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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - देश की फिज़ा में फैलती जहरीली हवा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - देश की फिज़ा में फैलती जहरीली हवा

-सुभाष मिश्र

इधर, हमारे देश की फिज़ा में कई तरह की जहरीली हवा अलग-अलग माध्यमों से फैल रही है। वाट्सऐप यूनिवर्सिटी सोशल मीडिया के इस्तेमाल से हमारे वायुमंडल में जो कार्बन उत्सर्जित होता है वह हमारे वायुमंडल को प्रदूषित करता है, जिसका बुरा असर हमारे दिलो-दिमाग और श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। ये जहरीली हवा चुनाव के समय कुछ ज्यादा ही फैलाई जाती है। कुछ लोग हवाओं का रुख भांप कर भी हवा फैलाते हैं। कुछ अवसरवादी मानते हैं कि जैसी चले बयार, पीठ को तैसी कीजिए।
हबीब तनवीर के नाटक जहरीली हवा का एक गीत है जिसे प्रसंगवश साझा कर रहा हूं-
गैब़ से चलने लगी, जब एक जहरीली हवा
दिल के फफोले से भरी
किस-किस के नालों से भरी, खामोश चीखों से भरी
से कहां से उठ रही है, ऐसी दर्दीली हवा
गैस से चलने लगी, अब जहरीली हवा
एक मौज-ए-लहू आ रही है, मौत की जैसी बू आ रही है
कू-ब-कू, सू-ब-सू आ रही है
अपनी बेरंगी मेें भी, एक जरा पीली हवा
गैब से चलने लगी, जब एक जहरीली हवा।।


बहरहाल, इस समय किसान आंदोलन, कोरोना वायरस की हवा से परेशान सरकार दिल्ली और आसपास फैल रही जहरीली हवा से खौफजदा है। हाल ही में दिल्ली की जहरीली हवा और लोगों की परेशानी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगते हुए प्रदूषण नियंत्रण को लेकर किए जा रहे उपायों पर हलफनामा देने को कहा है। कोर्ट का कहना है कि हम चाहते हैं कि प्रदूषण कम हो, हमें राजनीति से कोई मतलब नहीं है। दिल्ली में प्रदूषण के बढ़ते संकट को देखकर शिक्षण संस्थाएं बंद करके लॉकडाउन के हालात निर्मित करने की बातें भी होने लगी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से कोर्ट को कहना पड़ा कि प्रचार कम, काम ज्यादा कीजिए। कितना पैसा आप अपना प्रचार करने के लिए खर्च करते हैं और कितना पैसा प्रदूषण नियंत्रण के लिए, इसके ऑडिट कराने का आदेश देने के लिए हमें मजबूर मत करिए। वहीं केन्द्र सरकार ने इस मामले में इमरजेंसी बैठक बुलाकर अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी दी, जिससे सुप्रीम कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि हरियाणा व पंजाब के किसानों से बात करे। उनसे पराली जलाने को रोकने कहें। सरकारों के रुख को भी कोर्ट ने गंभीरता से लिया और कहा कि सरकारें सिर्फ कागजात पर कागजात दाखिल करना चाहती हैं, ये और कुछ भी नहीं बस राजनीति है।  
दुनिया भर में वायु प्रदूषण के सबसे खराब स्तर वाले शहरों की सालाना सूची में भारत के शहर एक बार फिर शीर्ष पर हैं। इस सूची के पहले दस शहरों में से छह और पहले तीस शहरों में कुल इक्कीस शहर भारत के हैं। 2018 की रिपोर्ट में शीर्ष तीस प्रदूषित शहरों में भारत के बाईस शहर शामिल थे। वायु प्रदूषण में दक्षिण एशिया के तीस में से सत्ताईस शहर शामिल हैं, जिनमें भारत के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश के शहर भी हैं।

