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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - मानव अधिकारों के हनन की घटनाओं को देखने का नजरिया

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  मानव अधिकारों के हनन की घटनाओं को देखने का नजरिया

-सुभाष मिश्र

हमारे यहां कहावत है कि समरथ को नहिं दोष गुसाई। कहने का आशय जो व्यक्ति सबल और समर्थ है उसके विरूद्ध कोई दोष नहीं लगता। मानव अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में भी यही देखने, सुनने मिलता है। जो देश, जो व्यवस्था, जो शासक या जो समाज, व्यक्ति ताकतवर है, वह किन्ही-किन्ही बातों, कारणों से कमजोरों को दबाता है। एक देश के रूप में सभी ने लंबे समय तक अमेरिका की दादागिरी देखी है। अभी तालिबान में बंदूक की नोक पर सरेआम महिलाओं के मानव अधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही है और वे सब देश चुप है, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में 10 दिसंबर 1948 को मानव अधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय मसौद पर हस्ताक्षर किये थे। अक्सर समाज का कमजोर व्यक्ति जिसमें महिलाएं, अनुसूचित जाति/जनजाति के लोग, बच्चे, अल्पसंख्यक समुदाय के लोग, थर्ड जेंडर और सरकारी संस्थानों में कार्यरत मातहत कर्मचारी, पुलिस अभिरक्षा में निरूद्ध लोगों के मानव अधिकारों का बहुत ज्यादा हनन होता है। बहुत से संपन्न और सामंती सोच के लोगों के लिए तो गरीब, कमजोर और दलित व्यक्ति मनुष्य ही नहीं है। देश-दुनिया में व्याप्त असमानता, अत्याचार और शोषण को रोककर मनुष्य को उसकी गरिमा के साथ जीने देने की पहल और कोशिश मानव अधिकारों का संरक्षण है।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी हाल ही में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के 28वें स्थापना दिवस पर मानव अधिकारों के हनन की घटनाओं को अलग-अलग राजनैतिक नजरिए से देखने की प्रवृत्ति पर सवाल खड़ा किया।

हमारा संविधान जो हमें मौलिक अधिकार देता है, उन्हीं अधिकारों में हमारे मानव अधिकार की बात भी निहित है। इस समय देश में बहुत सारे लोग संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना करके अपने अनुसार कानून-कायदे लागू करना चाहते हैं।

मानवाधिकारों का तात्पर्य ऐसे न्यूनतम अधिकारों से है, जो प्रत्येक व्यक्ति में लिंग-भेद, वर्ण-भेद, भाषा-भेद और धर्म-भेद होते हुए भी मानव परिवार का सदस्य होने के नाते होते हैं। जो व्यक्ति के जीवन, समानता, स्वतंत्रता व प्रतिष्ठा से जुड़े हुए है तथा संविधान में जिनकी रक्षा का गारंटी दी गई है और भारत के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है तथा जो अंतरराष्ट्रीय समझौते के रूप में संयुक्तराष्ट्र की महासभा में स्वीकार किए गए हैं। इन अधिकारों में प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के वातावरण में जीने का एवं समानता व स्वतंत्रता संबंधी अधिकारों के अतिरिक्त गरिमामय जीवन व्यतीत करने का अधिकार, चिकित्सा सुविधा का अधिकार, अभिरक्षा में यातनापूर्ण या अपमानजक व्यवहार न होने संबंधी अधिकार एवं प्रत्येक बच्चे का 14 वर्ष की आयु तक शिक्षा प्राप्ति का और मानव परिवार का एक सदस्य बनाने के लिए अपना समुचित विकास करने हेतु उपर्युक्त अवसर पाने का अधिकार आदि शामिल है।

कहने को देश में महिला आयोग, अल्प संख्यक आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग जैसे ना जाने कितने मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए आयोग बने हुए हैं। अधिकांश आयोग सेवानिवृत लोगो की पुनर्नियुक्ति और कुछ लोगो को उपकृत करने और समय समय पर मीडिया में आने वाली खबरों को संज्ञान लेकर नोटिस देने और प्रचार-प्रसार करने के काम में लगे हैं। सरकार के लिए ये आयोग सेफ्टी वाल की तरह काम करते हैं।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ लोगों को एक ही प्रकार की घटना में मानवाधिकारों का उल्लंघन दिखाई देता है और वही लोग ऐसी किसी अन्य घटना में मानवाधिकारों के उल्लंघन को नहीं देखते हैं। कुछ लोग मानवाधिकारों के नाम पर देश की छवि खराब करने की कोशिश करते हैं, हमें इसके बारे में सतर्क रहने की जरूरत है। पीएमने कहा, मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होता है जब उन्हें राजनीतिक रंग से देखा जाता है, राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, राजनीतिक लाभ और हानि के तराजू से तौला जाता है। इस तरह का चयनात्मक व्यवहार लोकतंत्र के लिए समान रूप से हानिकारक है। हाल के वर्षों में कुछ लोगों ने अपने हितों को देखते हुए मानवाधिकारों की अपने-अपने तरीके से व्याख्या करना शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा का कहना है कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग हमारे राष्ट्र में मानवाधिकारों और हाशिए के लोगों की गरिमा की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हमारे देश में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के तहत 12 अक्टूबर 1993 को मानवाधिकारों के प्रचार और संरक्षण के लिए आयोग की स्थापना की गई। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग यानी एनएचआरसी ने 20 लाख मामलों का निपटारा किया और उन लोगों को 205 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया, जिनके मानवाधिकारों का उल्लंघन किया गया था। 20वीं सदी में दुनिया भर में करीब 12 करोड़ लोग राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए हैं।

