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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - चुनाव में सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  चुनाव में सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका

- सुभाष मिश्र

पांच राज्यों में हुए चुनाव में जिस तरह सोशल मीडिया की भूमिका रही, उस पर विचार जरूरी है। तकनीक ने आज हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी है, राजनीति और चुनाव पर तो इसका गहरा रंग चढ़ा है। एक दौर था जब ज्यादा समर्थक और कार्यकर्ता वाला व्यक्ति ज्यादा शक्तिशाली नेता नजर आता था लेकिन आज वो ज्यादा लोकप्रिय और प्रभावशाली नजर आता है जिसके पास सोशल मीडिया पर उसके पक्ष में माहौल बनाने वाले ज्यादा कुशल लोग हैं। सोशल मीडिया का नशा और उसकी लगातार बढ़ती पहुंच अब चुनाव जैसे गंभीर मामलों में भी निर्णायक साबित हो रहे हैं। ये केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर के कई देशों में अपनी प्रभावी छाप छोड़ रहा है। आज सभी राजनीतिक दल अपने चुनाव अभियान से लेकर राजनीतिक प्रबंधन तक में सोशल मीडिया को बहुत ज्यादा महत्व दे रहे हैं। कोरोना जैसी महामारी के दौर में लोगों तक सही-गलत सूचना पहुंचाने में इसकी बेहद अहम भूमिका रही है।

कहा जाता है कि सूचना दोधारी तलवार की तरह होती है। एक ओर इसका उपयोग रचनात्मक कार्यों में, तो दूसरी ओर भ्रम फैलाने में भी किया जा सकता है। इसीलिए सोशल मीडिया की भूमिका को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रगति में सूचना क्रांति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है किंतु सूचना क्रांति की ही उपज, सोशल मीडिया को लेकर उठने वाले सवाल भी महत्वपूर्ण हैं।

नोटबंदी के बाद बने हालात से बड़े पैमाने पर नौकरियां गईं, महंगाई बढ़ी कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ा लेकिन इसका कोई असर 2017 के उ.प्र. विधानसभा या 2019 के आम चुनाव के परिणामों में नहीं दिखा। दरअसल भाजपा के सोशल मीडिया प्रबंधकों ने अतिराष्ट्रवाद, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों को इस तरह प्रचारित किया कि लोगों को जमीनी मुद्दे बौने लगने लगे। हाल ही में संपन्न उ.प्र. विधानसभा चुनाव में बढ़ती बेरोजग़ारी, किसान आंदोलन का दमन, भीड़ की हिंसा, मानवाधिकार का दमन जैसे ज़मीनी मुद्दों के बावजूद अगर सत्ताधारी दल बहुमत हासिल करने में कामयाब रहा तो इसमें उसके प्रचार तंत्र की बड़ी भूमिका थी। जिसने भीतर तक दाखिल होकर राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और आत्मगौरव की रक्षा जैसे विषयों को जनता के दिलो दिमाग में अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में स्थापित कर दिया।

दरअसल आज युवा समाज वर्चुअल दुनिया में इतना ज्यादा वक्त बीता रहा है  कि वास्तविक दुनिया उसके लिए स्थगित हो चुकी है। सोशल मीडिया द्वारा रची गयी दुनिया में रहने के कारण वह उसके मुद्दों को ही सच मानकर उनके आधार पर अपनी राय क़ायम करता है। इस वास्तविकता को समझकर ताकतवर राजनीतिक दल अपने एजेंडा को सोशल मीडिया में आगे बढ़ाते हैं और जनमत को अपने पक्ष में खींचने के खेल में कामयाब हो जाते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं है कि इसके लिए हर तरह का हथकंडा, सच-झूठ हर तरह का खेल खेला जा रहा है। वास्तविक जगत की सच्चाई की जगह सोशल मीडिया का पोस्ट ट्रूथ अधिक आकर्षक ही नहीं, सच्चाई के अधिक करीब भी मालूम होने लगता है।

