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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सुरक्षा में चूक और सियासत

  प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सुरक्षा में चूक और सियासत


पंजाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सुरक्षा में चूक का मामला पूरे देश में छाया हुआ है। सुरक्षा में चूक का ये मामला बेहद गंभीर है, इस पर राष्ट्रपति से लेकर देश के तमाम बड़े नेताओं ने चिंता जताई है। इस पूरे मामले ने उस वक्त नया मोड़ लिया जब प्रधानमंत्री ने पंजाब के अधिकारियों से कहा कि मैं एयरपोर्ट तक जिंदा पहुंच पाया, इसके लिए अपने सीएम को थैंक्स कहना। प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद सियासी वार-पलटवार का दौर चल पड़ा है।
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाल का कहना है कि पंजाब के फिऱोज़पुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में भीड़ नहीं आयी तो सुरक्षा का बहाना बनाकर इस आम सभा को रद्द किया गया। पीएम मोदी को अपने पद की गरिमा को नष्ट नहीं करना चाहिए। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी को बठिंडा हवाई अड्डे पर उतरने के बाद हुसैनवाला हेलीकॉप्टर से जाना था, किन्तु खऱाब मौसम की वजह से उन्होंने सड़क मार्ग से जाने का फैसला लिया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि पूरे देश में पीएम की सुरक्षा की चर्चा हो रही है। उनकी सुरक्षा में बिल्कुल भी चूक नहीं होनी चाहिए। हमने प्रधानमंत्रियों को खोया है, उन्हें देश की सबसे मजबूत सुरक्षा दी जाती है लेकिन सुरक्षा की चूक मामले में भाजपा की तरफ से बयानबाजी ठीक नहीं है। मौसम की जानकारी सबको होती है, आजकल मोबाइल से भी मौसम की जानकारी मिलती है। क्या दिल्ली से जब भटिंडा जाना था तो उनके कार्यालय में मौसम की जानकारी नहीं ली गई?  

पंजाब पुलिस को तीन जगह सुरक्षा की जानकारी दी गई थी। तीनों जगह सुरक्षा देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी, लेकिन पीएम ने एयरपोर्ट पर कहा हम बाई रोड जाएंगे। कभी कोई पीएम 112 किलोमीटर बाई रोड गए हैं। आपका आईबी और सूचनातंत्र फेल था। ऐसा कौन सा जरूरी कार्यक्रम था जो कैंसिल नहीं हो सकता था। मौसम के कारण बहुत से कार्यक्रम कैंसिल हुए हैं, कांग्रेस ने भी किये हैं। मुख्य बात यह है कि वहां भीड़ ही नहीं थी। सबको पता है पंजाब के किसान आंदोलन में थे। वहां के लोग और किसान भाजपा से नाखुश हैं। विशुद्ध रूप से राजनीति कर रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि इस मामले में जिम्मेदारी तय की जाएगी।

इधर प्रधानमंत्री मोदी ने इस मामले में राष्ट्रपति से मुलाकात की है तो सोनिया गांधी ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पंजाब की मुख्यमंत्री चन्नी से बात की है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने इस पर राज्य सरकार से रिपोर्ट भी मांगी है। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चला गया है। एक तरफ चिंता और बातचीत का दौर चल रहा था तो दूसरी तरफ पंजाब के सीएम का पुतला दहन, महामृत्युंजय यज्ञ, प्रदर्शन जैसे नजारे भी देखने को मिले।

दरअसल पंजाब में होने वाले चुनाव को लेकर इस समय सियासी पारा आसमान पर है। पंजाब के बढ़ते-चढ़ते तापमान में जिनके नामों, बयानों को लेकर लगातार सुखिऱ्यां बनती रहती हैं उनमें कभी नवजोत सिद्धू, तो कभी अमरिंदर सिंह उसके बाद अरविन्द केजरीवाल तो अब पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी शुमार हो गए हैं। चरणजीत सिंह चन्नी कहते हैं कि हमने पीएमओ से खऱाब मौसम की स्थिति और किसानों के विरोध के कारण यात्रा स्थगित करने कहा था। हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अचानक रूट बदलने की कोई सूचना नहीं थी। उनका कहना है कि पीएम के दौरे में सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई। भाजपा ने इस मुद्दे पर प्याली में तूफान खड़ा करके पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री का पुतला जलाना, जगह-जगह प्रदर्शन कर इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है।

