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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - गैंगवार में तब्दील होता नक्सल आंदोलन

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - गैंगवार में तब्दील होता नक्सल आंदोलन

-सुभाष मिश्र

वैसे तो नक्सलवाद का जन्म शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए हुआ, लेकिन अपने शुरुआती दिनों में ही ये अपने लक्ष्य से भटककर समाज में खौफ का पर्याय बन गया। देश के 70 जिले इस समस्या से सीधे तौर पर जूझ रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ के जिले हैं।

1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ ये आंदोलन अब धीरे-धीरे गैंगवार की ओर बढ़ रहा है। नक्सलवाद और उनके संरचना को करीब से देखने वाले जानकारों का मानना है कि अगर अब इस समस्या के समाधान के लिए सरकारें कोई निर्णायक कदम नहीं उठाती हैं तो बस्तर में गैंगवार की स्थिति बन सकती है। हाल ही में बीजापुर में नक्सलियों ने अपनी एक आमसभा लगाई जिसे वे जन अदालत का नाम देते हैं। इस कथित जन अदालत में नक्सलियों ने तीन लोगों की बेरहमी से कत्ल कर दिया। आम जनता के बीच तालीबानियों की तरह तीन लोगों को मौत की घाट उतारे जाने से आसपास में खौफ पसर गया है, लोग सहम गए हैं।
दरअसल, ये तीन लोग कौन थे, ये तीनों लोग जिसमें दो युवक और एक युवती शामिल हैं नक्सल संगठन से ही जुड़े लोग थे और वे अब हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में वापस लौटना चाह रहे थे। इनमें से एक युवक और युवती तो शादी करने जा रहे थे लेकिन ये बातें नक्सली लिडर्स को नागवार गुजरी और उन्होंने इन पर मुखबिरी का आरोप लगाकर मौत की घाट उतारने का फरमान सुना दिया। बस्तर आईजी ने इसे नक्सलियों संगठन में आपसी द्वंद से जोड़ा है। जबकि नक्सल एक्सपर्ट मानते हैं कि आने वाले दिनों में अगर इस तरह की वारदात बढ़ सकती है क्योंकि नक्सलियों के ज्यादातर नेता बूढ़े होते जा रहे हैं। कई बीमारियों से ग्रस्त हैं तो कई मारे जा चुके हैं, ऐसे में थिंकटैंक के कमजोर होने से लड़ाके संगठन पर हावी होते जा रहे हैं और हो सकता है कि आने वाले समय में ये अपना-अपना एरिया बांटकर किसी फिल्मी गैंग की तरह आपस में मुठभेड़ शुरू कर सकते हैं।

इस खून-खराबा से सबसे ज्यादा नुकसान वहां के आम लोगों का ही होगा। 2020 में भी बीजापुर में ही इस तरह के आपसी संघर्ष में नक्सलियों ने अपने 6 साथियों को मौत के घाट उतार दिया था। हाल ही में आत्मसमर्पण किए नक्सलियों से जो इनपुट मिला है उसमें भी इस तरह की बातें सामने आई है कि नक्सली संगठन में अब कई मतभेद पैदा हो गए हैं। सरकारों को अब नासूर बन चुके नक्सलवाद के खात्मा के लिए बड़ा स्टेप लेने का वक्त आ गया है।

छत्तीसगढ़ के 14 जिले नक्सल प्रभावित हैं इनमें बस्तर के अलावा नारायणपुर, कांकेर, कोंडागांव, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, राजनांदगांव, महासमुंद, धमतरी, गरियाबंद, बलरामपुर, कवर्धा और मुंगेली शामिल हैं। साल 2008 में केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीनहंट का रंग सीआरपीएफ के जवानों के खून से लाल हो गया था। 6 अप्रैल 2010 को सुकमा जिले के ताड़मेटला में हुआ था। इस हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे। तकरीबन 1 हजार से ज्यादा नक्सलियों ने घात लगाकर 150 जवानों को घेर लिया, जवानों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं बचा था। सुकमा जिले की दरभा घाटी में 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सलियों ने हमला किया था। इस हमले में राज्य के पूर्व मंत्री नंद कुमार पटेल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ल सहित कुल 32 लोगों की मौत हुई थी। जबकि 30 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।  2017 को सुकमा के बुरकापाल बेस केम्प के समीप हुए नक्सली हमले में 25 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे। 2020 को नक्सलियों ने सुकमा ने बड़े हमले को अंजाम दिया था। उस हमले में 17 जवान शहीद हुए थे।

छत्तीसगढ़ में पिछले 10 साल में 3722 नक्सली हमले, 489 जवान शहीद, मौत के मामले में टॉप पर है। राज्य सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 2011 से लेकर 2020 तक 10 सालों में छत्तीसगढ़ में 3,722 नक्सली घटनाएं हुई हैं। इनमें 736 आम लोगों की जान गई है, जबकि 489 जवान शहीद हुए हैं। हालांकि, सुरक्षाबलों ने इन 10 सालों में 656 नक्सलियों को भी मार गिराया है। जिस नक्सलवाद की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के नक्सलवादी से एक वैचारिक आंदोलन के रुप में हुई थी। वह आज अपनी राह से भटक गया है।

पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे सत्ता के विरुद्ध एक सशस्त्र आन्दोलन का आरम्भ किया। मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय श्रमिकों एवं किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ उत्तरदायी हैं जिसके कारण उच्च वर्गों का शासन तन्त्र और फलस्वरुप कृषितन्त्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रान्ति से ही समाप्त किया जा सकता है। 1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया। फरवरी 2019 तक, 11 राज्यों के 90 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित हैं। आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। परन्तु बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के विचारधारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ रही है।

वर्ष 2007 छत्तीसगढ़ के बस्तर में 300 से ज्यादा विद्रोहियों ने 55 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट पर उतार दिया था। 2008 ओडिसा के नयागढ़ में नक्सलवादियों ने 14 पुलिसकर्मियों और एक नागरिक की हत्या कर दी।

2009 महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में हुए एक बड़े नक्सली हमले में 15 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गये। 2010 नक्सलवादियों ने कोलकाता-मुंबई ट्रेन में 150 यात्रियों की हत्या कर दी। 2010 पश्चिम बंगाल के सिल्दा केंप में घुसकर नक्सलियों ने हमला कर दिया जिसमें अर्धसैनिक के 24 जवान शहीद हो गए। 2011 छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुए एक बड़े नक्सलवादी हमले में कुल 76 जवान शहीद हो गए जिसमें सीआरपीएफ के जवान समेत पुलिसकर्मी भी शामिल थे। 2012 झारखंड के गढ़वा जिले के पास बरिगंवा जंगल में 13 पुलिसकर्मीयों की हत्या कर दी। 2013 छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों ने कांग्रेस के नेता समेत 27 व्यक्तियों की हत्या कर दी। 2021 में छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षा बलों के 23 जवान शहीद हो गए और 31 जवान घायल हुए।

नक्सलियों के बीच बढ़ते छोटे-छोटे संगठन के बीच यदि इस तरह वर्चस्व की लड़ाई जारी रही तो आने वाले समय में यह गैंगवार बड़ी घटनाओं को अंजाम देगा। सरकार की ओर से किये जा रहे सभी तरह के सकारात्मक कदम और कड़ी कार्यवाही के चलते नक्सली संगठनों के बीच काफी उथल-पुथल है। सरकार को ऐसे समय में कोई सुनियोजित नीति अपनाकर जरुरी पहल करनी होगी।