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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - साहित्य की आड़ में खोदी जा रही है इतिहास की कब्र

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - साहित्य की आड़ में खोदी जा रही है इतिहास की कब्र

-सुभाष मिश्र

यह समय इतिहास और स्थापित सीमाओं को अपने हिसाब से महिमा मंडित करने या ध्वस्त करने का समय है। वोटों की राजनीति के चलते अब इतिहास संस्कृति और स्वाधीनता से जुड़ी बातों को राजनीतिक दल अपने चश्मे से देखकर सोशल मीडिया के जरिये लोगों तक पहुंचा रहे हैं। कोरोना संक्रमण के चलते अब अधिकांश प्रचार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से ही संभव है। ऐसे में घर में बैठे लोगों के बीच ऐसी सूचनाएं, ऐसा इतिहास, ऐसी जानकारी पहुंचाते जा रहे हैं जो उन्हें सच लगे। उनकी जातीय अस्मिता को कम या ज्यादा बताकर एक-दूसरे के प्रति वैमनस्यता पैदा करने की कोशिशें हो रही हैं। यह सही है कि लोगों के बीच किताबें पढऩे की आदत कम हो रही है। नाटकों का मंचन लगभग बंद सा है किन्तु कुछ खास किताबों और नाटकों पर विवाद करके नाटकों के बहाने विवाद खड़ा किया जा रहा है, बशर्ते उन किताबों में ऐसा कुछ लिखा हो जो किसी स्थापित छबि को बनाया या बिगाड़ा जा सके।

राजनीतिक वर्चस्व कायम करने के लिए फासीवाद को हमेशा अपने किसी प्रतिरूप या प्रतिपक्ष या अपने से इतर किसी 'गैर की तलाश होती है जिसे वह शत्रु या कल्पित शत्रु के रूप में चिन्हित करता है। हिटलर ने यहूदियों, कम्युनिस्टों और उदारपंथियों को 'गैर मानकर उनके साथ शत्रुवत व्यवहार किया था। मौजूदा भारत में बहुसंख्यकवादी सत्ता ने भी अपने से इतर अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों को 'गैर के रूप में चिह्नित कर लिया है। इनमें कम्युनिस्टों और गैर हिंदुओं के अलावा स्वयं हिंदुओं में अवर्ण जातियां भी शामिल हैं। औरंगजेब को अत्याचारी शासक सिद्ध कर मुस्लिम सम्प्रदाय की छवि विकृत करने का राजनीतिक कुचक्र दशकों से जारी है। इधर, सम्राट अशोक को पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधि मानकर उसकी छबि विकृत करने का अभियान शुरू हुआ है। इसी ध्येय से बहुसंख्यकवादी राजनीति की पोषक संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कतिपय बुद्धिजीवी सक्रिय हुए हैं। दया प्रकाश सिन्हा की राजनीतिक प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव सर्वज्ञात है। वे स्वयं को राष्ट्रवादी साहित्यकार कहते हैं। उन्होंने अपने नाटक 'सम्राट अशोक में अशोक को कुरूप, पापाचारी निष्ठुर और धार्मिक असहिष्णु सिद्ध किया है, जिसने बौद्ध धर्म के प्रचार में राज्य का धन लुटा दिया। फलस्वरूप राज्य आर्थिक रूप से पंगु हो गया।

इतिहास में अशोक की छबि प्रजा-वत्सल शासक के रूप में है। दया प्रकाश सिन्हा अपने नाटक में इससे विपरीत छबि गढ़ते हैं। यूं कहें कि सम्राट अशोक की लोकछबि को विकृत करने का यत्न करते हैं। पिछले कुछ दशकों में देखने मे आया है कि उत्तर भारत के राजनीतिक विमर्श में सम्राट अशोक को कुछ पिछड़ी जातियों ने अपने गौरव पुरुष के रूप में चिह्नित किया है। ये जातियां नये राजनीतिक समीकरण के लिहाज से ब्राह्मणवादी बहुसंख्यकवादी सत्ता की निगाह में अगर 'गैर के रूप में पहचानी जा रही हों तो अचरज नहीं।

अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार विदेशों में भी किया और प्रजा के हित में अनेक कार्य किये। कलिंग युद्ध में हृदय-परिवर्तन के पूर्व अशोक को युद्ध और हिंसा से परहेज न था। कश्मीर के विद्वान कल्हण ने राजतरंगिणी में लिखा है कि अशोक ब्राह्मण धर्म का अनुयायी है। कलिंग युद्घ के बाद उसने बौद्धधर्म