कहने की ज़रूरत नहीं है कि सच की तरह पेश किए गए झूठ से प्रभावित युवा वर्ग आज अनेक मुद्दों पर सोशल मीडिया के माध्यम से मुखर है और खुलकर अपनी राय रख रहा है लेकिन उसकी मुखरता पोस्ट ट्रूथ के दायरे का अतिक्रमण नहीं कर पाती। ऐसे में युवाओं को उन्हें अपने पक्ष में लाना और अपने मुद्दों को उनका मुद्दा बना देना आसान है। सोशल मीडिया में आज सब की राय हर रोज सामने आती है। इसका अध्ययन किया जाए तो यह देख पाना मुश्किल नहीं होगा कि किसी दल की राजनीतिक विचारधारा यदि आक्रामक होकर अपने मुद्दे पेश करती है तो उससे वशीभूत होकर युवाओं का एक बड़ा समूह सहज ही उसका अनुयायी हो जाता है। यही वजह है कि आज के दौर में किसी भी राजनेता का वजन उसके सोशल मीडिया फॉलोवर्स पर निर्भर करने लगा है। खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम इस बात पर खास तवज्जो देती है कि उनकी पार्टी के किस नेता के पास इन प्लेटफॉर्म में फॉलो करने वाले कितने लोग हैं।  

यह सही है कि सिर्फ सोशल मीडिया के द्वारा लोगों को बरगलाने भर से चुनावी कामयाबी नहीं मिलती लेकिन चुनाव में अहम भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जोड़-तोड़ और चुनाव प्रबंधन की भी इसमें अहम भूमिका होती है। यह भी सच है कि भावात्मक मुद्दों के आधार पर जनमत बनाना अब चुनावी कौशल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके लिये प्रतीकों की राजनीति को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए हाल ही के चुनावों के दौरान उत्तरप्रदेश में अगर राममंदिर को धार्मिक अस्मिता के प्रतीक के रूप में जनमानस पर स्थापित करने में अगर भाजपा सफल रही तो वहीं आम आदमी पार्टी ने पंजाब में भगत सिंह को क्षेत्रीय अस्मिता और अंबेडकर को प्रदेश की दलित आबादी की आत्म-पहचान से जोड़कर मतदाता को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की। दोनों ही राज्यों में हमने चुनाव को छवियों के खेल में बदलते देखा है। आम आदमी पार्टी के चुनावी रणकौशल में सोशल मीडिया का योगदान कम नहीं है। आम आदमी पार्टी की जीत ये साफ करती है कि सियासी समीकरण साधने के लिए सुशासन और विकास के वायदे के साथ भावनात्मक मुद्दों का घालमेल कर लोगों का दिल जीता जा सकता है।  

एक आम भारतीय का स्वभाव मूल रूप से भावुक होता है। इस भावुकता पर व्यंग्य करते हुए श्रीराज शुक्ला ने लिखा भी है कि ऑपरेशन टेबल पर लेटी लड़की को देखकर डॉ कविता करने लगता है और भाखड़ा नंगल बांध को देखकर इंजीनियर कहता है कि इस बार भी लीला के लिए प्रभु ने भारत भूमि को ही चुना है। बहुसंख्यक भारतीयों की भावुकता की इस कमजोरी को राजनीतिक दलों में सबसे पहले भाजपा ने समझा। भाजपा ने दो काम किए, एक धार्मिक भक्ति को हिंदुओं के धार्मिक उन्माद में कथित रूप से बदला। राम को यानी ईश्वर को पार्टी की प्राथमिकता की तरह प्रस्तुत किया। यहीं से सोशल मीडिया के प्रबल इस्तेमाल का सूत्र उनके हाथ लगा। उन्होंने राममंदिर को मुसलमानों से धार्मिक मुक्ति की तरह प्रचारित प्रसारित किया, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली है। इसकी शुरुआत गोधरा कांड में मोदी को हीरो की तरह प्रस्तुत किए जाने से हुई। मोदी की इस प्रादेशिक सफलता से अंबानी और अडानी ग्रुप को मोदी में राष्ट्रीय छवि की व्यवसायिक गुंजाइश दिखाई दी। पूंजी के समुद्र पर प्रचार के असंख्य जहाज तैरने लगे और मोदी की नैया दिल्ली घाट पर जा लगी। इसके बाद भाजपा ने व्यवस्थित रूप से सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए एक आईटी सेल तैयार किया जिसमें अनेक आईटी इंजीनियर और कंप्यूटर ऑपरेटर्स को सैलरी बेस पर या संविदा नियुक्तियों पर सोशल मीडिया पर प्रचार का काम सौंपा गया। यहीं से भारतीय प्रचार इतिहास में पहली बार यह हुआ कि प्रचार सामग्री से तथ्यों की पुष्टि, सत्यता और जरूरी नैतिकता को विदा किया गया। इसके बाद मुस्लिम विरोध के साथ हिंदू अस्मिता का संकट इस तरह से खड़ा किया गया कि जिसका दोष पूरी तरह से विपक्षियों पर खासकर कांग्रेस पर थोपा गया। हिंदुओं में मुसलमानों को लेकर इस तरह असुरक्षा बोध बढ़ाया गया कि इस भय ने सोशल मीडिया पर एक बड़ी आंधी की शक्ल में आंदोलन का रूप ले लिया। अब स्थिति यह है कि अधिकांश राज्यों में खासकर हिंदी राज्यों में विपक्षी दलों के लिए और विशेष रूप से कांग्रेस के लिए मुसलमानों की तरफदारी संकट का काम हो गया है। अब हिंदू हित की बात करना मुस्लिम वर्ग की खिलाफत से शुरू होती है। अब किसी भी राजनीतिक दल को हिंदुओं के वोटों की बड़ी संख्या के लिए हिंदुओं के हित की बात करनी होगी और वह भी मुसलमानों की कड़ी निंदा और घोर खिलाफत के साथ। सोशल मीडिया ने यह एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है और विपक्षी राजनीतिक दलों को इसी संकट से निपटना है।

