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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाये

    प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाये

सुभाष मिश्र

हमारे यहां कहावत है कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे। संत कबीर का दोहा है 'करता था तो क्यों रहा, अब काहे पछताय, बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाये। दरअसल हमारे देश में पिछले कुछ सालों में नफरत की राजनीति कुछ ज्यादा ही तेज हुई है। सोशल मीडिया के आने के बाद तो मानो इस पर ग्रहण लग गया है। इस नफरत की राजनीति का सर्वाधिक शिकार हमारी युवा पीढ़ी हो रही है। हाल ही में बुल्ली बाई एप बनाकर मुस्लिम महिलाओं की नीलामी करने वाले लोग इसी नफरत की मानसिकता के शिकार हुए हंै। नफरती बयान आज की राजनीति का अहम हिस्सा है। दिन भर अलग-अलग मंचों, टीवी चैनल सोशल मीडिया के जरिए नफरत की खेती लहलहा रही है। धर्म संसद हो या कोई मजहबी संस्था का उत्सव या चंगाई सभा सभी जगह लोगों को आपस में बांटने वाली, नफरत फैलाने वाली ताकतें सक्रिय हंै।

इस समय राजनीति से जुड़े लोग जिस तरह से घृणा के प्रचार-प्रसार को पोषित कर रहे हैं। उसकी वजह से आज का युवा दिग्भ्रिमित है। हत्यारे जनसंचार के माध्यम धार्मिक सांस्कृतिक संस्थान समुदाय के बीच सक्रिय स्तरों पर जहर का संचार कर रहे हैं। हमारे प्रचार माध्यम और जनमानस को प्रभावित करने वाले अलग-अलग लोग, समूह बहुत से दल तक साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने का प्रयास करते हंै। चाहे घर का व्हाट्सअप ग्रुप हो या मित्रों का, समाज का या संगठनों का सभी में घृणा फैलाने वाले बहुत से वीडियो जानबूझकर आधे-अधूरे अतिरिक्त भरी जानकारी के साथ तैयार करके पोस्ट किये जा रहे हंै। इस तरह की जानकारी से सबसे ज्यादा वो युवा प्रभावित होते हैं जिनके पास किसी प्रकार का इतिहास बोध, वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है।

साम्प्रदायिक शक्तियां अपने कामों को प्रमाणित और वैध बताने के लिए उन्हें उदाहरणों को मध्यकाल से जोड़ती है। यहां प्रमुखता से बाबर जैसे शासक का नाम लेकर यह कहा जाता है कि अधिकतर मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं के मंदिर गिराए और उनकी जगह मस्जिद बनवाई। कोई यह नहीं कहता या बताता कि अधिकांश शासकों ने चाहे वे किसी भी धर्म-जाति सम्प्रदाय के क्यों न रहे हो उन्होंने अपनी सत्ता का विस्तार करने के लिए युद्ध किये। जनता के बीच अपना राज चलाने के लिए जो भी हथकंडा, नीति-अनीति अपना सकते थे अपनाई। इतिहास को साम्प्रदायिक रंग देने वाले कभी यह नहीं बताते है कि हिन्दुओं और बौद्धों ने एक दूसरे के पूजा स्थल तोड़े। पाटलीपुत्र के जिस बौद्धी वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी उसे किस हिन्दू शासक ने कटवाया ये कोई नहीं बताना चाहता। अभी हाल ही में हरिद्वार और रायपुर के धर्म संसद में ऐसी उत्तेजक बातें कही गई जो समाज को आपस में बांटे। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि जिन लोगों के खिलाफ पुलिस नफरत फैलाने की कार्यवाही करने जा रही है वे इसके लिए प्रतिकार सभा आयोजित कर रहे हैं। गांधी को गाली देने वाले काली।

