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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -छोटे जिले, बड़ा गांव

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -छोटे जिले, बड़ा गांव

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ में एक और नया जिला बनाए जाने की घोषणा हो चुकी है। खैरागढ़ में उपचुनाव को लेकर रस्साकसी के माहौल के बीच मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी है कि जल्द खैरागढ़ को नया जिला बनाया जाएगा। अपने आधिकारिक सोशल मीडिया एकाउंट से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 2 अप्रैल को लिखा, सेव द डेट-16 अप्रैल को खैरागढ़ में कांग्रेस का विधायक बनेगा। 17 अप्रैल को खैरागढ़-छुईखदान-गंडई नया जिला बनेगा।

अभी छत्तीसगढ़ विधानसभा में कांग्रेस की 70 सीटें हैं, भाजपा के पास 14, जेसीसीजे के पास 3 और बसपा की 2 सीटें हैं। खैरागढ़ की सीट जेसीसीजे के विधायक और राजपरिवार के देवव्रत सिंह के निधन के बाद खाली हो गई है। वे जेसीसीजे से भले चुनाव जीतकर आए थे, लेकिन वे लंबे समय तक कांग्रेस में शामिल रहे हैं। उनके निधन के पहले उन्होंने घर वापसी करने की बात खुलकर कही थी। इस बार के उपचुनाव में राजपरिवार का कोई सदस्य मैदान में नहीं हैं, दोनों प्रमुख पार्टियों ने ओबीसी चेहरे पर दांव लगाया है।
   
खैरागढ़ को जिला बनाए जाने की घोषणा को लेकर भाजपा ने इसे चुनावी स्टंट करार दिया है और इसे एक तरह की सौदेबाजी करार दी है। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के इस आरोप पर सीएम भूपेश बघेल ने पलटवार करते हुए कहा कि जब अटल जी ने कहा था कि छत्तीसगढ़ की सभी 11 लोकसभा सीट भाजपा की झोली में डालो और छत्तीसगढ़ राज्य ले लो, तो क्या अटल जी उस वक्त सौदेबाजी कर रहे थे।

सीएम बघेल ने कहा खैरागढ़ को जिला बनाना सौदेबाजी नहीं विकास के लिए जरूरत है और इसे पूरा करना मेरा धर्म है। जिला निर्माण से आम जनता को क्या-क्या लाभ होता है इसे समझना जरूरी है। छोटे जिले और छोटे राज्य को लेकर एक सामान्य अवधारणा रही है कि इससे विकास कार्य तेजी से होते हैं। छत्तीसगढ़ के निर्माण के बाद ये बात सच भी साबित हुई है। इससे जहां विकास के नए-नए कार्य हुए। वहीं एक नया राजनैतिक मैदान भी तैयार हो गया, क्योंकि राज्य बनने के साथ ही यहां अलग विधानसभा का गठन हुआ और जो नेता जिला या कस्बाई स्तर के थे वे प्रदेश स्तर के बन गए। राजनैतिक पार्टियों ने अलग से इकाई बनाकर रणनीति बनाना शुरू की। हालांकि छत्तीसगढ़ ने नए राज्य के तौर पर अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन इसके साथ बने उत्तराखंड और झारखंड ने उस स्तर को नहीं छू पाए, क्योंकि वहां राजनीतिक स्थिरता वैसी नहीं थी, जैसी कि छत्तीसगढ़ में देखने को मिली। भाजपा जहां छोटे राज्यों का पक्षधर रही है, वहीं अब केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को भी छोटे राज्य बहुत रास आ रहे हैं। आने वाले चुनावों में भी दिल्ली और पंजाब की तरह दूसरे छोटे राज्यों में पैर पसारने के लिए जोर लगा सकती है।                

