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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जरा फासलों से मिला करों

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जरा फासलों से मिला करों

नजदीकियां अच्छी है पर भी फासला जरुरी हैं। हम फिर से ऐसे हालात न निर्मित होने दें की कहना पड़ जाये, "कोई  हाथ भी न मिलायेगा , जो गले मिलोगे तपाक से ये नये मिजाज का शहर हैं", "जरा फासले से मिला करो"। ये अच्छी बात है कि हमारे भूलने की खास करके दुख और तकलीफ के क्षणों को भूलने की आदत बहुत अच्छी हैं। हम मृतक की तेरहवीं करके चालीसवाँ करके अपने-अपने अपने दुख को भूलकर दुख को भी उत्सव में बदल देते हैं। हमारे भूलने की इस प्रवृत्ति का सबसे ज्यादा लाभ राजनीतिक दल, नेता उठाते हैं। वे घोषणा पत्र में चुनाव के समय किये गये वादे भूल जाते हैं और हम फिर किसी नए वादे के झांसे में आकर पुरानी पीढ़ी झांसेबाजी, जुमलेबाजी को भूलकर फिर उन्हें ही चुन लेते हैं, जो ठगवा हैं। संत कबीर यूँ ही नहीं कहते की  "कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो" । अभी देश से कोरोना की दूसरी लहर गई नहीं, तीसरी की आशंका से देश भयाक्रांत था, इसी बीच एक नया ओमीक्रॉन वैरिएंट आ गया। हम पहले खुश हो रहे थे की यह दक्षिण अफ्रीका और कुछ देशों तक सीमित है। लेकिन अब यह कर्नाटक,जामनगर व मुंबई पहुंचकर यह देश को डरा रहा हैं। विशेषज्ञों की माने तो यह तेजी से फैलता है। अभी इसके चरित्र को लेकर भ्रम की स्थिति हैं, जैसी की हमारे देश के बहुत सारे नेताओं के। हम कोरोना की दूसरी लहर की त्रासदी को भूलकर बेखौफ होकर यहाँ वहाँ उत्सव मनाते, पिकनिक मनाते, शादी ब्याह में घूम रहे हैं। ट्रेन, प्लेन, सड़क सब जगह भीड़ हैं। लोग दो साल का बैकलॉग एक ही झटके में खत्म करके पूरी दुनिया घूम लेना चाहते है। ये वो लोग हैं जिनकी जेबें भरी हुई हैं, जिन्होंने कोरोना काल में भी घर रहकर पिकनिक मनाई। दूसरी तरफ देश की वो बड़ी आबादी है जिसके सामने खाने-कमाने का संकट था।

हमारे देश में चल रहे टीकाकरण अभियान को लेकर सभी स्तर पर जो सतर्कता, संवेदनशीलता और उपलब्धता होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई। केन्द्र-राज्य सरकारों के एक-दूसरे पर दोषारोपण और श्रेय लेने की होड़ के चलते देश की केवल 46.38 करोड़ आबादी को ही टीके के दो डोज लग पाये हैं।33 करोड़ लोगों को केवल एक डोज लगा हैं। अभी देश के 15 करोड़ लोग ऐसे है , जिन्हें टीके का एक भी डोज नहीं लगा हैं। जिस आबादी को दो डोज लग चुके है, उन्हें अब बुस्टर डोज की जरूरत हैं। इस बीच देश में 100 करोड़ लोगों को टीकाकरण का उत्सव उसी तरह मनाया जा चुका है जैसा जीएसटी का।देश के प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश के 94 करोड़ व्यस्क आबादी को दिसम्बर तक टीके लग जायेंगे। जब हम टीकाकरण की बात करते हैं, तो इसका मतलब होता हैं टीको की दोनों डोज का लगना।

