनमें भूमिया राजा गैंद सिंह, वीर नारायण सिंह, गुंडाधूर का नाम प्रमुख है। बस्तर में कुशासन के खिलाफ आदिवासी समाज ने बहुत पहले से ही संगठित विद्रोह किया है।
इनमें सन् 1774 में हुए हल्बा विद्रोह को पहला जन आंदोलन माना जाता है। करीब 5 साल तक चले इस विद्रोह ने आदिवासी समाज को एकजुट किया और आगे भी अत्याचार अनीति के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा बना। हालांकि अंग्रेजों और मराठों की संयुक्त सेना ने कई निर्दोषों की हत्या करते हुए इस आंदोलन को बहुत बेरहमी से खत्म कराया था। इसी तरह 1824 में हुए परलकोट विद्रोह को भी आज याद करना जरूरी है। परलकोट के जमींदार गैंदसिंह की अगुवाई में हुए इस आंदोलन ने अंग्रेजों को एहसास दिला दिया था कि बस्तर पर किसी विदेशी ताकत द्वारा शासन करना इतना आसान नहीं है। फिर 1857 की क्रांति से पहले पूर्वी छत्तीसगढ़ और ओडिशा के राजा और जमींदारों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ छेड़े गए आंदोलन जिसमें कई आदिवासी महानायकों ने एकजुट होकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हल्ला बोला था। अपनी प्रजा की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का ऐलान करने वाले इन शूरवीरों को आजादी की हीरक जयंती पर याद करना बहुत जरूरी है।
इसी तरह 1910 में चमत्कारिक नेतृत्व क्षमता वाले गुंडाधूर की अगुवाई में हुए भूमकाल आंदोलन ने तो एकबारगी से इस भू-भाग से अंग्रेजी शासन की चूलें
हिलाकर रख दी थी। इस आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने कई तरह की धूर्तता की और समझौते के बहाने धोखा देने से भी बाज नहीं आए। हालांकि महानायक गुंडाधूर को कभी भी अंग्रेज पकड़ नहीं पाए वे उनके लिए रहस्य ही बने रहे।
आजादी के बाद भी देश और राज्य को आगे ले जाने के लिए आदिवासी नेताओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। छत्तीसगढ़ राज्य में आज आदिवासी नेतृत्व के योगदान को जीवंत करने के लिए राज्य की भूपेश बघेल सरकार एक म्यूजियम बना रही है। जिसमें 1774 के हल्बा विद्रोह से लेकर तमाम आंदोलन के बारे में जानकारी मिल सकेगी।
प्रसंगवश विनोद कुमार शुक्ल की आदिवासी जनजीवन और उनके सुख-दुख से जुड़ी दो कविताएं –
शहर से सोचता हूँ
कि जंगल क्या मेरी सोच से भी कट रहा है
जंगल में जंगल नहीं होंगे
तो कहाँ होंगे?
शहर की सड़कों के किनारे के पेड़ों में होंगे। रात को सड़क के पेड़ों के नीचे
सोते हुए आदिवासी परिवार के सपने में
एक सल्फी का पेड़
और बस्तर की मैना आती है
पर नींद में स्वप्न देखते
उनकी आँखें फूट गई हैं।
परिवार का एक बूढ़ा है
और वह अभी भी देख सुन लेता है
पर स्वप्न देखते हुए आज
स्वप्न की एक सूखी टहनी से
उसकी आँख फूट गई।

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