एक समय था जब राजनीतिक दल अपने कॉडर पर भरोसा करके उसके माध्यम से अपनी बात गांव-गांव तक, लोगों तक पहुंचाते थे। मामला राजनीतिक एजेंड़े का, विचारधारा हो या फिर धर्मप्रचार का यह कुछ समर्पित होलटाईमर, प्रचारको के जरिए धीरे-धीरे बोता था। सोशल मीडिया आने के बाद अब यह वार रूम बनाकर इतनी तेजी से हो रहा है कि अब मिसकॉल के जरिए पार्टी की सदस्यता तक दी जा रही है। जो काम लाखों समर्पित कार्यकर्ताओ की टीम सालों में नहीं कर पाई, वह काम तकनीक और मीडिया के सारे कुछ चुनिंदा लोग बहुत कम समय में कर रहे हैं। अब नये रणनीतिकार समय, स्थान और माहौल देखकर प्रतीकों के जरिए वोटरों को आकर्षित कर रहे हैं, माहौल बना रहे हैं। उत्तरप्रदेश के चुनाव के पहले भाजपा ने भगवान श्रीराम से लेकर कुछ निषादराज और कुछ ऐसे प्रतीक खोजे गये जो लोगों की जातिगत और धार्मिक अस्मिता को जगाए। वहीं पंजाब में शहीद भगतसिंह और बाबा साहब आम्बेडर को प्रतीक बनाया गया। चुनाव जीतते ही मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने अपना शपथ ग्रहण समारोह भगतसिंह के गांव में करने की धोषणा की साथ ही यह भी कहा कि सरकारी दफ्तरों में मुख्यमंत्री की जगह शहीद भगतसिंह और बाबा साहब आम्बेडकर की फोटो लगेगी। पंजाब में दलित आबादी का बाहुल्य है। यहीं से बहुजन समाज पार्टी के जनक कांशीराम हुए। कांग्रेस ने चुनाव के पहले दलित वर्ग से आने वाले चरणजीत चन्नी को ना केवल मुख्यमंत्री बनाया बल्कि अगले मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट भी किया।
भारत में डिजिटल मीडियम के आगे बढऩे की जो रफ्तार है, उसे देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि यह छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी आने वाले समय में होने वाले चुनावों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा माध्यम बनेगा। इसके पीछे सबसे बड़ी वज़ह यह है कि यह मीडियम युवाओं के हाथ में है और समाज को प्रभावित करने में इसकी बड़ी भूमिका है। आज इस प्रदेश में टीवी से कई गुना ज्यादा स्मार्टफोन हैं। साथ ही, डिजिटल माध्यम से खबरें और विचार तुरंत लोगों तक पहुँचाए जा सकते हैं। इसीलिये इस माध्यम के ज़रिये राजनीतिक दल एक ही विषय-वस्तु को अलग-अलग तरीके से पहुँचा रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान सोशल और डिजिटल मीडिया लोगों की राय को प्रभावित करने में और बड़ी भूमिका निभाएगा और इसकी अनदेखी करने वाले घाटे में रहेंगे।