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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-धान के वैकल्पिक प्रोडक्ट पर विचार का समय

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-धान के वैकल्पिक प्रोडक्ट पर विचार का समय

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था हो या राजनीति यह सब धान के इर्द-गिर्द केंद्रित है। सरकार चाहे किसी की हो वह धान खरीदी को तिहार की तरह ही मनाएगी। छत्तीसगढ़ बनने के बाद वर्ष 2002 से सरकार द्वारा समितियों के माध्यम से धान खरीदी का जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ और पहली बार साढ़े चार लाख क्विंटल धान की खरीद की गई, अब वह 18 साल में बढ़कर एक करोड़ 6 लाख मेट्रिक टन हो गई है । इस बीच में छत्तीसगढ़ सरकार के सामने कई तरह के संकट विधमान है। केंद्र सरकार राज्य के कितना धान लेगी यह तय नहीं है ।

एक अनुमान के अनुसार पीडीएस के लिए 40 लाख मेट्रिक टन धान की खपत होगी। 30 लाख मेट्रिक टन धान भारत सरकार ले लेती है, तो भी सरकार के पास 36 लाख मीट्रिक टन धान बचेगा। इस बचे हुए धान को खुले में सडऩे के लिए छोड़ दिया जाएगा या फिर उसका और कोई बेहतर उपयोग होगा यह अहम् ख्याल है। सरकारी समितियों के पास कुल खरीद की दस प्रतिशत भंडारण क्षमता हैं। जरा सी बारिश होने पर, तेज धूप होने पर धान के सडऩे या सूखने की आशंका हमेशा बनी रहती हैं। सरकार की यह मजबूरी हो जाती है कि वह बची हुई धान जिसे उसने 2500 रूपये क्विंटल में खरीद कर उसे 1500 रूपये क्विंटल में नीलम करें। धान खरीदी का जितना फायदा किसान को नहीं होता उससे कही ज्यादा फायदा बिचौलिया को होता है। अतिरिक्त रूप से धान का यदि वैकल्पि उपयोग नहीं सोचा गया तो आने वाले समय में यह सरकार के लिए बहुत बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है।

पिछले सालो में जो धान समूचे संग्रहण के आभाव में केन्द्रो में पड़ा रहा उसमे से 105 करोड़ का धान या तो सूख गया या चूहे खा गए या चोरी हो गया। छत्तीसगढ़ में एक दिसम्बर से धान खरीदी प्रारम्भ हो गयी हैं। धान के बारदानों को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र शुरू से ही धान खरीदी को रोकने की साजिश कर रहा हैं। विपक्षी दल भाजपा छत्तीसगढ़ सरकार को बारदाने की व्यवस्था को लेकर निशाना साध रही हैं। केंद्र सरकार के अधीन कलकत्ता में बैठा बारदाना आयुक्त केंद्र के इशारे पर राज्य को बारदाने की आपूर्ति वैसे नहीं कर रहा हैं, जैसी राज्य की अपेक्षा हैं। बारदाना संकट के चलते राज्य के किसानो को धान की बिक्री में दिक्कत न हो इस बात को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने क्रांतिकारी निर्णय लेकर किसानों से स्वयं के बोरे में धान लाने की अनुमति देते हुए उन्हें प्रति बोरा 25 रूपये देगी, जबकि बाजार में नया बोरा 35 से 40 रूपये मूल्य पर मिलता है। छत्तीसगढ़ को दो लाख 14 हजार बारदानें की गठान की आपूर्ति केंद्र से होगी।

बाजार से एक लाख 13 हजार गठान की व्यवस्था की जाएगी। एचडीएफएफ यानि पॉलिथीन के बारदानें भी इस बार धान खरीदी में उपयोग में लाये जायेंगे। भाजपा का आरोप है, कि छत्तीसगढ़ की सरकार किसानों से 25 प्रतिशत बारदानें लाने के लिए दबाव डाल रही है। सरकार ने धान खरीदी में किसी प्रकार की अव्यवस्था,मारामारी,भगदड़ न होकर इसको लेकर हाल ही में पीपरछेड़ी गाँव में हुई घटना से सबक लेकर 15 दिन पहले धान खरीदी का टोकन देने का निर्णय लिया है। जहां तक बारदाना की उपलब्धता का सवाल है ,तो सोसाइटियों के पास पिछले सालों के उपयोग किये हुए बारदाने हैं, वहीं पीडीएस में जमा चांवल के बारदाने, मिलर्स के पास धान उठाव के बारदाने और किसानों के पास अपने घर में उपयोग के लिए रखे गये अनाज के बारदाने उपलब्ध हैं। बारदानों की उपलब्धता को लेकर जितनी हाय तौबा मचाई जा रही हैं आने वाले समय में सरकार का किसानों से बारदाना लेने के निर्णय से यह समाप्त हो जायेंगे। सरकार के इस निर्णय से करोड़ो की बचत भी होगी। छत्तीसगढ़ सरकार का यह क्रान्तिकारी निर्णय है।