जहां तक जिलों से प्रशासनिक कसावट की बात है तो मध्यप्रदेश के निर्माण के वक्त छत्तीसगढ़ में 6 जिले थे वो जरूरत के हिसाब से बढ़ते गए। छत्तीसगढ़ के निर्माण के वक्त 16 जिले हो गए थे। इसके बाद की सरकारों ने और जिले बनाए। वर्तमान में 28 जिले अस्तित्व में हंै। 4 नए जिले मानपुर-मोहला, सारंगढ़, मनेन्द्रगढ़ और सक्ती की घोषणा हो चुकी है। अब सीएम बघेल ने खैरागढ़ को भी जिला का दर्जा जल्द देने का ऐलान किया है। इस तरह आने वाले समय में छत्तीसगढ़ में 33 जिले हो जाएंगे। कुछ लोगों का अनुमान है कि 2023 तक छत्तीसगढ़ में 36 जिले हो जाएंगे।

पूर्व मुख्य सचिव सुयोग्य मिश्र का कहना है कि नए जिलों के निर्माण से प्रशासन आम लोगों के करीब अवश्य आता है, लेकिन इससे सरकार पर आर्थिक बोझ भी काफी बढ़ता है। आज जब संचार और आवागमन के साधन गांव-गांव तक पहुंच गए हैं, ऐसे में सरकार को विचार करना चाहिए कि क्या अब नए जिलों के सेटअप पर खर्च करना उचित है।

प्रदेश पर 15 साल राज करने वाली रमन सिंह की सरकार ने अपने कार्यकाल में 11 जिलों का निर्माण किया था। बीजापुर और नारायणपुर को 11 मई, 2007 को और इसके बाद 9 नए जिले सुकमा, कोंडागांव, बालोद, बेमेतरा, बलौदाबाजार, गरियाबंद, मुंगेली, सूरजपुर और बलरामपुर को 1 जनवरी, 2012 को बनाया गया था।
वहीं भूपेश बघेल की सरकार ने तीन साल में एक नए पेंड्रा-गौरेला-मरवाही को अस्तित्व में लाया है। बाकी की घोषणा हो चुकी है उन पर प्रशासनिक स्तर पर तैयारी चल रही है। इनके अलावा भी कई क्षेत्र अभी भी जिला बनाने की मांग कर रहे हैं, इनमें कटघोरा, पत्थलगांव और भानुप्रतापपुर प्रमुख हैं।    

जिला बनाने की होड़ में छत्तीसगढ़ ही नहीं कई राज्य शामिल हैं। पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश ने भी हाल ही में 13 नए जिले बनाए हैं जो कि 4 अप्रैल से अस्तित्व में आ गए हैं। इस तरह अब यहां 26 जिले हो गए हैं। छत्तीसगढ़ में जहां 11 लोकसभा सीट है और जिलों की संख्या 28 है। वहीं आंध्रप्रदेश में 25 लोकसभा सीट और जिलों की संख्या 26 हो गई है।

प्रदेश में पूर्व एसीएस बीकेएस रे ने कहा था कि नए जिले जनभावनाओं से जन्म लेते हैं। इसमें क्षेत्रीय संतुलन भी देखा जाता है। इसके पीछे बेहतर प्रशासन देना सरकार का मकसद होता है। शुरू में नए जिलों पर सरकार को पैसे खर्च करने पड़ते हैं पर जब नया जिला प्रशासन पटरी पर आ जाता है तो करों व राजस्व कलेक्शन से सब ठीक हो जाता है। प्रशासनिक कामों के लिए जनता को ज्यादा दूर नहीं जाना होता है। समय, पैसे और श्रम की बचत होती है।

वाकई जिस तरह आम लोग जिला बनाने की मांग करते हैं इसके पीछे कहीं न कहीं अपने इलाके को नई पहचान दिलाना भी होता है। देश में अभी भी लोग अपनी पहचान जिले के साथ जोड़ते हैं वे कहीं भी जाते हैं तो वे बता सकते हैं कि वे फलां जिले के निवासी हैं।

इस तरह की जनभावना को ध्यान में रखकर ही सरकारें नए जिलों के निर्माण के बारे में योजना बनाती हैं। हालांकि सभी की मांग पूरी करना आसान नहीं है।