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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- देश और आकर्षक हो रहा है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- देश और आकर्षक हो रहा है


सुभाष मिश्र 

अपने लेखन, अपनी साफगोई, अपनी वाकपटुता और महिलाओं के बीच अच्छी खासी फ्रेंडफॉलोइंग रखने के लिए कांग्रेस के सांसद शशि थरुर चर्चित हैँ। फिलहाल वे सोशल मीडिया पर महिला सांसदों के साथ अपनी सेल्फी के साथ लिखे गये कमेंट्स कौन कहता है कि लोकसभा काम करने के लिए आकर्षक जगह नहीं है '' के लिए ट्रोल हो रहे हैं। उन्होंने इसके लिए यह कहते हुए कि सेल्फी महिला सांसदों की पहल पर परिहास में ट्वीट की थी। माफी मांगता हूं कि कुछ लोग नाराज हो गए।  खैर उनके कहे के गहरे अभिप्राय में जाये तो यह बात सही है की हमारी दुनिया में जो भी खूबसूरती है, कलर है उसमें हमारी महिलाओं की बड़ी भूमिका हैं। जिस घर में लड़की होती है, वह घर तरह-तरह के रंग-बिरंगें कपड़ों, खिलौनो, गुड्डा-गुडिय़ा, रंगोली सहित बहुत से कलर से भरा होता हैं। खैर पितृ सत्तात्मक समाज वाले हमारे देश में महिलाओं को लेकर अच्छी खबर यह आयी कि पुरुषो की तुलना में महिलाओं की आबादी में पहली बार वृद्धि हुई है। अब हर 1000 पुरुषो पर 1020 महिलायें हैं। वही आजादी के बाद ये भी पहली बार रिकॉर्ड बना हैं। जब पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की आबादी 1000 से अधिक हो गयी हैं। इसके अलावा एक और अच्छी खबर यह भी हैँ कि जन्म के समय भी सेक्स अनुपात में सुधार हुआ हैं। 2015-16 में ये प्रति 1000 बच्चो पर 919 बच्चियों का था, जो 2019 से सुधर कर प्रति 1000 बच्चों  पर 929 बच्चियों का हो गया हैं।  

राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वेक्षण के आंकड़ों में गांव और शहर में सेक्स अनुपात की तुलना की गयी हैं। सर्वे के अनुसार सेक्स अनुपात शहरों की तुलना में गांवो में ज्यादा बेहतर हुआ हैं। गांवो में जहां हर 1000 पुरुषों पर 1037 महिलाएं हैं वही शहरों में 985 महिलायें हैं। इससे पहले हृस्न॥स्-4  (2019 -2020 ) में गांवो में प्रति 1000 पुरुषों पर 1009 महिलाएं थीं।  शहरों में ये आंकड़ा 956 का था।  

समाज में शिक्षा, स्वस्थ्य, आर्थिक स्वावलंबन और प्रगतिवादी सोच के चलते धीरे -धीरे लोगों की पुरातन पंथी सोच जिसमें लड़कों की तुलना में लड़कियों को कमतर समझाना शामिल हैं, में  तेजी से बदलाव आ रहा हैं। जिस तरह मनुष्य जाति के विकास क्रम में चक्कों और इंजिन के आने के बाद जो बदलाव आया था, उसे टेक्नोलॉजी के विस्तार ने पंख लगा दिया। आज इंटरनेट टेक्नोलॉजी के चलते दुनिया वाकई एक ग्लोबल विलेज की शक्ल लेती जा रही हैं। अधिकतर औरतों की आबादी और उनके भीतर हो रहे बदलाव की बात करे तो सबसे ज्यादा बदलाव बर्थ कंट्रोल के बाद आया हैं। जब से स्त्री के पास बर्थ कण्ट्रोल के तौर तरीके आये हैं, उससे उसकी जबरिया मातृत्व, गर्भवती होने वाली विवशता काम हुई हैं। अब एक स्वतंत्र स्त्री खुद तय करने लगी है कि उसे बच्चा कब चाहिए, कब नहीं। अब वो अपने खराब दिनो यानी मासिक धर्म को लेकर बहुत तनाव में नही है । औरतों की आजादी में दूसरा बड़ा बदलाव उसके आर्थिक स्वावलंबन के चलते आया हैं। जब से औरतें आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुई हैं, उसकी पुरुष पर आश्रित कम हुई हैं और वह अपनी मर्जी और मन अनुरूप भी बहुत कुछ करने का साहस करने लगी हैं। सुप्रसिद्ध व्यग्यंकार हरिशंकर परसाई कहते हैं कि औरतों की आजादी में यह वाक्य स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा की एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता।  

