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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हमारी धर्मनिरपेक्षता की दीर्घकालिक परंपरा

  प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हमारी धर्मनिरपेक्षता की दीर्घकालिक परंपरा

देश को बार-बार बाबर और उन जैसे मुस्लिम शासकों की याद दिलाने वाली हमारी उस साझी संस्कृति की बात नहीं करते जिसने हमारी भक्ति भावना बढ़ाने से लेकर हमारी दुनिया को बेहतर बनाने का काम किया। जब हम अपने दोहों को याद करेंगे तो हम सैय्यद इब्राहिम उर्फ रसखान के दोहों को कैसे बिसरा देंगे। जब हम आध्यात्म, सूफी परंपरा की बात करेंगे, अच्छे गीत संगीत की बात करेंगे तो क्या हम अमीर खुसरो के बिना दूसरी कल्पना कैसे कर सकते हैं? जब भी हम आदमीनामा सुनते हैं तो हमें नजीर अकबरबादी याद आते हैं। 18वीं सदी का यह आवाम का शायर आगरा के नवाब सुल्तान खान का नवासा भले ही रहा हो पर इसने हमेशा आम हिन्दुस्तानी के पक्ष में बिना किसी मजहबी दीवार के शायरी लिखी। 

नजीर अकबरबादी के होली के रंग देखते ही बनते हैं-

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की 

और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की। 

जो लोग इस समय इतिहास की गलत सलत व्याख्या करके हमारी धर्मनिरपेक्षता की साक्षी संस्कृति को नष्ट करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं, उन्हें सैयद इब्राहिम उर्फ रसखान, अमीर खुसरो, आलम शेख, उमर अली, नशीर मामूद, नवाब वाजिद अली शाह की कृष्ण भक्ति में लिखी गई रचनाएं पढऩा चाहिए। रसखान ने भागवत का अनुवाद फारसी में किया। आप उस अमीरखुसरो को कैसे खारिज कर सकते हैं। 

छाप तिलक सब छीनी रे मौसे नैया मिलायके जैसी अपनी रचना कृष्ण को समर्पित करते हंै। रीतिकाल के कवि आलम शेख जिन्होंने कृष्ण भक्ति से प्रेरित होकर आलम केलि, स्थापस्नेही और माधवानल-कामकंदला ग्रंथ लिखे। कृष्ण की बाल लीलाओं का जिस तरह का वर्णन आलम शेख ने अपनी कविता में किया है वह अद्भुत है पालने सेेलत नंद-ललन छलन बलि, गोद लै लै ललना करति मोद मान है। मुगल सल्तनत के आखिरी वारिस नवाब वाजिद अली शाह ने राधा-कृष्ण पर नाटक लिखा। बीजापुर के बादशाह इब्राहिम सलीम (1580-1626) के दरबार में 300 से अधिक हिन्दू गायक थे। उन्होंने मुसलमानों से संगीत को लोकप्रिय बनाने किताब ए-नौरंग लिखी। इस संग्रह की पहली कविता 

सरस्वती की प्रार्थना है। जो लोग आज धर्म जाति के आधार पर समाज को देश को, दुनिया को बांटने की जुगत में लगे हैं वे शायद यह नहीं जानते हैं कि धर्म हमेशा से राजाओं के लिए अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम रहा है। सत्ता और संपत्ति उनका मुख्य ध्येय था। कोई भी राजा अपने कार्यकर्ताओं को धर्मयुद्ध मुजाहित के रूप में परिभाषित करता था। मध्यकाल में राजा अपने साम्राज्य के विस्तार के अभियान को धर्म का चोला पहनाकर क्रूसेडस, जेहाद, धर्मयुद्ध नाम देते थे इनका उद्देश्य धर्म की रक्षा अथवा विस्तार नहीं होकर अपने साम्राज्य को बढ़ाना था। अधिकांश राजा जमीन पर कब्जा जमाने एक दूसरे से लड़ते थे और उनके धार्मिक पंडित, उलेमा एक दूसरे की पूजा पद्धति को नीचा दिखाने के काम में लगे रहते थे।  इसी दौरान आम लोगों को अलग-अलग कारणों से हिन्दू धर्म और इस्लाम ने प्रभावित भी किया जिसके परिणामस्वरूप धर्म से भक्ति और इस्लाम से सूफी परंपरा उपजी। समाज का आर्थिक रूप से कमजोर तबका और कथित रूप से छोटी समझी जाने वाली जातियों के लोग सूफी संतों की ओर आकर्षित हुए। सूफी संत आम आदमी की बोली भाषा में बात करते थे। 

यदि हम आधुनिक समझ की बात करें तो समाज में सिनेमा का गहरा प्रभाव रहा है। हमारे देश की मुख्यधारा में हिन्दी सिनेमा ने अनेकता में एकता की अनूठी मिसाल प्रस्तुत की है। परदे पर दिखाये गये इस्लामिक आख्यान हों या हिन्दू धर्म की पौराणिक कहानियां उनके पात्रों को परदे पर सजीव किया हिन्दू-मुस्लिम कलाकारों ने। आज से कुछ दशक पहले का भारतीय सिनेमा भारत के धार्मिक रूप से अधिक सहिष्णु समाज का प्रतिनिधित्व करता था। इस सिनेमा ने हमें आपसी भाईचारे के साथ रहना सिखाया, इस सिनेमा ने हमें माननीय होना सिखाया, इस सिनेमा के गायकों, गीतकारों और संगीतकारों ने हमें धार्मिक संकीर्णता से बहुत ऊपर की सोच के लिए प्रेरित किया। इसी दौर के महान शायर और गीतकार साहिर ने अपनी क्रांतिकारी सोच से भारतीय जनमानस को बहुत प्रभावित किया। मुस्लिम होने के बावजूद उन्होंने कई सुंदर भजन लिखे जैसे-