दरअसल, सोशल मीडिया के इस दौर में अपने अनुसार एकतरफा और साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने के कारण ही नई पीढ़ी जो कथित तौर पर व्हाट्सअप ज्ञान जिसे आजकल व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी कहा जाता है उसके बहकावे में आकर बुल्ली बाई एप की संरचना करने लगती है। धर्म और जाति की घृणित राजनीति करके लोगों के बीच वैमनस्मता के बीज बोने वाले लोग नई पीढ़ी को यह नहीं बताते कि अंग्रेजों के 1857 के विद्रोह के दौरान हिन्दू मुस्लिम एकता से हुए थे तब हिन्दू मुसलमान ने मिलकर बहादुरशाह जफर को अपना नेता चुना था। इस अंतिम मुगल बादशाह को अपने देश से बेदखल होकर रंगून में ही अंतिम सांस लेनी पड़ी और ये कहने को बाध्य होना पड़ा कि कितना है बद-नसीब जफ़ऱ दफ्ऩ के लिए, दो गज़ जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।  

अंग्रेजों द्वारा फूट डालो राज करो की जो नीति अपनाई गई थी नये भारत के शासक भी यही करना चाहते हैं। आधुनिक भारत में यह काम टेक्नालॉजी के सहारे किसी एक कमरे में बैठकर आसानी से किया जा रहा है। आजकल धर्म जाति सम्प्रदाय और बहुत तरह के झूठ को बताने की लड़ाई के लिए बहुत से वार रुम सक्रिय हैं।

बुल्ली बाई एक दरअसल हमारी उसी पिल्ल सत्तात्मक व्यवस्था सोच की परिणिती है जिसमें समाज के कमजोर वर्गों जिसमें हमारी महिलाएं भी शामिल हैं उनके शोषण, दमन और उन्हें एक माल के रूप में देखती है। साम्प्रदायिक राजनीति दूसरों से घृणा करने पर आधारित होती है। साम्प्रदायिक राजनीति और धार्मिक कट्टरवाद में काफी कुछ समानता होती है। दोनों ही विचारधारा में महिलाओं पर सीधे तौर से या लुक-छिपकर अत्याचार और हिंसा शामिल होती है। दुर्भाग्यजनक बात तो यह है कि जो मानसिकता महिलाओं को पुरूषों की संपत्ति मानकर एप के जरिए बेचने के लिए प्रेरित करती है उसे बनाने और विस्तारित करने के काम में एक लड़की की भी सहभागिता पाई गई है।

हमारे देश की युवा पीढ़ी अफीम के नशे से भी ज्यादा घातक धर्म, जाति, वैमनस्यता के नशे से ग्रसित है। नौजवान नस्ल की रगों में नफरत का ज़हर कितनी तेज़ी से फैलता जा रहा है इसका पता इस बात से चलता है कि सुल्ली डील के क्लोन एप्प बुल्ली बाई के मामले में अब तक जो दो गिरफ्तारियां हुई हैं उनमें से एक 21 साल का इंजीनियरिंग छात्र और दूसरी 18 साल की एक छात्रा है। यहां सवाल यही है कि देश की नौजवान पीढ़ी के दिमाग में यह ज़हर कौन भर रहा है, कौन इन्हें उकसा रहा है कि किसी एक ख़ास समुदाय के खिलाफ अपनी बीमार मानसिकता का परिचय दे। वह भी महिलाओं के खिलाफ जिनका हर धर्म में मान है, सम्मान है यहां तक कि पूजा भी की जाती है। उत्तराखण्ड की एक लड़की बुल्ली बाई एप से जुड़े तीन अकाउंट चलाती है। जबकि दूसरे आरोपी जिसका नाम विशाल है, उसने खालसा नाम से अकाउंट खोल रखा था।

विशाल ने 31 दिसंबर को दूसरे अकाउंट के नाम भी बदले जिन्हें सिख नाम के आधार पर रखा गया ताकि ऐसा लगे जैसे कोई खालिस्तानी ग्रुप यह नफरती एप चला रहा है, हालांकि इस एप का सिखों से कोई लेना-देना नहीं है।  