हिंदी की सुप्रसिद्द कवियित्री अनामिका अपने संग्रह "पानी जो पत्थर पीता है " में कैनेडियन कवियित्री मासी रेंडन की कविता को कोड करती है ।

ईशा मसीह , औरत नहीं थे, 

वरना मासिक धर्म 

बारह बरस की उमर से

उनको मंदिर के बाहर रखता , 

बेथलेहम और यरूशलम के बीच के

कठिन सफर में उनके 

हो जाते, कई तो बलात्कार 

और उनके दूध मुंहे बच्चे 

चालीस दिन और चालीस रातें 

भूख से बिल बिलाकर 

मरते हुए काटते जब- 

उनको तो फुर्सत मिलती ही नहीं  

सूली पर चढ़ जाने की थी।  

औरतों की आजादी का हर क्षेत्र में बढऩा वाकई बहुत बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। हमनें आधी आबादी को पंचायतों और नगरीय निकायों में तो आरक्षण दे दिया, किन्तु अभी भी उन्हें विधानसभा, लोकसभा में आबादी के अनुपात में न तो किसी तरह का आरक्षण मिला है ना ही उनकी इतनी ही संख्या है। यदि औरतों की संख्या देश के सभी सदनों में आधी हो जाये तो निश्चित ही वहां का वातावरण सुधर जायेगा और ये जगह वाकई आकर्षक हो जाएगी। यदि हम एक ऐसी दुनिया की कल्पना करें जिसमें औरते ना हो तो हमारे तमाम धार्मिक कट्टर, उग्रवादी नये लोगों को किस जन्नत और हुर्रो का सबाब दिखाएंगे।

सामान्यत: औरते अपनी छवि के प्रति बेहद सजग होती हैं। वे ऐसा कोई काम  जल्दबाजी में नहीं करती जिससे उनकी छवि धूमिल हो। गोदान उपन्यास में मुंशी प्रेमचंद प्रोफेसर मेहता नामक पात्र के जरिए यह कहलाते है कि यदि कोई पुरुष अपने में स्त्री के गुण समाहित कर लेता है तो वह कुलटा हो जाती है। स्त्री के गुण दया, ममता, त्याग, बलिदान, स्नेह, कोमलता आदि के हैं। यदि हमारे यहाँ के पुरुषों के भीतर औरतोँ जैसी दया, ममता, सहनशीलता के गुण आ जाए तो हमारे देश में बहुत बढ़ा परिवर्तन आ सकता है।  

दरअसल औरतों के भीतर आत्म रक्षा का भाव जन्मजात होता हैं। वे खतरों और बदनियति को पहले ही भांप लेती हैं। बहुत बार उन्हें अपनी आर्थिक, सामाजिक, मजबूरी के कारण शोषण का शिकार होना पड़ता हैं। हमारे देश में औरतों के साथ होने वाली तमाम घटनाओ के पीछे एक तरह की असुरक्षा और पुरुष मानसिकता होती हैं। जो उन्हें महिलाओं के साथ बदसलुकी, बदतमीजी और बलात्कार जैसी घटना के लिए प्रेरित करती हैं।  

यदि हम औरतों को भविष्य दृष्टा कहे तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनके भीतर भविष्य की सोच समाहित होती हैं। वे आने वाले समय की चिंता करके छोटी-छोटी चीजों, स्मृतियों, तीज, त्यौहार, परंपरा तक को संभालकर रखती हैं। अच्छी बात यह है की महिलाएं हर क्षेत्र में अपने को सिध्द कर रही हैं। लड़कियो ने लड़को को हर क्षेत्र में पीछे छोड़कर आगे बढऩा सीख लिया है। 

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (हृस्ह्र) के सर्वे के मुताबिक महिलाओं के लिए बेरोजगारी दर 2018-19 में 5.1 प्रतिशत से गिरकर 2019-20 में 4.2 प्रतिशत हो गई है। मनरेगा में महिलाओं का रोजगार दिवस बढ़ा है। मनरेगा के तहत 2020-21 में पैदा हुए कुल रोजगार (व्यक्ति दिवस) में, महिलाओं का हिस्सा बढ़कर लगभग 207 करोड़ दिन हुआ है ।

प्रसंगवश एक कविता - 

रात के खाने के बाद 

माँ ने ढंक दिये हैं 

कुछ अंगारे राख से 

थोड़ी सी आग कल सुबह के लिए 

भी तो चाहिए।।