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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- उपवास परंपरा में पुरुषों की भूमिका नदारद

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- उपवास परंपरा में पुरुषों की भूमिका नदारद

-सुभाष मिश्र

त्यौहारों को लेकर बाजार में रौनक है। स्त्रियों की उपस्थिति से बाजार कुछ ज्यादा ही गुलजार हैं। कोरोना की दहशत से लंबे समय से घर में दुबके लोग अब बचत के पैसों को बाजार में खर्च करने निकल पड़े हैं। दीपावली के बहाने घर की साफ-सफाई में व्यस्त औरतें करवा चौथ व्रत की खरीददारी के लिए पूरे मनोयोग से लगी दिखाई दे रही हैं। इनमें अधिकांश वो स्त्रियां हैं जिनके पतियों के बटुए उन्हें त्यौहार के नाम पर खाली करना है। पति उनके लिए उपवास तो नहीं रखता है किन्तु उपवास के उपकरण और सामग्री के नाम उन्हें खरीददारी की पूरी छूट जरुर देता है ताकि वह अपने आपको जस्टिफाई कर सकें। एक तरह से वह सामग्री दिलाने के बहाने स्त्री शक्ति को प्रसन्न रखना चाहते हैं ताकि वह वाकई दीर्घायु रहे। हिन्दी सिनेमा ने जिस पर पंजाबी समाज का गहरा प्रभाव और पकड़ रही है, उसने करवा चौथ के त्यौहार, व्रत को बहुत ग्लैमराईज करके महिमामंडित किया है।

करवा चौथ पर पति के लिए निर्जला व्रत रखने वाली स्त्रियां चाहे वे परंपरागत संस्कारों वाली हों या आधुनिक सोच वाली, वह कभी भी अपने पति से यह अपेक्षा नहीं करती कि वह उसके लिए इसी तरह का निर्जला व्रत रखें। आजकल कुछ पुरुष स्त्री के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी उत्सवधर्मिता, फेसबुक स्टेट्स और सोशल इमेज को चमकाने जरुर उपवास रखने वाले हैं। पितृसत्तात्मक समाज द्वारा थोपी गई इस परंपरा में सारा समर्पण, प्रेम और शुचिता स्त्री के लिए ही है। बहुत से धर्मों में ईश्वर से साक्षात्कार का अधिकार केवल पुरुषों को ही है। सृजन की सबसे शक्ति जो दुख सहकर भी पुरुष को आनंद का, पितृत्व का सुख प्रदान करती है उसके दीर्घायु जीवन के लिए पुरुष कभी उपवास नहीं रखता। पुरुष स्वभाव से पलायनवादी है। वह पत्नी के नहीं रहने के बाद जल्द ही विवाह कर लेता है और अधिकांश स्त्रियां पति की मृत्यु के बाद एक विधवा के रुप में रंगहीन जीवन जीने को बाध्य रहती हैं। हमारे यहां कहा भी जाता है कि पुरुष ही स्त्री का भगवान है। पुरुष के चरणों में स्त्री का स्थान है। अधिकांश उपवास, पूजा पद्घति संभावित भय को केन्द्र में रखकर गढ़ी गई है। पति के दीर्घायु जीवन से जुड़े उपवास हों या संतोषी माता का उपवास हो सभी के केन्द्र में भय है। किसी भी धर्म या समाज में स्त्रियों की लम्बी उम्र या उनकी बेहतरी के लिये कोई व्रत त्यौहार का विधान नहीं है। अशक्त बीमार, नौकरीपेशा, आधा पेट खाने वाले शराबी कबाबी पति से परेशान स्त्री भी निर्जला व्रत रखती हैं। मामला चाहे करवा चौथ का हो या तीज का या वट सावित्री का व्रत, सभी में कुंवारी लड़की को मनचाहा पति पाने की लालसा वहीं विवाहित स्त्री पति की लम्बी उम्र के लिए उपवास रखती हैं। स्त्रियों द्वारा किये जाने व्रतों के साथ डर स्थायी भाव के रूप में जुड़ा हुआ है। पति के बिना जीने का डर, समाज में अलग-थलग पड़ जाने का डर।

