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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कबीरधाम में कबीर का अपमान

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कबीरधाम में कबीर का अपमान

-सुभाष मिश्र

कवर्धा जिसका नाम अब कबीरधाम है, जहां अभी कबीर आये थे और उनके शिष्य धर्मदास के पूर्वजों ने दामाखेड़ा में कबीर पीठ स्थापित किया, उस कवर्धा में सांप्रदायिक दंगों के कारण कफ्र्यू की स्थिति निर्मित होना कवर्धा के माथे पर कलंक की तरह है। जब रामजन्म भूमि आंदोलन, बाबरी मस्जिद ध्वंस और देश भर में अलग-अलग अवसरों पर उभरे तनाव के क्षणों में भी छत्तीसगढ़ शांत रहा। गुरुघासीदास, संत कबीर, महाप्रभु वल्लभाचार्य से लेकर हबीब तनवीर, गजानन माधव मुक्तिबोध, श्रीकांत शर्मा, गुलशेर अहमद शानी, माधवराव सप्रे जैसे लोगों की यह धरती हमेशा से आपसी भाईचारे और शांति सद्भाव का संदेश देती रही है। यहां के तीज-त्यौहार, मितान बनाने की परंपरा यहां रहने वाले छत्तीसगढिय़ा लोग सीधे-साधे जाति धर्म से ऊपर मनुष्यता में विश्वास करने वाले हैं। वन संपदा से आच्छादित छत्तीसगढ़ की जनजाति तो अपने देवता के रूप में वनस्पतियां पेड़-पौधे, प्रकृति को पूजती है। ऐसे छत्तीसगढ़ में झंडा फहराने के नाम पर दंगे की स्थिति निर्मित होना वाकई शर्मिंदगी का सबब है।

कवर्धा के नजदीक का भोरमदेव मंदिर खजुराहो की ही तरह अपने विशिष्ट मूर्ति शिल्प के लिए जाना जाता है। 9वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तक यह नागवंशी राजाओं की राजधानी रहा। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कवर्धा के निवासी हैं। गन्ना उत्पादन के कारण यहां शक्कर कारखाना स्थापित किया गया। जिस कबीर साहेब और उनके अनुनायियों ने धर्म और जातियों के पाखंड पर लगातार प्रहार करके सभी को जाति-धर्म से ऊपर उठकर मनुष्यता का पाठ पढ़ाया। वहां का पढ़ा-लिखा तबका एक झंडे को लगाने के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम में विभक्त होकर आपस में लड़ रहा है। आज हर आदमी के जेब में रखा मोबाईल सोशल मीडिया पर डाली जा रही गैरजिम्मेदराना तरीके से पोस्ट की वजह से दंगों को जन्म देने वाली, नफरत की जमीन बन गये हैं। यही वजह है कि प्रशासन को सबसे पहले मोबाईल नेटवर्क बंद करना पड़ता है ताकि फैलाई जा रही नफरत को रोका जा सके। जब भी कोई एक धरना इस तरह का होता है, मोबाईल से जहरीले तीर चलने लगते हैं। सांप्रदायिकता फैलाने वाली फैक्ट्रियों कुछ ज्यादा सक्रिय होकर दंगाईयों को एक्टीवेट कर देती है। ऐसा प्रचारित किया जाता है मानो सारे मुसलमान, ईसाई, सिख साम्प्रदायिक हैं समाज का हर हिस्सा ही साम्प्रदायिक सोच का है। संकीर्णता किसी भी धर्म, समाज की हो कभी भी अच्छी नहीं होती। हमारे देश का मूल गुण उदारता, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता है। कुछ राजनीति दल कुछ संगठन धर्म का उपयोग आमजनों को बहकाने के लिए करते हैं। धर्म हमेशा से शोषक वर्ग के हाथ में बहुत ही धारदार हथियार के रूप में रहा है। धर्म पर आधारित सत्ता में कभी भी लोकतंत्र नहीं हो सकता। धर्म की राजनीति सच्चे लोकतंत्र को नष्ट करती है। जो लोग धर्म के नाम पर एक दूसरे पर हमला कर रहे हैं, संपत्तियां नष्ट कर रहे हैं, शायद उन्हें गोस्वामी तुलसीदास की यह बात मालूम नहीं होगी-

परहित सरिस धर्म नहिं भाई
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

कवर्धा यानी कबीरधाम के लोहारा नाका चौक इलाके में झंडा लगाने को लेकर विवाद हुआ जिसमें दो गुटों के युवक आपस में भिड़ गये और 8 लोग घायल हुए। इस घटना के दो दिन बाद विश्व हिन्दू परिषद ने बंद का आव्हान कर जुलूस निकाला और उसके बाद शरारती तत्वों ने तोडफ़ोड़ की और जिला प्रशासन को कफ्र्यू लगाना पड़ा। जुलूस के दौरान हुई हिंसक घटनाएं समाज के भीतर अंदर सुलगती चिंगारी का एक तरह से प्रगटीकरण है। हिंसक भीड़ किसी जाति, धर्म में विश्वास नहीं करती, उसका उद्देश्य लूटमार होता है। हिंसा के प्रति बढ़ता आकर्षण और एक दूसरे समाज के प्रति बढ़ती वैमनस्यता के चलते युवा वर्ग इस तरह के कृत्य में बढ़चढ़कर हिस्सा लेता है। अंग्रेजों द्वारा बोई गई साम्प्रदायिकता की जडं़े हमारे देश में दिन-प्रतिदिन गहरी होती जा रही है। हमारी राजनीतिक पार्टियां और कुछ स्वार्थी तत्व उसे खाद पानी देने का काम करते नजर आते हैं।