एक तरफ टीकों को लेकर राजनीति और दुसरी तरफ लापरवाही, इन दोनो के चलते देश में एक बार फिर लॉकडाउन की आशंका जोर मारने लगी हैं। कोरोना संक्रमण के चलते पिछले दो सालों में सभी क्षेत्रों में जितना नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई मुश्किल हैं। अब जबकि कोरोना का नया अवतार कोरोना ओमिक्र ॉन वैरिएंट दुनिया के 33 देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका हैं। तब हमें टीकाकरण की धीमी रफ्तार सताने लगी हैं। देश में प्रतिदिन 80 लाख लोगों को कोरोना टीके की डोज लगाई जा रही हैं। टीकाकरण की यदि यही रफ्तार रही तो अभी भी 78 दिन लग जायेंगें, सभी को टीका लगवाने में। ऐसे में यदि खुदा न खास्ता ओमिक्रॉन वैरिएंट का विस्तार होता हैं, तो यह देश के लिए फिर से तालाबंदी का सबब न बन जाये। वैसे देश के शीर्ष वैज्ञानिकों ने यह अनुशंसा की है कि ओमिक्रॉन से बचने के लिए 40 वर्ष से और उससे अधिक की आयु के लोगों को बुस्टर डोज लगाये जाये।

विशेषज्ञों का मानना है कि ओमिक्रॉन वेरिएंट कोविड-19 मामलों में कहीं और विस्फोटक वृद्धि कर सकता है। 1 दिसंबर को, दक्षिण अफ्रीका ने 8,561 मामले दर्ज किए, जो 26 नवंबर को दर्ज किए गए 3,402 तुलना में अधिक थे। ओमिक्रॉन में बहुत तेजी से फैलने और डेल्टा की तुलना में बहुत अधिक लोगों को संक्रमित करने की क्षमता रखता है, ओमिक्रॉन एक ही समय अवधि में डेल्टा के रूप में तीन से छह गुना अधिक लोगों को संक्रमित कर सकता है।

वैरिएंट एंटीबॉडी को निष्क्रिय करने की शक्ति को कुंद कर देगा। प्रारंभिक रिपोर्टों ने ओमिक्रॉन को हल्के रोग से जोड़ा, जिससे यह आशा जगी कि यह संस्करण अपने कुछ पूर्ववर्तियों की तुलना में कम गंभीर हो सकता है। च्च्लेकिन इस समय यह बहुत मुश्किल है।ज्ज् इस बीच एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया का कहना है कि शायद अब देश में कोरोना की तीसरी लहर नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह से वैक्सीन के प्रभाव के चलते संक्रमण की रफ्तार थमी और अस्पतालों पर दबाव कम हुआ है, उससे हर दिन तीसरी लहर आने का डर खत्म हो रहा है।

हमारे देश में कोरोना की दोनों लहर के बीच जो प्रभाव पड़ा है, उसके बारे में किये गए सर्वे के अनुसार 40 से 60 आयु वर्ग में दूसरी लहर में 12.1फीसदी लोगों की जान गई जबकि पहली लहर में यह आंकड़ा 9.2फीसदी था। 60 वर्ष से ज्यादा की उम्र वालों में 198 लोग दूसरी लहर में शिकार हुए यानी लगभग 22फीसदी जबकि पहली लहर में 568 लोग शिकार हुए यानी17फीसदी। पहली लहर के लिए सितंबर 2020 से फरवरी 2021 तक के वक्त को चुना गया था, जबकि दूसरी लहर में फरवरी 2021 से मई 2021 तक का वक्त चुना गया। कोविड-19 पिछले साल मार्च से लेकर मार्च 2021 के बीच काफी बदलाव के साथ दिखाई दिया। पहली लहर में रोज होने वाले संक्रमण की संख्या दूसरी लहर से कम थी। लेकिन रोज मरने वालों की संख्या दूसरी लहर में मरने वालों से काफी ज्यादा थी।