अंगीकार कर लिया। ब्राह्मणवादी प्रभुसत्ता को कलिंग युद्ध के पूर्व का अशोक स्वीकार्य है, बौद्ध अशोक नहीं। ब्राह्मणवाद की इस राजनीति से संचालित संगठन का स्वयं सेवक साहित्यकार अगर अशोक की छबि विकृत करने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत कर मनगढ़ंत छबि निर्मित करे तो आश्चर्य नहीं। इतिहास को विकृत कर वर्तमान के राजनीतिक हित सिद्ध करने के खेल में दयाप्रकाश सिन्हा का पितृ संगठन दशकों से लगा हुआ है। गैर वैदिक धर्मों, खासकर बौद्धों के प्रति सनातनियों की घृणा के प्रमाण सदियों से इतिहास में बिखरे पड़े हैं। अशोक की छबि खराब कर वे वही लक्ष्य पाना चाहते हैं जो औरंगज़ेब के प्रति नफरत फैलाकर वही हासिल कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की जनता गल्प को सत्य और आख्यान को इतिहास मान लेती है। नाटक को आखिर इतिहास का सत्य मानकर क्यों पढ़ें? लोग इस तरह पढ़ते हैं, इसलिए दयाप्रकाश सिन्हा जैसे लोग ऐसी रचना लिखते हैं।

यह नाटक न चर्चित है, न बहुमंचित। 2015 में लिखा यह नाटक 2022 में साहित्य अकादमी से पुरस्कृत होने के बाद चर्चा में आया है। साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत न किया होता तो यह अज्ञात रह जाता। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इसे गुणवत्ता की दृष्टि से नहीं, राजनीतिक ज़रूरत के तहत पुरस्कृत किया गया है। अन्यथा याद करें कि साहित्य अकादमी ने मोहन राकेश जैसे शीर्ष नाटककार को भी पुरस्कार योग्य नहीं समझा था। दयाप्रकाश सिन्हा के नाटक को सवर्णवादी सत्ता के द्वारा 'गैरों को नीचा दिखाने के कुत्सित प्रयास की तरह देखा जाना चाहिए।

हम भारतीय वर्तमान से ज्यादा अतीत के गौरव को महत्व देते आए हैं। ऐसे में अपने हिसाब से या किसी के नफा-नुकसान को साधने के लिए इतिहास को मोड़ देना आजकल सबसे प्रिय शगल बन गया है। इसी सिलाई-तुरपाई की कवायद में नई कढ़ाई की गई है। साहित्य अकादमी और पद्मश्री जैसे पुरस्कारों से सम्मानित दया प्रकाश सिन्हा ने जिन्होंने अपनी किताब में सम्राट अशोक और मुगल बादशाह औरंगजेब में कई समानताएं बताई हैं।

दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक में सम्राट अशोक को बदसूरत और क्रूर शासक बताया है जिसने भाई की हत्या कर सत्ता हथियाई थी। नाटक में मौर्य शासक की तुलना औरंगजेब से की गई है और भी कई तरह के आक्षेप लगाए गए हैं। दोनों राजाओं की तुलना पर कुछ लोग भड़क गए हैं। खासतौर पर बिहार से इसको लेकर सबसे कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। जदयू ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से दया प्रकाश सिन्हा को दिए गए सम्मानों को वापस लेने की मांग कर दी, तब भाजपा ने भी दया प्रकाश और उनके बयान से किनारा कर लिया। हालांकि इस बहाने जो बहस छिडऩी थी छिड़ चुकी है।

इसे राजनीति ड्रामा ही कहेंगे कि पिछली बार बिहार चुनाव के समय उपेन्द्र कुशवाह के माध्यम से भाजपा ने सम्राट अशोक की जाति बताई, एक बड़ा कार्यक्रम भी आयोजित कर दिया। जिसमें भाजपा के रविशंकर प्रसाद समेत कई बड़े नेता मौजूद थे, तो दूसरी ओर नीतीश और लालू एक साथ थे। सरकार बनाते ही नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल को सम्राट अशोक के जन्मदिन का पता लगा दिया और इस दिन राजकीय छुट्टी की घोषणा कर दी। मतलब साफ है कि अपने फायदे नुकसान के लिए इतिहास को घसीटकर वर्तमान में लाओ फिर उसे अपने चश्मे से लोगों को दिखाओ, सोशल मीडिया इस तरह के मुद्दे को लपकने के लिए तैयार बैठा है।
दरअसल यह हमला उस अशोक महान पर है, जिनका स्थापित अशोक स्तंभ भारतीय गणराज्य की निशानी है। वहीं अशोक जिनका अशोक चक्र तिरंगे पर

शोभायमान है, जिसके लिए लोग अपनी जि़ंदगी न्यौछावर करते हैं। अशोक के बहाने निशाने पर बौद्ध ही नहीं, भारत की पूरी ग़ैर-वैदिक विरासत है। अब तो  प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर दिए गए बयानों को जरिये सिख भी निशाने पर हैं ही।

