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स्त्री-पुरुष संबंधों की गहरी पड़ताल करता है नाटक मरणोपरांत

स्त्री-पुरुष संबंधों की गहरी पड़ताल करता है नाटक मरणोपरांत

असफल कवि सम्मेलन नाटक में दिखे परसाई के व्यंग्यबाण
रायपुर। जनमंच रायपुर में रविवार की रात दो अलग-अलग मूड के नाटकों के जिनकी पृष्ठभूमि अलग-अलग थी ,मंचित हुए। पहला नाटक मरणोपरांत हुआ, दूसरा प्रस्तुति असफल कवि सम्मेलन की हुई। सुरेंद्र वर्मा द्वारा लिखित नाटक मरणोपरांत स्त्री-पुरुष संबंधों की गहरी पड़ताल करता है। दो पुरुष जिसमें एक पति और एक प्रेमी है एक्सीडेंट में स्त्री के अचानक मर जाने पर उसके बारे में किस-किस तरह से बात करते हैं, उनके अवचेतन में एक स्त्री किस तरह से रची बसी है यह कहानी है मरणोपरांत की। दो पात्रीय इस नाटक में रचना मिश्रा ने अपनी परिकल्पना से उस स्त्री को जो नाटक में अदृश्य पाठ की तरह पूरे समय उपस्थित है, उसे मंचन पर दृश्य में उपस्थित किया है। मरणोपरांत नाटक में पति की भूमिका भीम जायसवाल ने प्रेमी की भूमिका में शिवम तिड़के ने तथा स्त्री के रूप में संध्या वर्मा ने अभिनय किया। नाटक का संगीत खेवना पटेल ने दिया।

मरणोपरांत नाटक में स्त्री पुरुष के बीच के गहरे अंतर संबंधों और पति के रहते दूसरे पुरुष से संबंध और दोनों पुरुषों के बीच स्त्री को लेकर बातचीत बताती है कि उनके जीवन में स्त्री का कितना महत्व है किन्तु स्त्री को लेकर वे कितने पजेसिव है।

(क्षणिक विराम) नहीं। पूरी तरह डर नहीं लेकिन कुछ समझे न जान की या गलत समझे जाने की जोखिम और हो सकने वाली नाउम्मीदी का बोझ।
''मैं अभी तक समझ नहीं पाया कि हमारे बीच सबकुछ कैसे नामालूम ढंग से बुझ गया था। कि अच्छा, अलग हमारे यहां बच्चा होता एक तो क्या कुछ फर्क पड़ सकता था? पर अगर फर्क पडऩा होता कुछ, तो वह यह दलील ही क्यों देती कि वह बंधना नहीं चाहती अभी से
''यादों के दबाव से नसें फटने लगती हैं....
''तुम एक हद तक काट सकते हो अपने-आपको...
''उन शुरू के दिनों की याद से भी शार्मिन्दगी होने लगती है, जब तुम हमारे बीच कहीं नहीं थे... उस सुकून की चमक भी इस तरह झूठी लग रही है कि जैसे छुओ तो उंगलियों में उतर आएगी।

दूसरा नाटक हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना पर असफल कवि सम्मेलन पर आधारित था। इस नाटक में मंचीय कवियों के लटके झटके के दिखाये गये। नाटक में राज भारद्वाज, अद्वैत नाईक, भीम जायसवाल, हेमंत यादव, संध्या वर्मा, शिवम तिड़के, मोनिका जैन, भरत सिंग, आदित्य ठाकुर, प्रदीप मेधान ने रोल प्ले किया। नाटक की लाइट-रवि शर्मा, महेंद्र सिंग ने किया। नाटक संगीत- खेवना पटेल ने दिया।
हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना असफल कवि सम्मेलन का सफल अभ्यास पर आधारित नाटक में कवि सम्मेलनों के गिरते स्तर और उसमें होने वाले तमाम तरह के हथकंडो को दर्शाया गया। बकौल हरिशंकर परसाई ''पिछले कुछ सालों से देश में राष्ट्रीयता की चेतना जागृत करके हिंदू और अधिक हिंदू और मुस्लमान को अधिक मुस्लमान बनाने की कोशिश हो रही है। धार्मिक आस्था इन दिनों सिर चढ़कर बोल रही है।
''मेरा अनुभव यह कहता है किसी मंदिर में या सभी में जाते समय चप्पलें एक जगह नहीं उतारना चाहिए। एक चप्पल यहां उतारिए, तो दूसरी दस फीट दूर। तब चप्पलें चोरी नहीं जाती। एक ही जगह जोड़ी होगी, तो कोई भी पहन लेगा। मैंने ऐसा ही किया था।
''श्रोता फंसाने की एक खास स्ट्रेटजी होती है।
''हमने नियम बना लिया है कि जो कवि अपने साथ दस श्रोता लायेगा, उसे एक कविता सुनाने का मौका मिलेगा।
''सरकार यह चाहे किसी देश की हो, स्थितिवादी होती है। कलाकार, किसी भी देश का हो, वर्तमान से आगे बढ़कर अधिक उन्नत भविष्य को दर्शन करता है।