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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - क्या पुरस्कारों से पीड़ितो को त्वरित मदद मिल पायेगी?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - क्या पुरस्कारों से पीड़ितो को त्वरित मदद मिल पायेगी?

-सुभाष मिश्र

हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने घोषणा की है कि, जो भी व्यक्ति सड़क दुर्घटना में घायल की मदद करेगा, उसे सरकार 5 हजार रूपए प्रोत्साहन राशि के रूप में देगी। सरकार का ये कदम बहुत सराहनीय है और इसका स्वागत होना चाहिये, लेकिन पुलिस और निजी तथा सरकारी अस्पतालों के रवैये को देखते हुए इसकी सफलता पर संदेह होता है।

इसी तरह से सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु के मामलों में कमी लाने के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय 'गुड स्मार्टियंस नामक योजना की शुरुआत की है, जिसके तहत उन लोगों को 5000 रुपये का नकद पुरस्कार प्रदान किया जाएगा, जो सड़क दुर्घटना में पीडि़त को दुर्घटना के 'महत्वपूर्ण घंटों यानी गोल्डन आवर्स  के भीतर अस्पताल पहुंचा कर उसकी जान बचाने का प्रयास करते हैं। इस पुरस्कार के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर 10 सबसे नेक मददगारों को एक-एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।

'गोल्डन ऑवर एक दर्दनाक चोट के बाद एक घंटे की वह अवधि है, जिस दौरान तत्काल चिकित्सा उपचार प्रदान कर, मृत्यु को रोकने की संभावना सबसे अधिक होती है। सड़क मंत्रालय ने कहा कि वह राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के परिवहन विभाग को इनाम देने के लिए 5 लाख रुपये का शुरुआती अनुदान प्रदान करेगा। मोटर व्हीकल संशोधन कानून 2019 की धारा 134ए के प्रावधान के मुताबिक, मंत्रालय ने 29 सितंबर, 2020 को नेक मददगार के लिए नियमों को अधिसूचित किया था। मंत्रालय ने कहा कि अब यह महसूस किया गया है कि आपातकालीन स्थिति में सड़क दुर्घटना पीडि़तों की मदद करने के लिए आम जनता को नकद पुरस्कार और प्रमाणपत्र के माध्यम से प्रेरित करने और नैतिकता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कैलेंडर वर्ष 2020 के दौरान भारत में कुल 3,66,138 सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं, जिसमें 1,31,714 लोगों की जान गई है।
नजर हटी, दुर्घटना घटी जैसे स्लोगन हो या फिर दुर्घटना से देर भली जैसी सीख हो, यह फिर आपके घर में आपका कोई इंतजार कर रहा है जैसी इमोशनल बात हो, इसके बावजूद सड़क दुर्घटना में कमी नहीं आ रही है। हमारे यहां सड़क दुर्घटना के मुख्य कारणों में हमारी खराब लायसेंसिग प्रणाली है। हमारे यहां  ड्रायविंग लायसेंस की प्रक्रिया इतनी लचीली और भ्रष्ट है कि किसी भी व्यक्ति को लायसेंस मिल जाता है। एक्सीडेंट होने पर लायसेंस निरस्त करने की जेहमत तक नहीं उठाई जाती है। ड्रायविंग ट्रेनिंग के नाम पर जो स्कूल संचालित है, उनकी ट्रेनिंग खराब है। सड़को का रख-रखाव और यातायात संबंधी दिशा-निर्देशो की कमी तथा गाड़ी चालन में टेेक्नालॉजी का न्यूनतम इस्तेमाल भी इसका करना है।

यह देखा गया है कि लोग पुलिसिया कार्रवाई के पचड़े में नहीं फंसना चाहते, जिस कारण वे घायलों को अस्पताल पहुंचाने से बचते हैं। हमारे देश में पुलिस की जांच प्रक्रिया जैसी है उसके बारे मे देश के शिखर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'इंस्पेक्टर मातादीन चाँद परÓ में जो लिखा है वो देश की पुलिस व्यवस्था का सटीक हाल है। इस रचना के एक अंश पर गौर फरमाइए।  

 एक दिन आपसी मारपीट में एक आदमी मारा गया। मातादीन कोतवाली में आकर बैठ गए और बोले-नमूने के लिए इस केस का 'इंवेस्टिगेशनÓ मैं करता हूँ। आप लोग सीखिए यह क़त्ल का केस है। क़त्ल के केस में 'एविडेंसÓ बहुत पक्का होना चाहिए।

कोतवाल ने कहा-पहले कातिल का पता लागाया जाएगा, तभी तो एविडेंस इकठ्ठा किया जाएगा। मातादीन ने कहा-नहीं, उलटे मत चलो। पहले एविडेंस देखों। क्या कहीं खून मिला? किसी के कपड़ों पर या और कहीं?

 एक इन्स्पेक्टर ने कहा-हाँ, मारने वाले तो भाग गए थे। मृतक सड़क पर बेहोश पड़ा था। एक भला आदमी वहाँ रहता है। उसने उठाकर अस्पताल भेजा। उस भले आदमी के कपड़ों पर खून के दाग लग गए हैं।

मातादीन ने कहा-उसे फ़ौरन गिरफ़्तार करो।
कोतवाल ने कहा-मगर उसने तो मरते हुए आदमी की मदद की थी।
मातादीन ने कहा- वह सब ठीक है। पर तुम खून के दाग ढूंढने और कहाँ जाओगे? जो एविडेंस मिल रहा है, उसे तो कब्जे में करो। वह भला आदमी पकड़कर बुलवा लिया गया। उसने कहा- मैंने तो मरते आदमी को अस्पताल भिजवाया था। मेरा क्या कसूर है? चाँद की पुलिस उसकी बात से एकदम प्रभावित हुई। मातादीन प्रभावित नहीं हुए। सारा पुलिस महकमा उत्सुक था कि अब मातादीन क्या तर्क निकालते हैं।

 मातादीन ने उससे कहा- पर तुम झगड़े के जगह गए क्यों?
 उसने जबाब दिया- मैं झगड़े की जगह नहीं गया। मेरा वहाँ मकान है। झगड़ा  मेरे मकान के सामने हुआ। अब फिर मातादीन की प्रतिभा की परीक्षा थी। सारा महकमा उत्सुक देख रहा था। मातादीन ने कहा- मकान तो ठीक है, पर मैं पूछता हूँ, झगड़े की जगह जाना ही क्यों?

हमारी पुलिस का भी अब तक शायद यही मानना रहा है की दुर्घटना वाली जगह पर जाना ही क्यों ...गए हो तो भुगतो ...। सीधी सी बात ये है की लोग पुलिस और कानून के पचड़े में नहीं पढऩा चाहते, क्योंकि लोगों को लगता ही की पुलिस और कानून के चक्कर में उनकी परेशानियाँ बढ़ जाएँगी, लेकिन सरकार के नए कदम से अब सड़क हादसे में घायल किसी शख्स का इलाज करने से देशभर के अस्पताल मना नहीं कर सकेंगे। चाहे सरकारी हो या निजी अस्पताल, ऐसे घायलों को बिना किसी इलाज खर्च के अस्पताल को इलाज देना होगा।

 सड़क दुर्घटना के मामले में सेब लाइफ फाउंडेशन के सर्वे के मुताबिक 75 फीसदी लोग मदद के लिए आगे नहीं आते। विधि आयोग की 201वीं रिपोर्ट में कहा गया था कि डाक्टरों के मुताबिक 50 फीसदी मामले में दुर्घटना पीडि़तों की जान बचाई जा सकती है, अगर उन्हें एक घंटे के भीतर अस्पताल में दाखिल करा दिया जाए।

सड़क हादसे के मामले में अगर मौत हो जाए तो पुलिस आईपीसी की धारा-304 ए (लापरवाही से मौत) और साथ ही लापरवाही से गाड़ी चलाने यानी आईपीसी की धारा-279 के तहत केस दर्ज कराती है। धारा-279 का इस्तेमाल तब होता है जब ड्राइवर ने लापरवाही से गाड़ी चलाई हो और इससे हादसे का अंदेशा हो। इस धारा के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम 6 महीने कैद की सजा हो सकती है। हालांकि ये अपराध जमानती हैं। अगर लापरवाही से गाड़ी चलाने से किसी की मौत हो जाए, तो धारा-304 ए के तहत केस दर्ज किए जाने का प्रावधान है, जिसमें दोषी पाए जाने पर अधिकतम दो साल तक कैद हो सकती है। इसमें भी जमानत मिल सकती है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में हर घंटे 17 लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गवाएं बैठते हैं। रोजाना 29 बच्चे ऐसी दुर्घटनाओं में मौत का शिकार हो जाते हैं। पिछले एक दशक के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 13 लाख लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं और 50 लाख लोग या तो गंभीर रूप से घायल हुए हैं या स्थायी अपंगता का शिकार हुए हैं। भारत में सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत लोग इसलिए मारे जाते हैं क्योंकी उन्हें समय पर उपचार की मदद नहीं मिल पाती है। सड़क हादसों के कारण देश को हर वर्ष लगभग 4.34 लाख करोड़ रूपए का नुकसान उठाना पड़ता है।

छत्तीसगढ़ की अगर बात करें तो यहां सड़क हादसों से स्थिति लगातार भयावह होती जा रही है। मार्च में शुरुआती 9 दिनों में 300 सड़क हादसे में 158 वाहन चालकों ने जान गंवाई, वहीं 246 लोग घायल हो गए। छत्तीसगढ़ में तमाम सुरक्षा उपायों और जागरूकता के बाद भी सड़क हादसे कम नहीं हो रहे हैं। एक तरफ जहां सड़क दुर्घटनाएं बढ़ी हैं, वहीं मरने वालों की संख्या में भी काफी इजाफा हुआ है। सबसे हैरानी वाली बात ये है कि 2020 के मुकाबले 2021 में ज्यादा सड़क हादसे हुए हैं। 2021 में सिर्फ चार महीने यानी जनवरी से लेकर अप्रैल तक 4576 सड़क हादसे हुए। जिसमें 2064 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। वहीं 4150 लोग घायल हुए। वहीं बात 2020 की करें तो कुल 3880 सड़क हादसे हुए, जिसमें 3777 लोग घायल हुए। वहीं 1462 लोगों को जान गंवानी पड़ी। जनवरी 2020 से लेकर अप्रैल 2021 तक इन डेढ़ सालों में करीब 6 महीने से ज्यादा का समय लॉकडाउन का भी था। जिसमें तमाम तरह की पाबंदियां लागू थी। बावजूद इसके सड़क हादसों में कोई कमी नहीं आई है।

इसके अलावा ज्यादातर सड़क हादसों का कारण है गलत पार्किंग, ओव्हर लोडि़ंग, गलत दिशा में गाड़ी चलाना, नशे में वाहन चलाना, लापरवाही से गाड़ी चलाना, हिट एंड रन, वाहन चलाते समय मोबाइल का इस्तेमाल करना, सड़क में मवेशी और गाड़ी में पर्याप्त लाइट की कमी, आदि भी शामिल है। मालवाहक गाडिय़ों और यात्री गाडिय़ों के चालको के काम के घंटे भी निर्धारित नहीं है। बहुत सारी दुघर््ाटनाएं ड्रायवरों के थके होने, नींद आने के कारण होते है।

सड़क हादसों का प्रमुख कारण यातायात नियमों का पालन नहीं करना है। गाड़ी चलाते समय हेलमेट पहनना, छोटे बच्चों को गाड़ी ना चलाने देना, नशे की हालात में गाड़ी ना चलना, एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा ना करना, जल्दी पहुंचने की होड़ तथा गाडिय़ों का रख-रखाव बड़ा कारण है।
प्रसंगवश बशीर बद्र का शेर
तुम अभी शहर में क्या नए आए हो
रुक गए राह में हादसा देख कर।।