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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अवसाद, अलगाव की परिणति है बस्तर की घटना

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अवसाद, अलगाव की परिणति है बस्तर की घटना

-सुभाष मिश्र

बस्तर के मरईगुड़ा लिंगनपल्ली में सीआरपीएफ के एक जवान द्वारा अपने ही सोते हुए साथियों पर अंधाधुंध गोलीबारी करके उन्हें मारना, घायल कर देना दरअसल अवसाद, अलगाव और व्यक्तिवाद की परिणति है। घर-परिवार से दूर एक भय और एकाकीपन के वातावरण में रहते हुए परिवारिक आकांक्षाओं के दबाव को नहीं झेल पाने के कारण भी इस तरह की घटनाओं को अंजाम देता है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने कहा कि अपने चार सहकर्मियों की गोली मारने वाला जवान डिप्रेशन में था, जिस वजह से अचानक उसने मनोवैज्ञानिक संतुलन खो दिया। प्रथम दृष्टया, ऐसा प्रतीत होता है कि किसी भावानात्मक तनाव के कारण कॉन्स्टेबल रितेश रंजन ने गुस्से में आकर अपने कर्मियों पर गोलियां चला दीं। रितेश रंजन के भीतर गुस्सा कब से और क्यों पनप रहा था, यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की। दूरस्थ अंचलों में पदस्थ जवान, सैनिक जो एकाकी जीवन जीने के लिए विवश हैं, उनसे मनोचिकित्सक, बड़े अधिकारी सतत बातचीत क्यों नहीं करते? सीआरपीएफ के पास जवानों की काउंसिलिंग की क्या व्यवस्था है? ऐसा नहीं है कि यह कोई पहली घटना है।

तेलंगाना की सीमा से लगे सुकमा जिले के लिंगनपल्ली में एक सीआरपीएफ जवान अपने साथियों के लिए काल बन गया, 217 बटालियन कैंप में तैनात जवान रितेश रंजन ने रात ढाई बजे के आसपास एके-47 से अपने ही साथियों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इससे कैंप में हड़कंप मच गया, जब तक कैंप में मौजूद दूसरे जवान स्थिति को समझ पाते, जवान इस फायरिंग के शिकार हो चुके थे। तत्काल आरोपी जवान को काबू में लिया गया और घायलों को तेलंगाना के भद्राचलम अस्पताल ले जाया गया। जहां 4 जवानों की मौत हो गई, वहीं गंभीर रूप से घायल जवानों को बेहतर इलाज के लिए रायपुर लाया गया। इसी तरह की घटना के पीछे जो अवसाद की स्थिति निर्मित होती है उसके मुख्य कारणों में इन इलाकों की विषम परिस्थिति जवानों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर डालती है। समय से रोटेशन नहीं होने के कारण मानसिक तनाव बढऩा, समय पर छुट्टी नहीं मिलना या छुट्टी अचानक रद्द होना, परिवार से सतत संपर्क नहीं हो पाना ही अवसाद का कारण बनता है।

इसके पहले भी इस तरह की घटनाएं घट चुकी है। अधिकांश अवसरों पर अवसाद में डूबा व्यक्ति खुद को प्रताडि़त करता है, मारने की कोशिश करता है, आत्महत्या करता है। साल 2007 से साल 2019 तक सुरक्षा बल के 201 जवानों ने आत्महत्या की है। इसमें राज्य पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान भी शामिल हैं। साल 2020 में 7 से ज्यादा जवानों ने खुदकुशी की। 9 दिसंबर 2020: अंतागढ़ में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। 30 नवंबर 2020: बीजापुर जिले के कुटरु थाना इलाके में पुलिसकर्मी ने फांसी लगाकर खुदकुशी करली थी। 29 नवंबर 2020 : धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र पामेड़ थाना में पदस्थ एक आरक्षक ने अपनी सर्विस रायफल से खुद को गोली मारकर खुदकुशी कर ली थी। 29 नवंबर 2020: कांकेर केपुसपाल थाने में तैनात सीएएफ के जवान दिनेश वर्मा ने खुद को गोली मार आत्महत्या कर ली। दिनेश वर्मा पुसपाल थाने में तैनात था और दुर्ग जिले के भिलाई का रहने वाला था।

इस घटना का आरोपी जवान रितेश रंजन को सुबह 4:00 बजे से अपनी संतरी ड्यूटी करनी थी। ड्यूटी के लिए तैयार होने के बाद उसने बैरक में सो रहे अन्य जवानों पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। घटना का असली कारण अभी पता नहीं चल पाया है। नक्सलियों से लडऩे आये जवानों का मनोबल यदि इतना गिर जायेगा की वे अपने ही साथियों को मारने लगेंगे तो फिर इस समस्या से कैसे निपटा जायेगा।

देश में बढ़ रही इसी तरह की प्रवृत्तियों की वजह से पूरे देश के साथ ही छत्तीसगढ़ में भी अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार बीते वर्ष राज्य में 65,216 आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए। जो 2019 में दर्ज मामलों की तुलना में 3,960 अधिक हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते अपराध को देखते हुए सामाजिकऔर पारिवारिक स्तर पर भी नियमित काउंसिलिंग जरूरी है। राज्य में ज्यादातर अपराध की वजह शराब और बेरोजगारी है।

बात-बात में मारपीट, चाकूबाजी लोगों के ऊपर नशे में या सत्ता के मद में धुत होकर किसानों, धार्मिक जुलूस या चौपाटी पर निश्चिंत खड़े लोगों पर गाड़ी चढ़ा देना अब आम बात हो रही है। राजधानी रायपुर में चाकूबाजी की वारदातें बढ़ गई हैं। 2 दिनों में 2 युवकों की चाकू मारकर हत्या की घटनाएं हुई हैं। वहीं इन घटनाओं में 4 लोग घायल भी हुए हैं।

नक्सल क्षेत्रों में ड्यूटी पर तैनात जवानों के ऊपर काफी प्रेशर होता है। वे काफी प्रेशर में काम करते हैं। उनकी शिफ्ट भी अलग-अलग होती है। इससे नींद पूरी नहीं होती। एक लंबे समय से अपने घर से दूर रहते हैं, ऐसे में फैमिली का प्रेशर भी उनके ऊपर होता है। जवानों को तीन तरीके से प्रेशर रहता है। पहला परिवार का प्रेशर रहता है, दूसरा सामाजिक प्रेशर रहता है और तीसरा काम को लेकर प्रेशर रहता है। साइकेट्रिस्ट का मानना है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जवानों को मजबूत बने रहने के लिए नियमित छुट्टियां, अटेंशन के साथ ही लगातार मनोचिकित्सक के संपर्क में भी रहने की जरूरत है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पुलिस अधिकारियों से कहा है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए सभी आवश्यक उपाय किए जाएं। इस घटना के पीछे उपजी नॉर्मलेसनेस उस स्थिति को दर्शाती है जिसमें व्यक्तिगत आचरण को विनियमित करने वाले सामाजिक मानदंड टूट गए हैं या व्यवहार के नियमों के रूप में अब प्रभावी नहीं हैं। यह पहलू समाज के प्रमुख मूल्यों के साथ या इसके बजाय, उन मूल्यों के साथ पहचान करने में असमर्थता को संदर्भित करता है जिन्हें प्रमुख माना जाता है।