स्त्रियों से जुड़े सभी व्रतों की कथा में भी अनेक प्रकार से डराया गया है। अगर कोई स्त्री व्रत नहीं करती है तो वह सात जन्म तक बांझ रहती है और हर जन्म में विधवा होती है। यही नहीं मृत्यु के बाद नरक में जाती है। व्रत में अगर कोई स्त्री पानी पीती है तो अगले जनम में जोंक बनेगी, दूध पीती है तो सांप, मिठाई खाने से चींटी, दही खाने से बिल्ली, फल खाने से बंदरिया, अनाज खाने से सूकड़ी और सोने से अजगर बनेगी।

नारी के प्रति हमारी सारी धारणाएं दो मूल तत्वों से बनी हुई है। वह है भय और घृणा। भय खुशामदी प्रशस्तियों और स्तुतियों को व्यक्त करता है, घृणा दार्शनिक और धार्मिक पलायन में। पुरुष हमेशा महिलाओं की स्वतंत्र सत्ता से डरता रहा है। सामंती व्यवस्था में नारी सिर्फ एक वस्तु है, संपत्ति है, संपर्क और संतान की इच्छा पूरी करने वाली मादा है। जर, जमीन और जोरु तीनों ही पुरुष समाज में झगड़ें की जड़ें हैं क्योंकि मूलत: ये तीनों संपत्ति हैं। आज से करीब 117 साल पहले एक अज्ञात हिन्दू औरत द्वारा आर्य स्त्री की प्रार्थना के जरिए सीमंतिनी उपदेश लिखकर स्त्रियों के दुख को व्यक्त किया गया था। उसके ठीक 100 साल बाद मैत्रेयी पुष्पा जैसी एक विख्यात लेखिका एक स्त्री का घोषणा पत्र लिखकर वही सारी बातें उठाती है, जो कि सौ साल पहले उठाई गई थी। एक सदी के बीतने पर स्त्रियां लगभग यथावत दिखाई देती हैं। महाभारत, मनुस्मृति में स्त्रियों को सिवाय पति सेवा के किसी तरह का पुण्य नियम नहीं लिखा। रामचरितमानस में तुलसीदास कहते हैं कि बुद्घि रोग सब जड़मति हीना, अंध बधिर क्रोधी अति दीना।। ऐसेहु पतिकर कर्म अपनाना, नार पावे यमपुर दुख नाना।।

ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी ये सब ताडऩ के अधिकारी। रामचरित मानस की यह चौपाई हमारे समाज की मानसिकता की सटिक अभिव्यक्ति है। हिन्दू समाज की ही नहीं, सारे मनुष्य समाज की यही मानसिकता रही है। दुनिया की हर सभ्यता और हर धर्म में स्त्री जाति के प्रति यही रवैया रहा है। भ्रूण हत्या, शिशु हत्या, ताडऩ और बलात्कार के मामले में कोई भी समाज पीछे नहीं रहा है। किसी ने उसे नरक की खान कहा, किसी ने उसे दोजख की भट्टी कहा, किसी ने फतवा दिया-फ्रेल्टीदाई नेम इज वुमन और किसी ने कहा त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं, दैवो न जानति कुतो मनुष्य। धार्मिक स्थानों में स्त्री आज भी बहिष्कृत है। उन्हें पादरी बनने का अधिकार नहीं है, उन्हे मस्जिद में नमाज पढऩे का अधिकार नहीं है, अनेक मंदिरों में उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं है। 21वीं सदी की लड़ाई स्त्री को मनुष्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई है। अभी यह लड़ाई शुरु हुई है। अगली सदी इस लड़ाई की सदी होगी। अत्यंत प्राचीन काल में पत्नी को चल-अचल संपत्ति समझा जाता था, अत: उसके स्वयं संपत्ति की स्वामिनी होने का प्रश्न नहीं उठता। वैदिक काल में स्त्रियों को उपहार रुप में दिया जाता था। महाभारत में भी धृतराष्ट्र कृष्ण का आदर करने के लिए एक सौ दासियां देने को उद्घत हो जाते हैं। पति को पत्नी का पूर्ण रुप से स्वामी समझा जाता था। ऋग्वेद से ज्ञात होता है कि पति अपनी पत्नी को जुएं में दांव पर लगा सकता था। इसी आधार पर हरिश्चंद्र अपनी पत्नी शैव्या को बेचने को तैयार हो गए।