आन मिलो-आन मिलो श्याम सांवरे

प्रभु तेरो नाम

राम रहीम-कृष्ण करीम

तोरा मनना क्यों घबराये रे

आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है

भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है।

वहीं दूसरी ओर फिल्म बैजू बावरा भी इस कौमी एकता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है- जिसके भजन लिखे शकील बदांयुनी ने गाये मोहम्मद रफी ने और संगीत से संवारे नौशाद ने। मो. रफी ने तो न जाने कितनी फिल्मों में भजन गाये।

साहिर लुधियानवी की एक कालजयी रचना है तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। ये गीत हमें धार्मिक संकीर्णता और नफरत छोड़कर मनुष्य बनने की प्रेरणा देती है। 

जब हम वसुधैव कुटुम्बकम की बात करते हैं, हम टेक्नालॉजी के चलते ग्लोबल विलेज की अवधारणा को सच होते देखते हैं, जब हम विदेशों में भारतवंशीय को बड़े-बड़े पर्दो और पैकेज में काम करते देखते हैं तो हमारा सीना 56 इंच का हो जाता है। बावजूद इसके हम अपने यहां हिन्दू-मुस्लिम, सिख, ईसाई के साथ-साथ ब्राम्हण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र में भी समाज को बांटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। हम उन ताकतों का खुलकर प्रतिरोध नहीं करते जो हमारे बीच नफरत की राजनीति, नफरत की मानसिकता का विस्तार करती है। वैसे हम सामान्य जीवन में किसी दुकानदार से उसकी जाति पूछकर सामान नहीं खरीदते किन्तु हमें आजकल सोशल मीडिया के जरिये ये पूछकर खरीदने की सीख दी जा रही है। जो लोग हमारे त्यौहारों में रंग भरते हैं, जो रंगरेज हमारे कपड़ों को कलरफुल बनाते हैं, जो सिस्टर अस्पताल में बीमार पडऩेे पर हमारी सेवा करती है क्या हम उससे उसकी जाति पूछते हैं।  

अलग-अलग धर्मों को मानने वालों को जैसा उनकी पूजा-पद्धति, धार्मिक स्थलों, परंपरा के बारे में उनके परिवारजन  बताते हैं, वे वैसा जानते हैं। सभी धर्मो के उदारवादी दृष्टिकोण के बारे में ज्यादा कुछ न तो पंडित जानते हैं ना मौलवी ना ही पादरी। दरअसल, यह काम स्कालर्स का है। हमारे स्कालर्स हमारे बौद्धिक समाज को चाहिए कि वह समाज में ऐसे मूल्यों की, ऐसी कहानियों को पहुंचाएं तो हमारी साझा संस्कृति को मजबूत करें। दुर्भाग्य से हमारा मध्यवर्ग, निम्न मध्यम वर्ग जो उदारीकरण के बाद कुछ ज्यादा सम्पन्न हो गया है। मोटी-मोटी तनख्वाह पा रहा है, ज्यादा मुनाफा कमा रहा है। वही साम्प्रदायिकता के जहर को फैलाने में ज्यादा लगा हुआ है। ग्रामीण मेहनतकश लोगों के बीच साझा संस्कृति अभी भी मजबूती के साथ बनी हुई है जिसके अनेकों उदाहण हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ग्रामीण जीवन में देखते हैं। 

पाकिस्तान, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर होने वाले हमले, अत्याचार की घटना के बीच अभी हाल ही में पाकिस्तान सिख समुदाय ने पहली बार ईद मिलादुन्नबी मनाने के लिए ननकाना साहिब में गुरुद्वारा जन्मस्थान के सामने एक कार्यक्रम आयोजित किया।  सिख समुदाय की   मुस्लिम प्रतिभागियों के लिए एक दावत का व्यवस्था की गई थी और कार्यक्रम के अंत में दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों द्वारा केक काटा गया था जैसा कि सिख किसान भारतीय राज्य पंजाब में कृषि कानूनों के विरोध में सड़कों पर उतरे। मुसलमानों के एक समूह ने 26 सितंबर को उनके लिए लंगर का आयोजन किया। 

कर्नाटक के विजयपुरा में एक ऐसा मामला सामने आया है जहां एक मुस्लिम व्यक्ति ने हिंदू लड़की की शादी वैदिक रीति-रिवाजों से हिंदू युवक के साथ करवाई है। शख्स ने एक अनाथ हिंदू लड़की को पाल-पोसकर बड़ा किया था। महबूब मसली एक 18 वर्षीय हिन्दू लड़की पूजा वाडिगेरी के अभिभावक ने रीति-रिवाजों के अनुसार एक हिंदू व्यक्ति से पूजा की शादी करवाई। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे इर्द-गिर्द हैं। अभी दो दिन पहले ही हमने अपने दोस्तों के घर मीठी सैवंया खाई। हम भी उतना ही महंगा पेट्रोल-गैस खरीद रहे हैं जितने की हमारे बाकी दोस्त। हमारे दुख-दर्द, 

हमारी तकलीफें, हमारी समस्याएं सब एक सी हैं। बहुत से लोग इस पर बात नहीं करेंगे। गड़े मुर्दे उखाड़कर हमारी साझा संस्कृति को नष्ट करने पर उतारु हैं और दुर्भाग्य से बौद्घिक समाज चुप है। 

कबीर लाख समझाकर गये-

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। 

प्रसंगवश-

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय

टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये। 

खुसरो दरिया प्रेम का सो उल्टी वाकी धार 

जो उबरा सो डूब गया जो डूबा वो पार।।