भारत ने अपना टीकाकरण कार्यक्रम 16 जनवरी 2021 को शुरू किया, शुरुआत में 3,006 टीकाकरण केंद्रों का संचालन किया। पहले चरण में स्वास्थ्य कार्यकर्ता और पुलिस, अर्धसैनिक बलों, स्वच्छता कार्यकर्ताओं और आपदा प्रबंधन स्वयंसेवकों सहित अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता शामिल थे।

दूसरे चरण में 60 वर्ष से अधिक आयु के सभी निवासियों, 45 और 60 वर्ष की आयु के बीच के निवासियों को एक या अधिक योग्य सहरुग्णता के साथ, और किसी भी स्वास्थ्य देखभाल या फ्रंटलाइन कार्यकर्ता को शामिल किया गया, जिसे चरण 1 के दौरान खुराक नहीं मिली थी। ऑनलाइन पंजीकरण 1 मार्च को आरोग्य सेतु ऐप और को-विन ("कोविड-19 पर जीत") वेबसाइट के माध्यम से शुरू हुआ।

1 अप्रैल से, 45 वर्ष से अधिक आयु के सभी निवासियों के लिए पात्रता बढ़ा दी गई थी। 8 अप्रैल को, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 से 14 अप्रैल तक चार दिवसीय टीका उत्सव ("वैक्सीन फेस्टिवल") का आह्वान किया, जिसका लक्ष्य अधिक से अधिक योग्य निवासियों को टीकाकरण करके कार्यक्रम की गति को बढ़ाना था। 26 अगस्त 2021 तक, भारत में 50फीसदी वयस्क आबादी को स्वीकृत टीकों की कम से कम एक खुराक के साथ टीका लगाया गया था, जिसमें स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बीच 99फीसदी कवरेज और पहली खुराक के लिए 100फीसदी फ्रंट-लाइन कार्यकर्ता शामिल थे। 27 अगस्त 2021 को, भारत ने एक ही दिन में कोविड-19 वैक्सीन की 10 मिलियन (1 करोड़) से अधिक खुराक देने का मील का पत्थर पार कर एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। उत्तर प्रदेश 2.8 मिलियन खुराक के साथ सूची में सबसे ऊपर है, उसके बाद कर्नाटक 1 मिलियन खुराक के साथ और महाराष्ट्र 0.98 मिलियन खुराक के साथ तीसरे स्थान पर है।

यह देखा गया कि दूसरी लहर में चपेट में आने वाले लोगों की औसत उम्र पहली लहर के मुकाबले काफी कम थी। दूसरी लहर में 48.7 उम्र के लोग चपेट में हैं जबकि पहली लहर में यह आयु लगभग 51 वर्ष थी। हालांकि दोनों ही लहर में 70फीसदी मरीज 40 वर्ष की उम्र से ज्यादा के थे। दूसरी लहर में पुरुषों की संख्या पहली लहर के मुकाबले थोड़ी सी कम रही। दूसरी लहर में 63.7फीसदी पुरुष चपेट में आए जबकि पहली लहर में 65.4फीसदी पुरुष कोरोना वायरस की चपेट में आए थे।

दूसरी लहर में 49फीसदी मरीजों ने सांस की तकलीफ की शिकायत की, जबकि पहली लहर में 43फीसदी मरीजों ने यह शिकायत की थी। दूसरी लहर में 13फीसदी यानी 1422 मरीजों को एआरडीएस यानि एक्यूट रेस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम हुआ जबकि पहली लहर में यह संख्या 880 मरीजों की यानी तकरीबन 8फीसदी रही। दूसरी लहर में ऑक्सीजन की खपत काफी तेजी से बढ़ी। 50फीसदी मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी, जबकि पहली लहर में 42.7फीसदी मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी थी। वेंटिलेटर के मामले में भी ऐसा ही रहा। 16फीसदी मरीजों को दूसरी लहर में वेंटिलेटर पर जाने की जरूरत पड़ी, जबकि पहली लहर में 11फीसदी मरीजों को इसकी जरूरत पड़ी थी।