बीजेपी सांस्कृतिक मोर्चा के संयोजक और आरएसएस की संस्कार भारती से जुड़े दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक को लेकर जो कुछ कहा है यह बेहद आपत्तिजनक है। 'अशोक ने अपने आरंभिक जीवन के पापों को छिपाने के लिए एक पागल की तरह बौद्ध धर्म के प्रचार में धन लुटा दिया, जिस कारण उसे राज्य से अपदस्थ कर दिया गया था और एक कारावास में डाल दिया गया था। एक दिन उसके पास एक बौद्ध भिक्षु भिक्षा मांगने गया तो उसने कहा कि मेरे पास कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो यही एक फल है, और उसने वही दे दिया।

एक अखबार में इंटरव्यू देते हुए उन्होने कहा कि 'अशोक और मुगल बादशाह औरंगजेब के चरित्र में बहुत समानता दिखाई दी। दोनों ने अपने प्रारम्भिक जीवन में बहुत पाप किये थे और अपने पाप को छिपाने के लिए अतिधार्मिकता का सहारा लिया ताकि जनता का ध्यान धर्म के प्रति प्रेरित हो जाए और उनके पाप पर किसी का ध्यान न जाए। दोनों ने अपने भाई की हत्या की थी और अपने पिता को कारावास में डाल दिया था।

दया प्रकाश सिन्हा से पूर्व भी अशोक पर कई नाटककारों ने नाटक लिखे हैं। अज्ञेय का चर्चित नाटक 'उत्तर प्रियदर्शी इसी विषय पर है। रामेश्वर प्रेम ने 'अंतरंगÓ, रामवृक्ष बेनीपुरी ने 'नेत्रदान के अलावा विजेता, 'अम्बपाली  जैसे नाटक लिखे हैं जो गुप्त वंश के उस काल के इर्द-गिर्द का एक जीवंत दस्तावेज है। अब तक अशोक पर जितने भी नाटक लिखे गए हैं, सब कलिंग विजय के बाद अशोक के युद्ध, हिंसा, रक्तपात के बाद हुए हृदय परिवर्तन और बुद्ध के विचारों जो विश्व व्यापक विस्तार दिया है, वहीं पक्ष सकारात्मक रूप से ज्यादा उभर कर आया है लेकिन दयाप्रकाश सिन्हा का यह नाटक प्रारंभ से अंत तक उनके नकारात्मक पक्ष पर ही फोकस करता हुआ दिखता है। कहीं तो उन्हें खलनायक रूप में प्रस्तुत करता है।

लुम्बनी गाँव गौतम बुद्ध (563 ईसा पूर्व) के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है। लुंबनी नेपाल में स्थित है। गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। गौतम बुद्ध हिंदू धर्म में क्षत्रिय वंश के थे। भगवान गौतम बुद्ध जन्म आधारित जाति व्यवस्था के खिलाफ थे। वे कर्म आधारित व्यवस्था में विश्वास करते थे। इस संबंध में, उन्होंने वासल सुत्त (वृषला सूत्र) में कहा कि नो जचचा वासलो होति ब्राह्मण। कम्मनावासलो होती कमाना होती ब्राह्मण। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं है। कर्म से चांडाल है और कर्म से ब्राह्मण। बौद्ध धर्म का प्रचार बाद में अशोक धम्म नीति के तहत सम्राट अशोक द्वारा फैलाया गया।

सम्राट अशोक को मौर्य साम्राज्य का तीसरा शासक माना जाता है। सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के कुशल प्रशासन और प्रचार के लिए भी जाने जाते हैं। सम्राट अशोक प्रेम, सहिष्णुता, सत्य, अहिंसा और शाकाहारी जीवन प्रणाली के सच्चे समर्थक थे। कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया। इसके बाद उन्होंने अपना ध्यान धम्म के प्रचार-प्रसार में लगाया। यहां धम्म का अर्थ 'नैतिक सिद्धांत है, न कि धर्म या धर्म या धर्म। इसलिए, वेनैतिक सिद्धांत बाहर किसी धर्म का विरोध करने के लिए नहीं थे, बल्कि मनुष्य को एक नैतिक कानून प्रदान करने के लिए थे।

सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से राष्ट्र को विकास का मार्ग दिखाया। मौर्य काल में ग्रैंड ट्रक रोड अस्तित्व में आया। मौर्य काल में ग्रांड ट्रंक रोड को 'उत्तरापथ के नाम से जाना जाता था। यानी ग्रैंड ट्रक रोड का निर्माण मौर्य काल में ही हुआ था। 16वीं शताब्दी में, ग्रांड ट्रंक रोड के इस मार्ग का अधिकांश भाग शेर शाह सूरी द्वारा फिर से बनाया गया था।

दरअसल हमें यह सब नहीं बताकर इतिहास के उस काले पक्ष, घटनाओं को बताने की कोशिश की जाती जो हमें आपस में एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर सके।
मौजूदा हालात को देखते हुए प्रसंगवश शायर मित्र सूरज राय सूरज का यह शेर -
'सांप बनके हमें ही वो डसने लगी
हमने दहशत की फेंकी थी जो रस्सियां।।