प्रदूषण पर जहां तक मामला है इसमें ना तो हमारी धरती, ना ही आसमान, ना ही पहाड़ और ना ही हमारी नदियां इससे अछूते हैं। जिस गंगा नदी को हम अपनी मां का दर्जा देते हैं, जिस नर्मदा को हम जीवनदायिनी कहते हैं इन्हीं नदियों के संगम पर हमने अपनी पुरखों की अस्थियों का विसर्जन कर इन्हें दूषित कर दिया है। गंगा की सफाई को लेकर नमामि गंगे प्रोजेक्ट और पृथक मंत्रालय के बावजूद गंगा आज भी प्रदूषित है और करोना संक्रमण के दौरान गंगा पर तैरती लाशों का हमने जीवंत उदाहरण देखा है।

नमामि गंगे कार्यक्रम, एक एकीकृत संरक्षण मिशन है, जिसे राष्ट्रीय नदी के प्रदूषण, संरक्षण और कायाकल्प के प्रभावी उन्मूलन के दोहरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए 20,000 करोड़ रुपये के बजट परिव्यय के साथ जून 2014 में केंद्र सरकार द्वारा प्रमुख कार्यक्रम के रूप में अनुमोदित किया गया। अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, लापरवाही और कथित परंपरा के नाम पर हमारे देश में हर पवित्र चीज को अपवित्र करने का रिवाज सा बन गया है। हम जिन देवी-देवताओं की पूजा करते हैं उन्हें भी हम इन्ही नदी, नालों, तालाबों में विसर्जित करते हैं। अपने मृतक जनों के शरीर सहित उसकी राख को भी हम नदियों के हवाले करने में कतई नहीं झिझकते। हम इसे अपनी परंपरा और मोक्ष से जोड़कर देखते हैं।

देश में जब लॉकडाउन था तब कारखाने बंद थे, मोटर गाडिय़ां बंद थी, तब प्रदूषण का लेवल बहुत काम था। लोगों को हवा में ऑक्सीजन ज़्यादा मिल रही थी। यह अलग बात है की बहुत से अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर के कमी के चलते लोगों को जान गंवानी पड़ी। तेजी से कम होते जंगल और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और वाहनों पर निगरानी की कमी के चलते प्रदुषण का स्तर बढ़ा है। प्रदूषण निवारण मंडल जैसी संस्थाएं कागज़ी साबित हुई है। वे उद्योगों को एनओसी देकर पैसा कमाने के अड्डे में तब्दील होकर रह गयी है। सरकारें किसी की भी हो वह प्रदूषण, पर्यावरण को उतनी गंभीरता से नहीं लेती जैसे लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ की राजधानी के औद्योगिक इलाके जैसे सिलतरा, उरला, बिरगांव, भनपुरी में स्थापित उद्योगों के काले धुएं से हमारे घर की छतों, आंगनों में सूखने वाले कपड़ेे काले हो जाते हंै। प्रदूषण की वजह से सांस के मरीज़ोंं को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। प्रदूषण पर नियंत्रण करने वाली तमाम एजेंसियां ऐसी सारी बातों से अवगत हैं, किन्तु उनके ऑक्सीजन का जुगाड़ इन्ही संस्थानों की अनदेखी और वसूली से चलती है। यही वजह है कि वे जहरीली हवा के सौदागर होते जा रहे हंै। बड़े-बड़े उद्योग-धंधे लगाने वाले उद्योगपति जो दिनभर मन चंगा तो कठौती में गंगा कहते रहते हैं, वे भी अपनी फैक्ट्री में वो वायुशुद्घता यंत्र नहीं लगाते जिनसे वातावरण प्रदूषित न हो।

हवाओं में, फिज़ाओं में घुलता जहर तभी कम हो सकता है, जब हमारी समझ अपनी प्रकृति, अपने पर्यावरण और मनुष्यता को लेकर साफ हो। हम धीरे-धीरे एक अपसंस्कृति के दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहां सब कुछ प्रदूषित करने की होड़ सी लगी है।    
प्रसंगवश यहां पर राजीव दुबे अमित की कविता की ये दो लाईनें  
आज वायु ही भटकती प्राण वायु के लिए
आक्सीजन मास्क पहने बह रही नभ में समीर।।
और मशहूर मित्र शायर सूरज राय सूरज का ये शेर-
मौत के अनुनाद का अंधा कुआं रह जाएगा
कुछ नहीं होगा यहां पर बस धुआं रह जाएगा।।