अभी हाल ही में मध्यप्रदेश के इंदौर में एक चुड़ीवाले लड़के की पिटाई का मामला हो या फिर नीमच में एक युवक को वाहन से बांधकर घसीटने की घटना हो। देश के अलग-अलग हिस्सों से आ रही भीड़ हिंसा की खबरों ने फिर एक बार हमें नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। भारतीय संविधा की प्रस्तावना में हम शब्द इस राष्ट्र में निवास करने वाले सभी नागरिकों के लिए प्रयोग किया गया है, पर जब हिंसा की ऐसी घटनाएं होती है, तो हम पर प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं।
हमारे देश में भीड़ यानी माब लिंचिंग की प्रवृत्ति हर काल में देखी गई है। भीड़ ने सबसे पहले डायन बताकर महिलाओं को अपना शिकार बनाया, फिर यह प्रवृत्ति बदली और गोहत्या की अफवाहों पर भीड़ गोरक्षक बनकर सामने आ खड़ी हुई। ऐसे लोगों को भूखी मरती सड़क पर आवारा घूमती गायों की चिंता नहीं है। इन्हें गाय दूध के लिए नहीं दंगे के लिए चाहिए। इंडिया स्पेंड वेबसाइट के अनुसार वर्ष 2010 से 2017 के बीच दर्ज 63 मामलों में से 97 फीसदी मामले पिछले तीन वर्षों के दौरान दर्ज हुए हैं। रिपोर्ट की मानेंं तो वर्ष 2012 से अब तक सामुदायिक घृणा से प्रेरित ऐसी एक सौ अट्ठाईस घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें सैंतालीस लोगों की मृत्यु हुई और एक सौ पचहत्तर लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

कबीरधाम में हुई घटना के बाद छत्तीसगढ़ में एक अलग तरह की राजनीति शुरू हो गई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय कह रहे हैं कि कवर्धा दंगों के बारूदी ढेर पर खड़ा है। बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक आस्था के साथ कतिपय तत्व खिलवाड़ कर रहे हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कवर्धा की फिक्र छोड़ लखनऊ में हंै। इधर सरकार ने इस मामले में कड़ा रूख अख्तियार कर आगामी आदेश तक पूरे शहर में कफ्र्यू लगा दिया है। प्रशासन की ओर से कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति अपने घर से बाहर न निकलें। घर मे रहे सुरक्षित रहे। शहर में सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए कोई व्यक्ति किसी स्थान पर फंसा हुआ है या कहीं पर किसी प्रकार की दुर्घटना घट रही है उसकी जानकारी तत्काल पुलिस कंट्रोल रूम को दें।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने कवर्धा में देर रात करीब 12 बजे इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं। इसके बाद पड़ोसी जिलो बेमेतरा और राजनांदगांव में भी इंटरनेट बंद करा दिया गया है। पुलिस टीमें वीडियो और फोटो के आधार पर दंगाइयों की पहचान करने में जुटी है। अब तक 70 लोगों की पहचान की जा चुकी है। इसमें से 59 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। उपद्रव फैलाने, हिंसा भड़काने और तोडफ़ोड़ को लेकर तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई है। अफसरों का कहना है कि हिंसा सुनियोजित थी। इसके लिए अलग-अलग जिलों से लोगों को बुलाया गया था। पुलिस का कहना है कि जिले में धारा 144 लगे होने के बाद भी व्हीएचपी ने बंद और धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया। इसमें शामिल होने के लिए जिले के अलावा राजनांदगांव, बेमेतरा, मुंगेली, धमतरी और रायपुर से लोगों की भीड़ पहुंची थी। उन लोगों ने बंद के दौरान कवर्धा के चिन्हांकित वार्डों में उपद्रव मचाया और तोडफ़ोड़ की। उग्र प्रदर्शन के कारण शहर में शांति, साम्प्रदायिक सौहाद्र्र बिगड़ा है।

कबीरधाम के दंगों ने कबीर की परंपरा को तोड़ा है। कबीर जीवनभर जिन चीजों, सच्चाई से हिन्दू-मुस्लिम सभी को आगाह करते हैं, वह अभी भी हमारे समाज में व्याप्त है।
बकौल कबीर-
हिन्दू कहें मोहि राम पियारा,
तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए
मरम न कोउ जाना।।