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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सियासत का आध्यात्म

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -सियासत का आध्यात्म

-सुभाष मिश्र
देवउठनी एकादशी के साथ ही हमारे सोये हुए देवतागण जाग गये। बैंड-बाजा-बारात का मौसम भी लौट आया। उत्तरप्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव, अगले साल लोकसभा के चुनाव को देखते हुए हमारे नेता भी धीरे-धीरे अपनी गहन निद्रा से जागकर जनता की सुध-बुध लेने में लग गए हैं। सियासत का अपना एक अलग किस्म का अध्यात्म होता है। राजनीति और धर्म का चोली दामन का साथ है। आज के दौर में हर राजनैतिक दल, भले ही उसका मुखौटा धर्मनिरपेक्षता का क्यों न हो धर्मरूपी गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करना चाहता है। वोट बैंक को ध्यान में रखकर अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग तरह का राग अलापा जाना है। कहीं आरक्षण का राग है, तो कहीं पिछड़ेपन का, कहीं विकास का राग है, तो कहीं क्षेत्रीय अस्मिता का। जिस जगह जो राग जम जाए वहीं अलापा जा रहा है।

आप जनता दुष्यंत कुमार के इस शेर को याद करते हुए खामोश हैं-
जैसा जी चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं है आदमी, हम झुनझुने हैं।

बहुत सारे प्रशांत किशोर, बहुत सी सर्वे कंपनियां जनता की खामोशी, जनता की राय जानने तरह-तरह के विशेषज्ञों की सेवाओं, सर्वे प्रपत्र लेकर निकल पड़ी हंै। टिकिट के भावी दावेदार जगह-जगह मत्था टेककर अपने आपको फोटोवाल होर्डिंग के जरिए  शहर भर को बधाई देते नहीं थक रहे हैं। शहर के खंभे-चौराहों पर होर्डिंग के पेड़ उग आये हैं जिस पर देश-प्रदेश, शहर का भविष्य टंगा हुआ है।
जड़े फ्रेम के भीतर टंगे हुए हैं ब्रम्हचर्य के कड़े नियम
इसी फ्रेम के पीछे चिडिय़ा गर्भवती हो जाती है।

आमजनता से जुड़ी समस्या, सवाल और दुख तकलीफों को लोकसभा, विधानसभा में प्रश्नों के जरिए उठाने वाले निर्वाचित प्रतिनिधि वहां से नदारद हैं। हम कह सकते हैं कि वे हमारे देवताओं की परंपरा का पालन करते हुए निद्रा अवस्था में हैं, ताकि किसी को उनके जागने से कष्ट न हो।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान नारायण से लक्ष्मी जी ने पूछा- हे नाथ! आप दिन-रात जागते हैं और सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्षों तक सोते रहते हैं। आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा। लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्कुराए और बोले- देवी! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों और खासकर तुमको कष्ट होता है। तुम्हे मेरी वजह से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। अत: तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रतिवर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को अवकाश होगा।

मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलय कालीन महानिद्रा कहलाएगी। मेरी यह अल्पनिद्रा मेरे भक्तोंं के लिए परम मंगलकारी होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे और शयन व उत्थान के उत्सव को आनंदपूर्वक आयोजित करेंगे उनके घर में मैं तुम्हारे साथ निवास करूंगा।

हमारे यहां धार्मिक मान्यता है देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा के बाद जागते हैं। चार माह के लिए क्षीर सागर में निद्रा करते हैं। इन चार महीनों को ही चातुर्मास कहा जाता है। भगवान विष्णु के देवउठनी एकादशी पर जागने से पिछले चार माह के लिए रुके विवाह और सभी तरह के मांगलिक शुभ कार्य दोबारा से शुरू हो जाते हैं। इस दिन तुलसी और शालिग्राम विवाह का भी आयोजन किया जाता है।

तुलसी चौरा के इर्द-गिर्द गन्ने को लगाकर पूजा करते हुए बहुत सारी स्त्रियां पूजा-पाठ के साथ जिनमें मेरी बाई यानी मां भी शामिल थी यह दोहा दोहराती थी -
उठो देव सांवरे
भट्टा भाजी खाओ रे
कुंवारी को ब्याह होए
ब्याही को गौना जाए
गौना वाली को लड़का होए।

जिस तरह देवउठनी एकादशी को हमारे भगवान जागते हैं उसी तरह हमारे जनप्रतिनिधि भी विधानसभा, लोकसभा सत्र के दौरान अपने प्रश्नों और उपस्थिति के जरिए अपने जागृत रहने का सबूत देते हैं। बहुत बार क्षेत्र की जनता चुनाव के बाद इन्हें ढूंढती रहती है और ये मिस्टर इंडिया की तरह गायब हो जाते हैं फिर चुनाव का मौसम आता है इसके दर्शन सहज सुलभ हो जाते हैं। इनकी चुनिंदा जनता इन्हें देखकर कह उठती है
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।

छत्तीसगढ़ विधानसभा के जनवरी 2019 से लेकर जुलाई 21 तक के आठ सत्रों की बात की जाये तो इनमें प्रश्नों के लिए निर्धारित बैठकों की संख्या थी जिसमें छत्तीसगढ़ विधानसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमावली के नियम 31 के अनुसार एक बैठक में किसी एक सदस्य से अधिकतम 4 चार प्रश्न ही लिए जाते हैं। 90 सदस्यों वाली विधानसभा में 78 सदस्यों में से कुछ सदस्यों ने दो, चार, 12, 14, 15, तक ही प्रश्न पूछने के लिए जमा किये जबकि निर्धारित मापदंड के अनुसार वे 340 तक प्रश्न पूछने के लिये दे सकते थे। इससे ज्यादा बुरा हाल हमारी लोकसभा, राज्यसभा का है। काश ये भी हमारे ईश्वर की तरह चार माह की निंद्रा से जागकर बाकी समय सक्रिय रहकर अपनी जनता के दुख- दर्द को हल नहीं भी कर सकते थे तो उनके बारे में प्रश्न पूछकर उन्हें तसल्ली तो दे ही सकते थे।
बहुत सारे सदस्य तो प्रायोजित प्रश्न पूछते हैं, कुछ लोग कारर्पोरेट घरानो के पेरोल पर रहते हैं तो कुछ प्रश्न पूछते नहीं पूछने तक के पैसे लेते हैं।
देश के सबसे बड़े उत्तरप्रदेश जिसे मोदी सरकार उत्तम प्रदेश बनाने पर आमदा है और वो है कि बनना ही नहीं चाहता वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं। साढ़े चार सालों में कोई दंगा नहीं हुआ। दीपावली समेत सभी पर्व शांतिपूर्वक संपन्न हुए। उन्होंने कहा कि अयोध्या में दीपोत्सव का उत्तर प्रदेश का आयोजन वैश्विक मंच पर छा गया है। दिवाली तो हमारे आने के पहले से मनाई जाती रही है, प्रयागराज में कुंभ भी पहली बार नहीं हुआ था, लेकिन तब यूपी के सामने पहचान का संकट था।

अब जरा सोचिए जिस राज में गंगा, यमुना हो, त्रिवेणी हो, जहां राम-कृष्ण जैसे जाने कितने भगवान अवतरित हुए हों, जो देश की सबसे बड़ी मोक्ष नगरी काशी को अपने में समेटे हुए है, ऐसे उत्तरप्रदेश के सामने पहचान का संकट है? अब रामलला का मंदिर बन जाने से यह संकट दूर हो जाएगा। योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि वे अयोध्या के दीपोत्सव, प्रयागराज के भव्य-दिव्य कुम्भ जैसे आयोजनों, बेहतर कानून व्यवस्था, निवेश और रोजगार के भरपूर अवसरों तथा जनकल्याणकारी योजनाओं और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक उनके क्रियान्वयन से हमनें उत्तर प्रदेश को पहचान के संकट से मुक्ति दिलाई है।

मोदी जी उत्तरप्रदेश में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का उद्घाटन करने जा रहे है। पूर्वांचल एक्सप्रेस वे 60 लाख लोगों को रोजगार जेनरेट होगा ऐसा दावा किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव में चुनावी वादों में बिजली, रोजगार, विकास आदि को बात हो रही है। इसके अलावा कोरोना संक्रमण से डरी हुई जनता को मुफ्त इलाज, मुफ्त ऑपरेशन, मुफ्त ओपीडी, सभी तरह की दवायें मुफ्त जैसे वादे किये जा रहे हैं। देश में आये कोरोना संकट के बाद से अब सभी राजनैतिक दलों के एजेंडे में स्वास्थ सुविधाओं की बेहतरी प्रमुख मुद्दे के रूप में शामिल हैं। सभी दल अपने घोषणा पत्र में वो सपने दिखा रहे हैं जैसे सपने देवउठनी एकादशी के साथ ही युगल हनीमून के सपने देखने लगते हैं जिनका ब्याह हो रहा है या निकट भविष्य में होने वाला है। चुनाव के पहले और शादी के नजदीक और बाद का थोड़ा समय हनीमून पीरिएड की तरह बीतता है। उसके बाद तो अमीर मीनाई का शेर ही याद आता है-
अच्छे ईसा हो मरीजों का ख्याल अच्छा है
हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है।।