छत्तीसगढ़ के रायगढ़ की मोहन जूट मिल जो अविभाजित मध्यप्रदेश में बारदाने की आपूर्ति करती थी, कुप्रबंधन के कारण पिछले 5-6 साल से बंद है। छत्तीसगढ़ में लगातार धान की खरीदी बढ़ रही है और छत्तीसगढ़ धीरे-धीरे धान कृषि व्यवस्था वाला राज्य बन रहा है। ऐसे में हर साल बारदानों की जरुरत होगी। सरकार को चाहिए की वह मोहन जूट मिल को पुर्नव्यवस्था से जहां छत्तीसगढ़ के मजदूरों को काम मिलेगा, वही बारदाने को लेकर हमारी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी।
छत्तीसगढ़ में बढ़ते धान की उत्पादन को देखते हुए सरकार को धान के बायॅप्रोडक्ट पर विचार कर राइस ब्रांड आयल, पशु चारा-भूसी से बिजली का उत्पादन और बायो एथनाल यानि जैव ईंधन बनाने की ओर विचार करना चाहिए, जिस तरह पंडरिया के शक्कर कारखाने से पीपीपी मोड पर गन्ने से इथेनॉल बनाया जा रहा है। उसी तरह धान और भूसी से बाकी चीजें बनानी चाहिए।

वैसे छत्तीसगढ़ सरकार ने नवाचार के अन्तर्गत केंद्र सरकार से जैव ईंधन बनाने की अनुमति मांगी है, जो लंबित हैं। पता चला है कि अब केंद्र शीघ्र ही राज्यों को सरप्लस धान से जैव ईंधन बनाने की छूट देने जा रही है। छत्तीसगढ़ सरकार चाहे तो आने वाले दिनों में छोटे-छोटे प्लांट लगाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करके धान के बायप्रोडक्ट बनाने प्रमोट कर सकती हैं। यदि सरकार ऐसा करती हैं तो यह राज्य की आर्थिक व्यवस्था में मिल का पत्थर साबित होगा।


छत्तीसगढ़ सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली पीडीएस सिस्टम को देश के 22 राज्यों ने अपनाया हैं। किसानो के खातों में धान की राशि के सीधे हस्तांतरण ने भी किसानो को आर्थिक स्वावलम्बन प्रदान कर बिचौलियों के चुंगल से बचाया है। छत्तीसगढ़ का किसान प्रति एक एकड़ 15 क्विंटल तक धान सोसायटियों में बेच सकता है। इस समय छत्तीसगढ़ के 22 लाख 66 हजार किसानो ने 2399 समितियों में धान बिक्री के लिए अपना पंजीयन कराया है। छत्तीसगढ़ में 31 जनवरी तक धान 1960 रूपए क्विंटल और कॉमन धान 1940 प्रति क्विंटल खरीदी जाएगी।

सरकार धान के साथ मक्का भी खरीदा जा रहा है जिसका समर्थन मूल्य 1870 रूपए निर्धारित किया गया है। धान खरीदी केन्द्रो पर आने वाले किसानों को कोरोना जैसे संक्रमण से बचाने के लिए कोरोना जांच और टीकाकारण की व्यवस्था की गई है । इस समय छत्तीसगढ़ में फसल की कटाई और मिजाई का कार्य तेजी से चल रहा है। शादी ब्याह के कारण किसान जल्दी से जल्दी अपनी फसल बेचकर अपने खाते में पैसे आने की आस लगातार बैठा है। गांव, गरीब और किसानों की चिंता करने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए लोग यूं ही नहीं कहते है कि भूपेश है तो भरोसा है । अपने बोरे में धान लाओ 25 रूपए के साथ बैंक खाते में नगद पैसा पाओ।