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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - बच्चों की करतूत की सजा मॉं-बाप को

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - बच्चों की करतूत की सजा मॉं-बाप को

-सुभाष मिश्र
हमारे यहॉं कहा जाता है कि माता-पिता के अच्छे-बुरे कर्मों का फल उनकी संतान को भुगतना पड़ता हैं और धीरे-धीरे इसका उल्टा होता दिख रहा हैं। अब बच्चों की लापरवाही, हरकतों के कारण मॉं-बाप प्रताडि़त हो सकते हैं। माता-पिता की व्यस्तता, एकागी परिवार और बच्चों को मनमानी छूट और तरह -तरह के गैजेट की उपलब्धता के कारण बच्चे किस दुनिया में विचर रहें हैं, कहां ऑन लाईन हैं, माता-पिता को नहीं मालूम। बहुत बार सब कुछ मालूम होने के बावजूद माता-पिता इकलौती संतान के मोह में चुप्पी साध लेती हैं। आजकल परिवार में भी प्रायवेसी एक बड़ा मुद्दा है। सबके अपने-अपने गोपन है।

अब चीन की संसद ऐसा कानून बनाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत बहुत बुरा व्यवहार या अपराध करने वाले बच्चों के माता-पिता को भी सजा देने का प्रावधान होगा। परिवार शिक्षा संवर्द्धन कानून के मसौदे के अनुसार बहुत बुरा व्यवहार या अपराध करने वाले बच्चों के अभिभावकों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई जाएगी और उन्हें परिवार शिक्षा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भेजा जाएगा। इस प्रोग्राम में उन्हें बच्चों की देखभाल के तरीकों के बारे में बताया जाएगा। यहॉं यह भी बताया जाएगा कि वे किस तरह से अपने बिगड़े बच्चों को  सुधार सकते हैं। हमारे यहां यदि ऐसी व्यवस्था लागू हुई तो प्राथमिकता क्रम में नेताओं, फिल्म स्टारो, सरकारी अफसरों और नव धनाढय़ों के बच्चों के कारण उनके माता-पिता को यह सुनहरा अवसर मिलेगा। हम अभी तक चीन से तरह-तरह के खिलौने, गेम और बहुत सारी चीजें लेते रहें हैं। आने वाले दिनों में हमें उनसे शायद इस कानून का मसौदा भी लेना पड़ सकता हैं। डॉलर, पौंड और विदेशी पैसा केवल सम्पन्नता नहीं लाता, वो अपने साथ वहॉं की संस्कृति, खान-पान और वे सारी बातों को हमारे बीच लाता है, जिसे हम अपने अनुकूल नहीं समझते। बर्गर, पिज्जा, नुडल्स और विदेशी वेब सीरिज, गेम्स के साथ ऐसा बहुत कुछ आ रहा हैं, जो भारतीय समाज को तेजी से बदल रहा हैं। अब बेडरूम डाईंगरूम में दिख रहा है। कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चिकने पॉंव। अब नये समय के बिरवानो के माता-पिता को कपाल क्रिया के लिए मृत्यु की प्रतिक्षा करने की जरूरत नहीं है। बहुत से बिरवान बच्चे ये काम जीते जी करने पर आमदा हैं। श्रवण कुमारों के इस देश में मां-बाप कंधे तलाश रहे हैं।

