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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने की कवायद

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने की कवायद


संदर्भ: राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव

 -सुभाष मिश्र
रिमिक्स और अपसंस्कृति के इस बाजारू समय में जब मौलिक चीजों को नष्ट करके उन्हें पापुलर कल्चर के नाम पर बेचने की कवायद हो रही हो, ऐसे समय में देश-विदेश के आदिवासी समाज में प्रचलित गीत-संगीत और नृत्य को बचाये रखने की कोशिश निश्चित ही सराहनीय है। छत्तीसगढ़ में हो रहा राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव अपनी उस आदिम संस्कृति को सहेजने, संवारने की कोशिश है, जिसे धीरे-धीरे बाजार के हवाले करके नष्ट किया जा रहा है। इस समय इंटरनेट पर लोक कला के नाम पर जिस तरह के अश्लील डांस, गाने और किस्से कहानियों की भरमार है उसने हमारी संस्कृति विरासत, गीत, संगीत और स्वस्थ किस्सा गोई की परपंरा को नष्ट किया है। भोजपुरी, हरियाणवी और ब्रज की लोककथाएं, लोकगीतों को अश्लीलता की चाशनी में पिरोकर स्टूडियो में शूट करके अलग-अलग संचार माध्यमों से बाजार में बेचा जा रहा है। विवाह के दौरान बारात के जाने के बाद स्त्रियों द्वारा रचे जाने वाली नकटा प्रथा हो या फिर देहाती खोइया नृत्य या लैंडा नृत्य सभी में भरपूर मात्रा में अश्लीलता को समाहित करके उसे सस्ते देशी मनोरंजन के नाम पर परोसा जा रहा है। जबलपुर की रंगकर्मी स्वाति दुबे द्वारा निर्देशित नाटक अगरबत्ती में नकटा प्रथा के जरिए स्त्रियों के भीतर के आक्रोश और पुरुषों की लंपटता को उजागर किया गया है। एक गंभीर रंगकर्मी जिस प्रथा को स्त्री का शोकगीत बनाकर प्रस्तुत करती है, बाजार उसे अश्लीलता की चाशनी में पिरोकर बेचता है।

हमारी आदिवासी नृत्य संस्कृति को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राजधानी रायपुर में तीन दिनों तक चलने वाले आदिवासी नृत्य महोत्सव में सात देशों के नर्तक दल सहित देश के 27 राज्यों तथा छह केन्द्र शासित प्रदेशों के 59 आदिवासी नर्तक दल शामिल हो रहे हैं। इन नर्तक दलों में लगभग 1000 कलाकार शामिल होंगे, जिनमें बहुत विदेशी कलाकार शामिल हो रहे हैं। राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में प्रत्येक राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश के नर्तक दल दो विधाओं तथा अपने राज्य की अन्य पारंपरिक विधाओं में अपनी प्रस्तुति देने जा रहे हैं। दोनों विधाओं में प्रथम तीन स्थान पर रहने वाले नर्तक दलों को कुल 20 लाख रुपए की पुरस्कार राशि, प्रमाण पत्र और ट्रॉफी प्रदान की जाएगी। प्रत्येक विधा में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले दल को पांच लाख रुपए, द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले दल को तीन लाख रुपए तथा तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले दल को दो लाख रुपए की पुरस्कार राशि से सम्मानित किया जाएगा। राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का यह शानदार दूसरा साल है।  

हमारा भारत देश 'विविधता में एकता वाला देश है । यहां पर विभिन्न धर्मो व सम्प्रदायों के लोग रहते हैं। सभी की अपनी-अपनी भाषाएं, रहन-सहन, वेशभूषा, रीति-रिवाज है। सबकी अपनी-अपनी संस्कृति है।