इस घटना के बाद कुछ सवाल जो हवाओं में तैर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी हैलीकॉप्टर से भटिंडा एयरपोर्ट से रैली स्थल तक जाने वाले थे लेकिन बारिश की वजह से 112 किलोमीटर का फासला सड़क मार्ग से तय करने का आपातकालीन निर्णय किसने लिया? क्या एकाएक 112 किलोमीटर की सुरक्षा व्यवस्था बनाना क्या सम्भव था? वहां मार्ग में प्रोटेस्ट कर रहे किसानों को कहा जा रहा है कि पोलिस ने सूचना दी। जबकि प्रधानमंत्री का एयरपोर्ट से 112 किलोमीटर जाने का तात्कालिक फैसला गोपनीय रह ही नहीं सकता। एक वीडियो में उसी जगह भारतीय जनता पार्टी के झंडे लेकर मार्ग में नरेन्द्र मोदी जिंदाबाद के नारे लगाते व्यक्ति प्रधानमंत्री की गाड़ी तक पहुँचे तो उन्हें सूचना किसने दी? वो गाड़ी तक कैसे पँहुचे? क्या पिछली ट्रैक्टर रैली में दिल्ली में लाल किले तक तथा कथित मार्ग भटकने और वहां झंडा फहराने की घटना के माध्यम से किसानों को बदनाम करने और इस जान बचाकर वापस आकर किसानों को बदनाम करने की घटना में कोई समानता है? जहां से प्रधानमंत्री को खतरा मानकर फ्लाई ओवर से लौटना पड़ा वहां ना तो कोई गोली चली, न हथियारबाज़ी हुई, न कोई रॉड, फावड़ा, कुदाली लेकर दौड़ा, ना ही धक्का-मुक्की जैसी कोई छोटी-मोटी भी घटना हुई तो फिर इसे जानलेवा स्थिति कैसे माना गया? यह भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री के मंच पर न पहुंचने से पंजाब की जनता 46 हज़ार करोड़ के निर्माण व अधोसंरचना विकास और एक्सप्रेस हाइवे की स्वीकृति से वंचित रह गई। क्या ये स्वीकृतियां मंच पर दी जाती हैं या फाइलों पर दी जाती हैं? अगर स्वीकृति देनी है तो इसके लिए मंच रैली, घोषणा, लोकार्पण ज़रूरी नहीं, फिर आजकल तो वर्चुअल मोड़ में लोकार्पण का दौर है! पीएम की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की नहीं बल्कि एसपीजी की होती है और एसपीजी सुरक्षा प्राप्त हर व्यक्ति का रूट चार्ट एसपीजी की निगरानी में होता है और पूरे रास्ते में एसपीजी के लोग अपने हिसाब से सुरक्षा घेरा बनवाते हैं तो क्या आज एसपीजी ने ऐसा नहीं किया? और यदि नहीं किया तो क्यों नहीं किया और नहीं करने के कारण एसपीजी के प्रमुख और गृहमंत्री से इस्तीफा कब लिया जाएगा?
इस पूरे मामले में जो बात सामने आई है उससे यह लग रहा है कि यह चूक पंजाब पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों दोनों से हुई है। दोनों तरफ से कहीं न कहीं आपसी समन्वय की कमी नजर आई है। इस तरह की गंभीर चूक की पूरी जांच होनी ही चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति निर्मित न हो, लेकिन इस पर राजनीति करना, हत्या की कोशिश की तरह प्रचारित करने की जरूरतनहीं थी।