किसी नाबालिग बच्चे के बुरा व्यवहार करने के बहुत से कारणों में से एक सबसे बड़ा कारण परिवार में व्यावहारिक शिक्षा का अभाव होता है। हमारे यहॉं वैसे तो करीब दो साल से कोरोना संक्रमण के चलते करीब-करीब स्कूल बंद जैसे ही हैं। माता-पिता बच्चों से तंग आकर बहुत से शिक्षकों का तर्क है कि बच्चे यदि होमवर्क करके नहीं आते, समय पर स्कूल नहीं पहुंचते, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगाते और स्कूल के अनुशासन को तोड़ते हैं तो उन्हें मारना लाजमी है। उन्हें ऐसे समय तुलसी दास की वह शिक्षा याद आती हैं जिसमें कहा जाता है कि भय बिन प्रीत न होये गोंसाई। सूचना क्रांति के युग में मानव अधिकार के जानकार छात्र-छात्रा और बहुत से अभिभावकों को यह व्यवहार बिलकुल भी पसंद नहीं हैं। अमेरिका, यूरोप या फिर बच्चों के अभिभावकों का एक बड़ा वर्ग स्कूल हिंसा, मारपीट के खिलाफ शिकायत करता हैं। बच्चे भी मारपीट करने वाले, हमेशा उलहाना देने या बेइज्जत करने वाले शिक्षक-शिक्षकाओं का सम्मान नहीं करते। शिक्षक/शिक्षका के क्लास में आते ही बच्चों की ऑंखों में एक अलग किस्म की नफरत या भय का भाव होता हैं। जो शिक्षक के हटते ही उपहास या मजाक में तब्दील हो जाता है। बच्चों के मनोविज्ञान को समझने वालो मनोचिकित्सक कहते है की हर बच्चा आइंस्टीन नहीं हो सकता क्लास में पडऩे वाले सभी बच्चो का आइक्यू लेवल अलग-अलग होता है। सभी बच्चो से एक सी अपेक्षा करना ठीक नहीं है। मनोवैज्ञानिक नियमित रूप से पैरेंट्स टीचर मीटिंग पर जोर देते हुए कहते है की यदि बच्चे से किसी भी प्रकार की शिकायत है तो उसके अभिभावक को सूचित कर उनके माध्यम से प्रॉब्लम को हल करना चाहिए। माह में एक दिन सभी अभिभावकों की मौजूदगी में मीटिंग होनी चाहिए। डॉक्टरों का मानना है की शिक्षको की समय-समय पर ट्रेनिंग होनी चाहिए।  उन्हें यह बताया जाना चाहिए की बिना मारपीट के भी अलग-अलग टैक्नीक स ेबच्चो को पढ़ाया-लिखाया जा सकता है। कई बार बच्चे स्कूल में होने वाली मारपीट से अपने पूरे एटीट्यूट को नेगेटिव बना लेते है। कई बच्चे होमवर्क, पढ़ाई, परीक्षा आदि के भय से घर से भाग जाते है। कई बच्चे असफलता के कारण आत्महत्या कर लेते है। माता-पिता उन्हें स्कूल भेजने पर आमदा है और बच्चे भी स्कूल जाकर अपने दोस्त यारो के साथ मिल कर पढ़ाई के साथ-साथ मौज मस्ती करना चाहते है। हमारी पीढ़ी के विद्यार्थी जब तक अपने शिक्षक से पीटे नहीं जाते थे, तब तक उन्हें ज्ञान की सही प्राप्ति नहीं हो पाती थी। पीटना मानो किसी बौधी वृक्ष के नीचे बैठने जैसा हो। क्लास में मुर्गा बनना, कान पकडऩा तो छोटी-मोटी सजा में शुमार था। माता-पिता भी गुरूजी को इसके लिए प्रमोट करते थे। पीटने की इस दीर्घकालिक परंपरा में अब विद्यार्थी अपने अधिकारों के प्रति सजग हो गए है। उन्हें किसी भी तरह की हिंसा चाहे वो स्कूल में हो या घर में हो मंजूर नहीं।

हमारे घरों से नानी, दादी की कहानियॉं गायब हो गई, उसके बदले नई टेक्नोलॉजी और बाजार आ गये। जिनके जरिए अब बच्चों के पास मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप, कंप्यूटर के साथ-साथ ऐसे बहुत से डिवाइस खिलौने आ गए है जो उनकी मनोवृत्ति आदतों को तेजी से बदल रहे है। कोरोनाकाल में ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर गरीब से गरीब माँ-बाप ने भी जैसे-तैसे जुगाड़ कर बच्चो को मोबाइल दिलाया। बहुत जगह सरकार भी अपनी लोकप्रियता और आधुनिक तकनीक से जोडऩे के नाम पर लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल और फ्री वाईफाई बाँट रही है। जिस तरह अमेरिकामें बच्चो के हाथों में आसानी से गन पहुंच रही है, उसी तरह हमारे यहाँ मोबाइल। व्यस्त और लिबरल माता-पिता बहुत ही छोटी उम्र में बच्चो के हाथो में मोबाइल दे रहे है। बच्चे मोबाइल पर क्या देखते है, उन्हें नहीं पता। अमेरिका में पिछले 6 सालों में सात हज़ार बच्चे गन कल्चर की भेट चढ़ गए। हमारे यहाँ मोबाइल कल्चर पता नहीं कितनो को जीते जी पंगु बना रहा हैं। बच्चो में ऑनलाइन गेम का नशा किसी अफीम की लत की तरह होता है, जिसे छुड़ाना हर माँ-बाप के लिए बड़ी चुनौती है। पिछले दिनों से ऑनलाइन गेमिंग के चलते बैंक अकाउंट से पैसे साफ होने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसा ही एक और मामला छत्तीसगढ़ के कांकेर से सामने आया है। जहां एक महिला के बैंक अकाउंट से ऑनलाइन गेमिंग के चक्कर में करीब सवा तीन लाख रुपये कट गए। ये रुपये महिला के 12 साल के बेटे ने गेम में अपडेट्स के साथ खरीदे गए हथियारों को लेने में खर्च कर दिए।