आदिवासी समाज और संस्कृति के प्रति हमारे तथाकथित सुसंस्कृत समाज का रवैया क्या है? वो चाहे सैलानी हो, पत्रकार, लेखक हों या समाजशास्त्री, आमतौर पर सबकी एक ही मिलीजुली कोशिश इस बात को खोज निकालने की रही है कि आदिवासियों में अद्भुत और विलक्षण क्या है? बहुत सारे लोग आदिवासी जनजीवन गुदगुदाने वाले सनसनीखेज लगते हैं। यही वजह है कि बहुत बार उन्हें एक अलग नजरिए से देखा जाता है मानो वे आदिम युग के कोई आदिमानव हो जिन्हें लोग कौतूहल के रूप में देखते हैं। उन्हें आदिवासी जनजीवन किसी अजूबे की तरह लगता है। घोटूल से लेकर उनका रहन-सहन रीति-रिवाज, तीज-त्यौहार सभी नागर सभ्यता में पले-बढ़े लोगों के लिए अभी भी किसी फिल्म की तरह लगती है। बहुत सारे लोगों को आदिवासी जनजीवन की कलात्मक अभिव्यक्तियां, सौन्दर्यात्मक चेष्टाएं और अनुष्ठानिक क्रियाएं शहरी कला संस्कृति की तरह आराम के क्षणों को भरने वाली चीजों नहीं हैं, उनकी पूरी जिन्दगी से उनका एक क्रियाशील, प्रयोजनशील और पारस्परिक रिश्ता है। कला संस्कृति के क्षेत्र में हो रही मिलावट लोक जीवन से लेकर लोगों को सहज स्वीकार हो। एक समय था जब मिलावटखोरी से सारा देश परेशान था। मिलावटखोरों को सरेआम फांसी पर लटकाये जाने के नारे दिए जाते थे, किंतु धीरे-धीरे मिलावटखोरी को सभी ने  आत्मसात कर लिया। कई बार तो शुद्धता की वजह से लोगों का हाजमा और स्वाद दोनों ही बिगड़ जाता है। अब मिलावट हमारे चरित्र का, जीवन का हिस्सा बन गई है। मिलावट की इस प्रक्रिया से गुजरते हुए अब हम रिमिक्स से आगे बढ़कर अश्लीलता तक पहुंच गए। समूची पीढ़ी रिमिक्स में जी रही है। हमारा सारा वातावरण विशेषकर के गीत-संगीत फिल्म दृश्य और बातचीत सभी कुछ पर रिमिक्स का जादू जल गया है। ओरिजिनल से ज्यादा प्रभावी साबित हो रहा है रिमिक्स। बाजार की ताकतें सृजन में कम रिसाइकिलिंग में ज्यादा विश्वास करती है। रिमिक्स के जरिये कहीं न कहीं से यह बतलाने का प्रयास हो रहा है कि पुराना सब कुछ कूड़ा है। छत्तीसगढ़ की समृद्ध कला संस्कृति भी इन दिनों संकट से गुजर रही है। यहां की लोकधुनें, लोकनृत्य सभी पर रिमिक्सिंग का प्रभाव साफ देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ नाचा में टी.वी. फिल्म में दिखाए जाने वाले भांगड़ा पाप, वेस्टर्न म्यूजिक का मिक्चर दिखाई पड़ा। नाचा के छत्तीसगढ़ी में भी रिमिक्स आ गये हैं। छत्तीसगढ़ी लोक कला के प्रदर्शन के नाम पर जगह-जगह घूम-घूमकर गीत-नृत्य प्रस्तुत करने वाले समूह द्विअर्थी गानों के जरिये साल भर प्रस्तुति करते घूमते देखे गये हैं। गांव के मनचले धनाढ्य लोगों के माध्यम से इनकी बुकिंग साल भर के लिए रहती है।

छत्तीसगढ़ में गायी जाने वाली भोजली, सोहरगीत, गौरा-गौरी, बिहाव गीत बहुत कम सुनने को मिलता है। जवारा गीतों में भी अब आधुनिकता का प्रभाव साफ दिखाई देता है। छेरछेरा, फुगड़ी जैसे गीत भी अब मंचीय प्रस्तुतियों में नदारद है। कर्मा, सुआ, पंथी नृत्य, राऊतनाचा, ददरिया की विरासत को कैसे संभाले रखा जाए यह हमारे समय की चिंता का विषय है। छत्तीसगढ़ में खड़े साज गीत, कायाखंडी भजन की जो परंपरा थी वह भी विलुप्त होती दिखती है। संगीत मंडलियों से पारंपरिक साज मोहरी, झांक मजरिया, सारंगी, रूनडु गायब हो गए हैं। उनका स्थान नए-नए वाद्ययंत्रों ने ले लिया है। हमारी कला, संस्कृति गीत-संगीत और परंपाएं मौलिकताएं बची रहे इसके लिए जरूरी है कि इनके ओरिजिनल स्वरूप का डाक्यूमेंटेशन हो। आदिवासी नृत्य समारोह जैसे आयोजन के साथ आदिवासी जनजीवन, संस्कृति और सारी बातों के संरक्षण के प्रयास होने चाहिए जो धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं।