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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - माता कौशल्या के जरिए 'राम की तलाश

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  माता कौशल्या के जरिए 'राम की तलाश

-सुभाष मिश्र 

छत्तीसगढ़ जिसे दक्षिण कौशल भी कहा गया है, यहां व्याप्त जनआस्था और जनश्रुति के अनुसार यह माता कौशल्या का मायका और भगवान राम का ननिहाल है। भगवान राम ने अपने 14 साल के वनवास में 11 वर्ष दंडकारण्य में बिताये थे, जो वनों से आच्छादित वह क्षेत्र था जो इस समय छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, मध्य प्रदेश और झारखंड में स्थित है। छत्तीसगढ़ की सरकार राम वन गमन परिपथ के जरिए कोरिया से लेकर सुकमा तक ऐसे मार्ग निर्मित कर रही है जिस पर भगवान राम का वनगमन हुआ था।

जनश्रुति के अनुसार, छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में राम के वनवास का पहला पड़ाव माना जाता है। यहां नदी किनारे 17 गुफाएं हैं। इसे सीता की रसोई के नाम से जाना जाता है। इस पूरे मार्ग को सामाजिक, आर्थिक और महिला स्वावलंबन की गतिविधियों से जोड़कर यहां वैदिक ग्राम, वन ग्राम, आयुर्वेदिक ग्राम और स्वसहायता समूहों के जरिए आर्थिक रुप से संपन्न गांवों की कल्पना की गई है। इस मार्ग पर भगवान राम की यात्रा के कोई पुरातात्विक अवशेष नहीं हैं। यह एक तरह से भावना का प्रगटीकरण और इस वातावरण को निर्मित करने का प्रयास है जिस पर चलकर लोगों को लगे कि वे राम के पथ पर चल रहे हैं। दरअसल, हमारे यहां रामनाम की माला जपने और राम नाम से एक दूसरे को संबोधित करने की दीर्घकालिक परंपरा है। छत्तीसगढ़ के रायपुर से चन्दखुरी में माता कौशल्या का मंदिर है जिसका सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्घार करके रामवनगमन पथ परियोजना का शुभारंभ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने किया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मौके पर कहा कि सब राम को अलग-अलग रूप में देखते हैं। कुछ लोगों के लिए राम केवल वोट हैं। उनके सहारे कई लोग वैतरणी पार करना चाहते हैं। हम लोग राम को भांजा राम, वनवासी राम, गांधी के राम, कबीर के राम, तुलसी के राम और शबरी के राम के रूप में देखते हैं। हम गांधी के अनुयायी हैं जिनके मुंह से मरते समय भी राम का ही नाम निकला था। मुख्यमंत्री ने कहा, भगवान राम की माता कौशल्या इसी धरती की बेटी है। इस वजह से भगवान राम के व्यक्तित्व में छत्तीसगढ़ का भी योगदान रहा है। शायद यहीं के संस्कारों और संस्कृति ने उन्हें मर्यादा का आदर्श स्थापित करने में मदद की। राम हमारी संस्कृति में रचे-बसे हैं। हमारे यहां तो हर भांजा राम का रूप है। भांजा उम्र में कितना भी छोटा हो यहां उसका पांव छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा है।

हमारे यहां कहा जाता है कि हरि अनंत हरि कथा अनंता। उसी तरह रामकथा, रामायण भी है। जनश्रुति और मिथक के माध्यम से कहा तो ये भी जाता है कि सबसे पहले श्रीराम की कथा हनुमानजी ने लिखी फिर महर्षि वाल्मिकी ने। जितनी भाषाएं प्रचलित की उतनी ही रामकथाएं भी। राम सबके हैं पर सबसे ज्यादा सबसे पहले जिन्होंने राम को लेकर लिखा है उनमें आदि कवि वाल्मिकी की रामायण भवभूति की उत्तर रामचरित है। इसके अलावा अन्नामी, बाली, बांग्ला, कम्बोडियाई, चीनी, गुजराती, जावाई, कन्नड़ में कुमु हेन्दु रामायण। कश्मीरी खोटानी लाओसी मलेशियाई मराठी ओडिय़ा में रूईपद काटेदापाडी रामायण प्राकृत संस्कृत संथाली सिंहली तमिल में काम्बा रामायण तेलुगू में रघुनाथ रामायण था। तिब्बती, कावी आदि हजारों भाषाएं रामकथा में कही गई।

छत्तीसगढ़ सरकार ने राम वन गमन पर्यटन परिपथ के विकास के लिए 137 करोड़ का कॉन्सेप्ट प्लान बनाया है। इस परिपथ के तहत कुल 75 स्थान चिन्हित किए गए हैं। प्रथम चरण में 9 स्थालों सीतामढ़ीहर, चौका, कोरिया रामगढ़ सरगुजा शिवरीनारायण जांजगीर-चांपा तुरतुरिया बलौदाबाजार चंदखुरी रायपुर राजिम गरियाबंद सिहावा सप्तऋषि आश्रम धमतरी जगदलपुर बस्तर रामाराम सुकमा शामिल है। इस परियोजना की शुरूआत रायपुर के निकट स्थित चंदखुरी से हो गई है। चंदखुरी भगवान राम का ननिहाल है। यहां माता कौशल्या का प्राचीन मंदिर है जो सातवीं शताब्दी का है। माता कौशल्या मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण तथा विकास के लिए 15 करोड़ 45 लाख रुपये की कार्ययोजना पर कार्य किया जा रहा है। राम वन गमन पर्यटन परिपथ के तहत लगभग 2260 किलोमीटर सड़कों का विकास किया जाएगा।

आज चारों ओर रामराज्य की बात हो रही है। अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बनने जा रहा  है। समूची अयोध्या राममय है। देश में राम वन गमन का मार्ग तलाश कर वहां पर रामराज्य की झांकी को उकेरने की शुरुआत आज से छत्तीसगढ़ में हो गई है। माता कौशल्या के मंदिर का जीर्णोद्घार और सौंदर्यीकरण करके राम मर्यादा पुरूषोत्तम थे। राम के नाम से सब काम हो जाते हैं, ऐसी मान्यताएं है। छत्तीसगढ़ जिसे राम का ननिहाल कहा जाता है जो माता कौशल्या का घर है। वहां भी रामवन गमन को लेकर खासा उत्साह है। कबीर चौरा के आसपास रामनामी संप्रदाय के लोग जिनके समूचे शरीर में रामनाम का गोदना गुदा रहता है, रहते हैं। गांव-गांव में रखे जाने वाले नामों में न जाने कितने लोगों के नाम में राम जुड़ा हुआ है। आपस में मिलने पर राम-राम की परंपरा है। शवयात्रा में भी रामनाम सत्य है सबकी यही गत है, का उद्घोष सुनाई देता है।

देश में बहुत सारे लोग रामनाम की वैतरणी से अपने भवसागर को पार करने की जुगत में हैं। राम अब केवल ईश्वर या आस्था के प्रतीक मात्र नहीं हैं। वे हमारे देश की राजनीति में सर्वाधिक उपयोग में आने वाले नारे में भी तब्दील हो गये हैं। पृथ्वी पर अवतरित प्रत्येक मनुष्य का शरीर राम का है। कवि मित्र ध्रुव शुक्ल कहते हैं कि जहां राम है वहीं अवध है। शरीर तो अयोध्या है हृदय राम का घर है। हमारा स्वभाव ही हमारा प्रवर्तक है। आदिकाल से हमारी जो जानने की इच्छा है वही सृष्टि का आलाप है। तुलसीदास इस सृष्टि को भजते हैं। ये सृष्टि पांच चीजों से पहचानी जाती है काल, कर्म ज्ञान, गुण, स्वभाव और पांच तत्वों में वो अपने को प्रकट करती है। ये पांच तत्व से हमारा शरीर इन्द्री बन जाता है। मन प्रकट हो जाता है। गंध, रूप, स्पर्श, रस और शब्द इन पांच विषयों पर मन रमता है।

केन्द्र सरकार भी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ राम वनगमन मार्ग को बना रही है। इस मार्ग के अंतर्गत भगवान राम से जुड़े 44 स्थानों को शृंग्वेरपुर से जोड़ा जाएगा।  सड़क का निर्माण कार्य अयोध्या से चित्रकूट के बीच राम वन गमन मार्ग का निर्माण शुरू है। चार चरणों वाली इस परियोजना पर कुल 3300 करोड़ रुपये की लागत आएगी। इस परियोजनों में भगवान राम से जुड़े 44 स्थलों के विकास का काम भी शामिल है। हम अपने देश में राम राज्य की कल्पना करते हैं किन्तु रामराज्य जैसी व्यवस्था को लागू करना नहीं चाहते। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई है-
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