परिवार और समाज स्त्रियों के त्याग और अधिकार पर आधारित है। 21वीं सदी के आते-आते स्त्री पुरुष के संबंधों के बीच यह वातावरण बनने लगा है कि स्त्रियों को सुरक्षा और स्वतंत्रता के आधार पर अपनी मर्जी से रिश्ते बनाने के अवसर मिल रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला संगठन की मांग पर एमनेस्टी इंटरनेशनल ने स्त्रियों का उत्साहजनक चित्र प्रस्तुत किया। स्त्री को मानव अधिकारों से वंचित करने के सुझाव को दूर किया जाए। सशक्त संघर्ष के दौरान स्त्रियों को मानव अधिकारों से दूर रखा जाए। स्त्री केवल त्रियाचरित्र नहीं। विश्वास के दायरे के भीतर भी उसका कोई मित्र हो, आधुनिक समाजों में ये सब बातें आम स्वीकृति प्राप्त करने लगी हैं। भारतीय समाज के लिए यह नई बात जरुर है, लेकिन यहां पर यह विरोधाभास भी देखने को मिलता है कि आधुनिकता की बढ़ती चाहत के साथ-साथ परंपरा का आक्रोश बढ़ रहा है। आधुनिकता का आशय मनुष्य के जीने से है। स्त्रियों ने ऐसी ही महिलाओं को अपने ढंग से समझने और सामाजिक महिला बनाने के लिए राजनीतिक पहल की है।

आधुनिक युगीन महिला में जहां अपनी देह के प्रति मोह बढ़ रहा है, वहीं उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ी है। उसे अपने दायित्वों में अपनी सुरक्षा को खोजना है। आज से 50 वर्ष पहले देह क्रांति अमेरिका, यूरोप में शुरु हुई थी वह हमारे समाज में विकसित हो रही है। एक नया पश्चिमी सौंदर्यशास्त्र हमारे बाजारों घरों के ड्राइंग रुम तक फैला है। सवाल यह है कि श्रमिक वर्ग की औरतों में सुंदर दिखने की चाह उतनी नहीं होती जितनी उच्च व मध्यम वर्ग की औरतों में होती है। पिछले एक दशक में हमारे यहां सौंदर्य प्रतियोगिताओं की बाढ़ सी आ गई है। अब यह स्पर्धा महानगरों से चलकर छोटे-बड़े कस्बों तक पहुंच गई है।

पूंजीवाद ने अपनी जरुरतों से स्त्रियों को चूल्हा-चौकों की गुलामी से आंशिक मुिक्त दिलाई और स्त्रियों को दोयम दर्जे की नागरिकता देने के साथ ही उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती गुलाम बनाकर सड़कों पर धकेल दिया। स्त्री की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वह अपनी भूमिका स्वयं कभी तय नहीं करती, न परंपरा में और न ही आधुनिकता में। आधुनिकता का बोझ ढोती एक औरत से हम उसके सीता होने की कामना करते हैं, जो अग्नि परीक्षा देती है। उस सीता की कामना नहीं करते जिसने राम की चुनौतियों को स्वीकारा।  अधिकांश स्त्रियां पूरी सज-धज, नियम, धर्म और कठोरता के साथ तीज का व्रत रखकर पतियों के दीर्घायु जीवन की कामना कर रही हैं। पति भी क्रिकेट मैच, ओटीटी प्लेटफार्म पर फिल्म देखते हुए मजे से खा पीकर अपने को पत्नी की प्रार्थना, उपवास में सुरक्षित देख रहा है। आधुनिक सावित्री अपने सत्यवान को हर मुसीबत से बचा ही लेगी, भले ही सत्यवान कुछ भी क्यों ना करे।