चीन जो की हमसे आबादी और तकनीक में बहुत आगे है और जहाँ नागरिक अनुशासन भी हमारे लोकतांत्रिक देश भारत से कंही ज्यादा है, वहां की सरकार ने बिगड़ते बच्चों को सुधारने के लिए इंटरनेट गेमिंग के घंंटे सीमित किए हैं। बच्चों को शुक्रवार, शनिवार और रविवार को एक-एक घंंटे ही इंटरनेट गेम खेलने की अनुमति है। चीन में बढ़ते पश्चिमीकरण के प्रति चिंता जाहिर करते हुए वहां की सरकार अपने युवाओं का आव्हान कर रही हैं कि वो ज्यादा मर्दाने दिखें, लड़कियों जैसी स्टाइल न अपनाएं। चीन की सरकार समाज को पश्चिमी लाइफ स्टाइल से दूर रखना चाहती हैं। स्वदेशी की वकालत करते हुए हमारे देश में भी बहुत से लोग ऐसा ही कुछ करना चाहते हैं पर कर नहीं पा रहे हैं। कुछ लोग तो देश को मध्य कालीन युग में ले जाने के लिए आमदा हैं। उनका बस चले तो सबका खानपान , वेशभूषा, रहन-सहन एक सा कर दें ।

बच्चों के पास आसानी से उपलब्ध रिवॉल्वर के चलते अमेरिका में कुछ समय पहले ही फ्लोरिडा के पार्कलैंड स्थित हाई स्कूल कैंपस में हुई अंधाधुंध फायरिंग में करीब 17 बच्चों की मौत हो गई। इससे पहले वर्ष 2012 में सैंडी हूक में एक स्कूल में हुई गोलीबारी में 26 बच्चे मारे गए थे। स्कूल के अलावा बीते वर्ष लास वेगस में एक कंसर्ट के दौरान भी भीषण गोलीबारी हुई थी, जिसमें 58 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। जिस अमेरिका में 21 वर्ष की उम्र से पहले अल्कोहल खरीदना गैर-कानूनी है। वहां, ज्यादातर राज्यों में युवा 18 वर्ष की उम्र से पहले ही एआर-15 मिलिट्री स्टाइल राइफल खरीद सकते हैं।

कोरोना महामारी ने बच्चों के मन पर भी गहरा प्रभाव डाला है। बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत नाजुक होते हैं। किसी प्रकार का तनाव, चिंता या कोई आघात उन्हें गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, जिसके कारण उन्हें लम्बे समय तक इसका प्रभाव झेलना पड़ सकता है। कोरोना महामारी ने बच्चों की सामान्य गतिविधियों को पूरी तरह से बदल दिया है। उनके स्कूल बंद है, उनकी शिक्षा ऑनलाइन हो गई है और उनके साथियों या मित्रों के साथ उनकी बातचीत बहुत सीमित हो गई है। इन सभी कारकों से बच्चों की मानसिक स्थिति प्रभावित हुई हैं। बच्चे भावनात्मक माहौल से वंचित हो गए हैं, जो उनके सामान्य वृद्धि और विकास के लिए महत्वपूर्ण है। बच्चों की मन: स्थिति को नहीं समझ पाने के कारण कई माता-पिता को अपने बच्चों की शैक्षणिक जरूरतों की देखभाल करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी से निपटने में कठिनाई हो रही है। हर आयु वर्ग के बच्चों की अलग-अलग जरूरतें होती हैं। उन्हें समय, ध्यान, जुड़ाव, संसाधनों और अच्छे माहौल की जरूरत होती है। घर का तनावपूर्ण वातावरण मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के लिए घातक हो सकता है, लेकिन एक सुरक्षित माहौल उन्हें मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य की चिंताओं से बचा सकता है। यदि हम चाहते है कि हमारे देश में चीन जैसे कानून न लाना पड़े तो हर माता-पिता के लिए बच्चों को व्यस्त करने में समर्थ होना होगा। उन्हें स्वयं सकारात्मक सोच रखने की जरूरत होगी। माता-पिता को खुद को शांत रखने के तरीके खोजते हुए उन्हें अपनी दैनिक गतिविधियों को सुव्यवस्थित करने की भी जरूरत हैं।

प्रसंगवश दो मशहूर शेर
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे।    
निदा फाजली

चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं,
बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत देख-भाल से।
आदिल मंसूरी