बुल्ली बाई ऐप देश भर के लोगों को डराने व उनसे पैसे कमाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। यह एप एक सस्पीशियस ग्रुप (संदिग्ध समूह) द्वारा तैयार किया गया है। यह ऐप देश की महिलाएं खासकर कि मुस्लिम महिलाओं की नीलामी करके पैसे कमाने के लिए बनाया गया था।
क्रिएटर ने इस ऐप को माइक्रोसॉफ्ट की खुद की साइट त्रद्बह्ल॥ह्वड्ढ पर बनाया था।

बुल्ली ऐप से स्कैमर्स सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि से किसी भी महिला व लड़कियों की प्रोफाइल चुराते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर अपलोड कर देते हैं।

पुलिस गिरहब प्लेटफार्म पर ऐप बनाने वाले 21 वर्ष के नीरज बिश्नोई को असम में गिरफ्तार कर उसे ही मास्टर माइंड बता रही है। नीरज बिश्नोई भोपाल के वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से कम्प्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग कर रहा है। इस मामले में उत्तराखंड की 18 वर्ष की श्वेता सिंह, बैंगलुरु के 21 वर्षीय विशाल झा और 20 वर्षीय मयंक रावल को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। श्वेेता सिर्फ 12वीं पास और इंजीनियरिंग की तैयारी कर रही थी। असम में पकड़े गए नीरज बिश्नोई के पिता एक दुकान चलाते हैं। लॉकडाउन के दौरान वह भोपाल से घर चला आया था। पूरे दिन वह अपने कमरे में बैठकर कम्प्यूटर में घुसा रहता था और देर रात तक काम करता था। कुछ राजनीतिक दलों के लोग भी उससे मिलने आते थे। उसकी दोनों बहनों को उसके काम पर शक भी हुआ तो वह झगडऩे लगता। पकड़े गए दो अन्य युवकों की उम्र भी कोई ज्यादा नहीं है। बुली बाई ऐप पर मुस्लिम महिलाओं को निशाने पर लेकर उनकी बोली तक लगाई जा रही थी। इस विवादित ऐप पर मुस्लिम महिलाओं के चित्र अपलोड कर उनके बारे में अश्लील और अनुचित बातें लिखी गईं। इससे पहले भी पिछले वर्ष जुलाई में ऐसे ही विवादित ऐप सुन्नी बाई पर मुस्लिम महिलाओं के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने का मामला सामने आया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने पर उससे मिलता-जुलता ऐप सामने आ गया। गिरहब एक होस्टिंग प्लेटफार्म है, इस प्लेटफार्म पर अलग-अलग तरह के ऐप मिल जाएंगे। मध्य प्रदेश के इंदौर में पुलिस ने सुल्ली डील बेचने के आरोप में एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। गिरहब एक ओपन सोर्स प्लेटफार्म है, जो यूजर्स को ऐप्स बनाने और साझा करने की अनुमति देता है। इसके लिए आपको ईमेल की जरूरत पड़ती है। बुली बाई ऐप पर मुस्लिम महिलाओं के मानसिक उत्पीडऩ का मामला तब सामने आया जब एक महिला पत्रकार ने ट्विटर पर अपनी आपबीती साझा की।

समाज में साम्प्रदायिक जहर फैलाने, आतंकवादी घटनाओं के लिए युवाओं को भर्ती करने वाले, धर्म के नाम पर युवाओं का माइंड वाश करने वाले संगठन और उनके स्लीपर सेल अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए उन युवाओं का इस्तेमाल करते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।
प्रसंगवश कृष्ण कल्पित की हिन्दीनामा से यह कविता-
मैं अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक बार फिर कहता हूं
यह महादेश चल नहीं सकता
जाति धर्म मज़हब भाषा $िफर$का-परस्ती
और सांप्रदायिकता का विष
यदि इसी तरह फैलता रहा तो यहां खून की नदियां बहेंगी
और एक दिन यह महादेश बहुत सारे टुकड़ों में विभक्त हो जाएगा!