13 फरवरी 2020 को रायपुर में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एचएल दत्तू ने कहा था कि छत्तीसगढ़ से प्राप्त मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें अधिक नहीं है- वे न्यूनतम है। राष्ट्रीय अध्यक्ष और कोंटा से पूर्व विधायक मनीष कुंजाम सलवा-जुडूम मामले से सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता रहे हैं। उन्होंने कहा कि एनएचआरसी जैसी संस्थाएं आज स्वतंत्र नहीं है। पहले यह स्वतंत्र थी और मामलों को उठाती थी। जब से मोदी केंद्र में सत्ता में आए हैं, ये सभी संस्थान भाजपा की शाखाओं के रूप में काम कर रही हैं। वे वास्तव में आदिवासियों को मिटाना चाहते है और इस प्रकार एनएचआरसी का प्रयास केवल कालम भरने का है। एनएचआरसी ने इस सुनवाई को लोक सेवकों के खिलाफ अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की केवल ताजा शिकायतों तक सीमित कर दिया है। संघर्ष क्षेत्रों के मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। यह सीधे तौर पर यह धारणा देता है कि वे आदिवासियों के मानवाधिकारों के सवालों में शायद ही रूचि रखते हैं, जो आज सबसे ज्यादा पीडि़त है।

हमारे देश में जगह-जगह अलग-अलग तरीके से मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाएं देखने को मिलती है। चूंकि मानव अधिकार आयोग किसी प्रकार की सजा नहीं दे सकता केवल अनुशंसा कर सकता है, इस कारण इसकी भूमिका वैसी प्रभावी नहीं है जैसी की होनी चाहिए। इस समय देश में बहुत सी केंद्रीय एजेंसियां, आयोग सभी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। हमारे देश में जो लोग गायो के व्यापार में जुड़े हैं या लोगों को संदेह है कि वे गाय का उपयोग मांस के लिए करते हैं, ऐसे लोगों में से मई 2015 से अब तक इस तरह के हमलों में 50 लोग मारे जा चुके हैं और 250 से अधिक लोग घायल हुए हैं।

शांतिपूर्ण असंतोष को दबाने के लिए अधिकारियों ने राजद्रोह और आपराधिक मानहानि कानूनों का इस्तेमाल किया। बिहार राज्य की पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र लिखने के लिए प्रसिद्ध फिल्म हस्तियों सहित 49 लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया, जिसमें अल्पसंख्यक समुदायों को लक्षित करने वाले घृणा-अपराधों और भीड़ की हिंसा पर चिंता व्यक्त की गई थी। व्यापक निंदा के बाद अधिकारियों ने कुछ ही दिनों में मामले को बंद कर दिया। ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें खुले दौर पर मान पत्रकारों को उनकी रिर्पोटिंग या सोशल मीडिया पर आलोचनात्मक टिप्पणियों के लिए परेशान किया गया, तथा हिरासत में भी लिया गया। सितंबर में उत्तरप्रदेश में पुलिस ने सरकारी स्कूलों में सरकार की मुफ्त भोजन योजना के कुप्रबंधन को उजागर करने के लिए एक पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया। राज्य के मुख्यमंत्री को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया।

ऐसे मामले अलग-अलग राज्यों में भले ही वहां किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न हो, आये दिन घटित होते है। चूंकि हमारे देश में सिविल सोसाइटी उस तरह से सक्रिय नहीं है जैसी की बाकी देशों में। जो संस्थाएं एनजीओ के नाम पर कार्य कर रही है उनमें से बहुतों की गतिविधियां, कार्यप्रणाली और एक खास नजरिये से देखे जाने के आरोप लगते हैं। आम जनता से जुड़े अधिकारों और संविधान में प्रदत्त अधिकारों के संरक्षण को लेकर हमारे देश में कोई बड़ा आंदोलन, जागरूकता दिखाई नहीं देती है। किसान अपनी फसलों के मामले को लेकर आंदोलनरत है तो कहीं कोई अपनी अन्य दूसरी मांगों को लेकर। नागरिक अधिकारों को लेकर जिस तरह की बहस, जागरूकता होनी चाहिए वह नागरिक समाज से नदारत है। यहां कहीं भी जिसके पास ताकत है, वह दूसरे के मानव अधिकारों का हनन कर रहा है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गीतांजलि में लिखा है

जहां मन भयमुक्त है, और मस्तक ऊंचा है गर्व से,
जहां ज्ञान मुक्त है,
जहां दुनिया छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं बंट गई है,
दुनियादारी की संकीर्ण दीवारों से,
जहां शब्द उभरकर आते हैं, सच्चाई की गहराई से,
जहां अथक परिश्रम फैलाता है अपनी बाँहें, परिपूर्णता की ओर,
जहां तर्क की निर्मल धारा, ने नहीं खो दिया है अपना रास्ता
मृत आदतों के सुनसान रेगिस्तान में,
जहां मस्तिष्क को सदा आप मार्ग दिखाते हो मेरे प्रभु,
निरंतर विस्तारित होते, चिंतन और क्रियाशीलता में,
स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में, मेरे प्रभु, मेरे राष्ट्र को जागृत होने दो।।