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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- बैठे ठाले बात का बतंगड़ बनाने का समय

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- बैठे ठाले बात का बतंगड़ बनाने का समय

-सुभाष मिश्र

देश की जनता के सामने भले ही महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, जातपात, छुआछूत, साम्प्रदायिकता, आपसी असमानता, साफ पानी, बेहतर स्वास्थ्य, प्रदूषण जैसी समस्याएं मुंह बाये खड़ी हो किन्तु मीडिया और नेताओं का एक बड़ा वर्ग इस समय छोटी से छोटी बात को लेकर राई का पहाड़ बनाने या रस्सी को सांप बताने पर आमादा है। किसी के पास गंभीर समस्याओं के लिए मैदानी लड़ाई लडऩे का समय नहीं है, वे सारी जंग सोशल मीडिया के जरिए ट्विट करके, भाषणबाजी करके या कोई किताब लिखकर पूरी कर लेना चाहते हैं। ऐसी विवादित टिप्पणी करने वाले, किताब लिखने वाले या फिल्मी दुनिया के कलाकार जो न तो कोई लेखक हैं, ना ही इतिहासकार, ना ही समाजसेवी। किन्तु उसकी कही बातें लोगों के बीच ऐसे फैलाई जाती है आंदोलन खड़ा किया जाता है मानो यही देश की सबसे बड़ी समस्या है। इस समय हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों से जुड़े कुछ चालाक लोग जो मीडिया का इस्तेमाल करना जानते हैं, वे जनता से जुड़े मुद्दों को दरकिनार करके, किसने अपने ट्विट पर ऐसा क्या ट्विट किया, किस सभा पर किसने क्या कहा, इतिहास के पन्नों से ऐेसा क्या निकाला जा सकता हो जिससे विवाद हो या फिर कोई किताब में कही गई बात को समूचे प्रयोग से परे हटकर उन बातों को प्रचारित प्रसारित करने में लगे रहते हैं, जो सनसनी फैलाए, जो टीवी चैनलों के लिए किसी दंगल का विषय बने। सारे लोग सोशल मीडिया, टीवी चैनलों के जरिए इस बात में रुचि रखते हैं किसी भी छोटी-छोटी बात को करने बड़ा बनाया जाए। 243७ के टीवी चैनलों के पास खुद की टीम द्वारा तैयार की गई ओरिजनल खबर नहीं होने से वे स्टूडियो में बैठकर गड़े मुर्दे उखाडऩे या बात-बेबात कोई न कोई मुद्दा लेकर खबरें गढ़ते हैं। जिनकी ज्यादा अहमियत नहीं है। मीडिया के इसी चरित्र को पहचानकर बहुत से लोग आये दिन ऊल-जुलूल बयानबाजी करके खबरों में बने रहते हैं। फिल्म अभिनेत्री कंगना रानावत से लेकर राखी सावंत इसके सबसे जीवंत उदाहरण हैं। अभी कुछ दिनों पहले जिन्ना को लेकर विवाद हुआ तो अब मनीष तिवारी की किताब को लेकर सवाल यह है कि क्यों इतिहास पर लिखी किताबें बन जाती हैं बुक बम ?  

मंगलवार को मीडिया में लगातार मनीष तिवारी की किताब 10 फ्लैश प्वाइंट, 20 ईयर्स को लेकर खबरें आती रहीं। इस पर तरह तरह के बयान छाये रहे। कुछ दिन पहले इसी तरह एक और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद की किताब को लेकर स्थिति थी। इसको लेकर तो अच्छा खासा बवाल भी मच गया था। हाल ही में कॉमेडियन वीरदास नवजोत सिंह सिद्धू अखिलेश यादव की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर मीडिया में स्पेस दिया गया। इन किताबों का विषय वस्तु और इसके बाजार में आने की जो टाइमिंग है उस पर भी काफी चर्चा की जा सकती है पिछले दिनों हमने पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान देखा था जब बड़े-बड़े नेताओं के बयानों का स्तर बहुत निचले स्तर पर गोता लगाने लगे थे और मीडिया भी इन्हीं नेताओं का

पिछलग्गू बनकर जनता के मुद्दों से भटकता नजर आया। चुनाव के दौरान धार्मिक विभाजन, एक दूसरे की पार्टियों में तोडफ़ोड़ जैसी खबरें ही सुर्खियां बनाती रही अब कुछ इसी तरह का हाल अगले साल होने वाले 5 राज्यों के चुनाव के पहले बनते जा रहा है। अभी से ज्यादातर मुद्दे व्यक्तिगत टिप्पणी पर केन्द्रित होते जा रहे हैं। फिर खुर्शीद की किताब हो या फिर कंगना का इतिहास ज्ञान हो या मनीष तिवारी की किताब को मिल रही तरजीह ऐसा लग रहा है कि मीडिया इन दिनों किसी खास एजेंडे पर काम कर रहा है।

चुनावी मौसम में कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने जिस तरह अपनी ही पार्टी के खिलाफ अपनी किताब में लिखा है। खासतौर पर डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को देश की सुरक्षा के संबंध में आड़े हाथों लिया गया है। जबकि इस सरकार के वक्त खुद मनीष तिवारी कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता थे। इस तरह निजी बयानों को महत्व देने की मीडिया की मजबूरी का फायदा तब उठाया जाता है जब किसी बड़े मु्ददे से आम जनता का ध्यान भटकाना हो और कितनी आसानी से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इन राजनेताओं का हित साधने का माध्यम बन जाता है।

मनीष तिवारी ने अपनी किताब में किसी देश (पाकिस्तान) को अगर निर्दोष लोगों को कत्लेआम करने में कोई अफसोस नहीं है तो ऐसे में संयम ताकत की पहचान नहीं, बल्कि कमजोरी की निशानी है। 26/11 एक ऐसा मौका था जब शब्दों से ज्यादा जवाबी कार्रवाई दिखनी चाहिए थी। इसी तरह सलमान खुर्शीद ने आरएसएस और हिंदुत्व की तुलना आईएस और बोको हराम से की है। कॉमेडियन वीर दास अपने बयानों की वजह से काफी सुर्खियों में रहते हैं लेकिन हाल ही में उनके भारत को लेकर दिए बयान की वजह से वह काफी ट्रोल हो रहे हैं। हाल ही में सिद्धू द्वारा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को भाई बताकर विवाद खड़ा किया था। कंगना रनावत ने देश की आजादी के संबंध में बड़बोला बयान दिया था, जो कि लगातार सुर्खियों में रहा था। मणिशंकर अय्यर ने देश की आजादी को लेकर विवादित बयान दे दिया है। मणिशंकर अय्यर ने एक सेमिनार में कह दिया कि साल 2014 के बाद से हम अमेरिका के गुलाम हैं।
जाने-माने शायर राहत इंदौरी की शायरी है-
सरहदों पर बहुत तनाव है क्या
जरा पता तो करो चुनाव है क्या।  


राहत इंदौरी यहां पर बताना चाह रहे हैं कि चुनाव के वक्त अक्सर ध्यान बांटने के लिए सरहद पर तनाव की स्थिति निर्मित कर दी जाती है जबकि हमारा मानना है कि देश की सेना, देश की सुरक्षा जैसे मुद्दों का राजनीतिकरण करने से बचना चाहिए। खासतौर पर सेना का नाम चुनावी लाभ के लिए नहीं ही लेना चाहिए लेकिन 2019 के आम चुनाव में जिस तरह सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा हुई उसे सबने देखा। ऐसे में हमें मुद्दा भटकाने वाले हथकंडों से सावधान रहना होगा।