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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अमिताभ बच्चन : दो जनरेशन के बीच कड़ी

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अमिताभ बच्चन : दो जनरेशन के बीच कड़ी

-सुभाष मिश्र
सिनेमा का समाज पर गहरा प्रभाव है। जब से हमारे देश में सिनेमा आया उसने समाज के हर तबके को प्रभावित किया है। इस सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन 79 वर्ष की आयु पूर्ण कर के 80 में प्रवेश कर गये। वे आज भी उतने ही सक्रिय चर्चित और अपने काम के प्रति समर्पित है, जैसे कोई युवा। जंजीर जैसी फिल्म के जरिए एंग्री यंग मैन के छबि बनाने वाले अमिताभ आज तक अपनी उस छवि से मुक्त नहीं हो पाये। अपनी दूसरी पारी में अपनी इस छवि को तोड़कर अपनी उम्र के अनुरूप छवि गढऩे की कोशिश की। नवरत्न तेल से लेकर कमला पसंद तक का विज्ञापन करने वाले अमिताभ बच्चन विज्ञापनो के जरिए अपनी फिल्मों से ज्यादा कमाई करते हैं। स्वच्छ भारत से कोविड वैक्सीन तक ब्रांड एम्बेसेटर अमिताभ बच्चन कभी शेर बचाने की अपील करते हैं तो कभी गुजरात आने का निमंत्रण देते है।

ऐसे समय जब देश में मोहभंग का दौर शुरु हो चुका था और सारे आदर्श धीरे-धीरे धराशायी हो रहे थे राष्ट्रीय स्तर पर कोई आईकान नहीं बचा था जो युवाओं में नया जोश भर कर उनके गुस्से-बैचेनी को आवाज दे सके। ऐसे समय में जंजीर फिल्म के जरिए अमिताभ बच्चन एक एंग्री यंग मैन के रूप में सामने आते है। सलीम-जावेद की कहानी के जरिए वे प्रेम में पड़े चाकलेटी हीरो की छवि को तोड़कर एक खुरदुरे गुस्साएं हीरो के रूप में लोगों से लोहा लेते है। वे आदर्श मूल्यों की स्थापना नहीं करते वे मारपीट कर अपना हक छिनने में, हिंसा को ग्लैमराइज करने वाले डॉन के रूप में सामने आते है। उस दौर का युवा अपने गुस्से को अमिताभ द्वारा लिए जा रहे बदले में रूपातंरित होते देखता है। यहां एक आदर्शवादी नायक नहीं बल्कि समाज की बुरी ताकतो से उन्ही के तरीके से निपटने वाला नायक प्रकट होता है जो कहता कि जाओ जाकर पहले उस आदमी का साईन लेकर आओ जिसने मेरे हाथों पर यह लिख दिया की मेरा बाप चोर है। वे राजेश खन्ना की तरह प्रेम के नायक नहीं कहलाएं, जबकि उन्होंने सिलसिला, कसमे-वादे जैसी बहुत सी फिल्म की। अमिताभ के साथ या बाद में आये राजेश खन्ना, ऋषिकपूर, विनोद खन्ना जैसे कलाकर नहीं रहे। धर्मेन्द्र जिन्होंने अमिताभ के साथ शोले जैसी चर्चित फिल्म की, वे भी उस तरह से सक्रिय नहीं रह पाये जैसे की अमिताभ बच्चन। सिनेमा और राजनीति का एक दौर पूरा करके गर्दिश के दिनों में जाने के बाद अमिताभ बच्चन जिनके आदर्श उनके बावूजी हरिवंशराय बच्चन है। उनकी कविताओं, जीवन को आदर्श मानकर अपनी दूसरी पारी कौन बनेगा करोड़पति जैसे टीवी कार्यक्रम से की। आज ओटीटी प्लेटफार्म के बहुत से कार्यक्रमों के बीच अमिताभ बच्चन पूरी तरह उपस्थित है। कोरोना संक्रमण के दौरान सिनेमा हाल बंद रहे, लोगों ने ओटीटी प्लेटफार्म के जरिए अपने घर-घर पर फिल्में देखना सीख लिया। ऐसे में उनके बीचे सिनेमा बंद होने के बावजूद अमिताभ उपस्थित रहे।

जिस सिनेमा ने लोगों को भाषा तहजीब, उठने-बैठने का ढंग, फैंशन, ग्लैमर, शिष्टाचार और रिश्तो की गहराई से परिचित कराया वही सिनेमा अब तेजी से बदल रहा है। बदला हुआ सिनेमा यथार्थ और विश्व फलक के जरिए वह सब दिखाने पर अमादा है, जो हमारे समाज में वर्जित है। सिनेमा अब शाहरुख खान और सेक्स से आगे इन्टरटेंमेंट, इन्टरटेंमेंट, इन्टरटेंमेंट हो गया है।
सिनेमा की बदलती छवियों के बीच उसके नायक भी बदले। शाहरुख खान रोमांस के बड़े नायक के रूप में उभरे, सलमान खान दबंग के रूप में युवा आईकॉन बने किन्तु अमिताभ बच्चन जैसी प्रसिद्धि, ऊंचाई को ये अभी नहीं छूं पाये। अमिताभ अपनी बढ़ती उम्र के साथ और ज्यादा सक्रिय हो रहे है। उनके बेटे-बहु और पत्नी ये सब इस समय नेपथ्य में है, चर्चा में केवल अमिताभ ही है।

सोशल मीडिया के इस दौर अमिताभ बच्चन की आज बहुत ट्रोल हुए। उन पर भी हिन्दू-मुस्लिम, स्वार्थ परखता और दोहरे व्यक्तित्व को लेकर बहुत से आरोप लगे। उनका नाम बोफोर्स के बाद पनामा पेपर्स और पैराडाइज पेपर्स में भी आया। उन्होंने अपना जन्मदिन के अवसर पर सोशल मीडिया पर कंधे पर स्लिंग बैग लिए अपनी फोटो शेयर करते हुए लिख की 80 की और बढ़ते हुए कोड करके लिखा कि जब साठा(60) तन पाठा, जब अस्सी(80) तब लस्सी। उन्होंने इस कहावत के जरिए कहा कि पहले अपने मन और कर्म से बढ़ा होता है फिर उम्र का नम्बर गेम शुरु होता है।

दरअसल हमारे इस दौर में बहुत सारे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपनी क्रियेटिवी के नाम पर ऐसा प्रस्तुत करना चाहते है जो विवादस्पद हो, जिससे उन्हें रातो-रात ख्याति और पैसा मिल जाये। दूसरी ओर बहुत से गंभीर फिल्मकार या नए फिल्मकार जिस तरह की फिल्में धर्म, जाति, इतिहास, राजनीति या समसामायिक मुद्दों को लेकर बनाना चाहते हैं, उन्हें रोकने के लिए भी बहुत से संगठन तत्काल सक्रिय हो उठते है। हमारे यहां पिछले कुछ सालों में सिनेमा के प्रदर्शन और उसके निर्माण को लेकर जिस तरह के विवाद हुए वह आने वाले समय में स्वतंत्र और गंभीर फिल्मकारो को यर्थाथ परक फिल्म बनाने से रोक सकते है। बहुत से फिल्मकार अब ओटीटी प्लेटफार्म के लिए फिल्में बना रहे है। वरना हमारे देश ने यूसूफ खान को दिलीप कुमार के नाम से स्वीकारा। साहिर लुधियानवी जैसे शायरों ने गाना लिखा "तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। " 90 के दशक तक सिनेमा में जो प्रोग्रेसिव एप्लीमेंट ,जो बातें दिखाई देती थी वह अब धीरे-धीरे कम हो रही है। यदि अब कोई गीतकार, ऐसा गीत "आसमान पर है खुदा और जमीं पे हम, आजकल वो इस तरह देखता है कम "लिखेगा तो लोग उसे धमकाने पहुंच जायेंगे।

जब भी अमिताभ बच्चन का नाम आयेगा तो उनके साथ सलीम-जावेद, यश चोपड़ा, मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा, महमूद, अनवर, ऋषिकेश मुखर्जी जैसे लोगों का नाम भी लिया जायेगा। जिन्होंने अमिताभ को अमिताभ बच्चन सदी का महानायक बनाने में मदद की। अमिताभ शतायु हों सक्रिय बने रहे और ऐसा कुछ करें जो कई सदियों तक याद किया जा सके।